Jharkhand High Court : पत्नी आपकी गुलाम नहीं, साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते झारखंड हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
News India Live, Digital Desk: झारखंड हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी पत्नी को उसकी इच्छा के विरुद्ध पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पत्नी कोई 'चल संपत्ति' या 'गुलाम' नहीं है जिसे अदालत के आदेश से जबरन साथ भेजा जाए। जस्टिस एस.एन. प्रसाद और जस्टिस सुभाष चंद की खंडपीठ ने पारिवारिक अदालत (Family Court) के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें पत्नी को पति के साथ रहने का आदेश दिया गया था।
1. क्या था पूरा मामला? (The Case Background)
यह मामला एक पति द्वारा दायर 'दांपत्य अधिकारों की बहाली' (Section 9, Hindu Marriage Act) की याचिका से जुड़ा था।
पति का तर्क: पति का कहना था कि उसकी पत्नी बिना किसी ठोस कारण के मायके में रह रही है, इसलिए उसे वापस साथ रहने का आदेश दिया जाए।
पत्नी का आरोप: पत्नी ने अदालत को बताया कि उसके ससुराल वाले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करते थे और उसके साथ मारपीट की जाती थी, जिसके कारण उसे घर छोड़ना पड़ा।
2. हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी (Court's Observations)
अदालत ने सुनवाई के दौरान मानवीय गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए कई अहम बातें कहीं:
| कोर्ट की मुख्य टिप्पणी | कानूनी निहितार्थ |
|---|---|
| "पत्नी कोई वस्तु नहीं" | पत्नी की अपनी इच्छा और गरिमा है, उसे पति की संपत्ति नहीं माना जा सकता। |
| "जबरन साथ रहने का आदेश नहीं" | यदि पत्नी को ससुराल में खतरा महसूस होता है, तो उसे वहां रहने के लिए बाध्य करना उसकी सुरक्षा से समझौता होगा। |
| "हिंदू विवाह अधिनियम की व्याख्या" | धारा 9 का उपयोग किसी को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए नहीं किया जा सकता। |
3. धारा 9 (Section 9) क्या है?
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत यदि पति या पत्नी में से कोई भी बिना किसी 'उचित बहाने' के दूसरे से अलग रहने लगे, तो पीड़ित पक्ष अदालत से साथ रहने का आदेश मांग सकता है।
अदालत ने इस मामले में क्या पाया?
कोर्ट ने कहा कि पत्नी ने क्रूरता (Cruelty) और प्रताड़ना के पर्याप्त सबूत पेश किए हैं। ऐसी स्थिति में, पति का यह कहना कि पत्नी 'बिना कारण' अलग रह रही है, गलत है। कोर्ट ने पति की याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
4. समाज और कानून पर प्रभाव
विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को मजबूती प्रदान करेगा।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता: यह फैसला संदेश देता है कि वैवाहिक बंधन में भी 'सहमति' (Consent) और 'सम्मान' सर्वोपरि है।
भरण-पोषण का अधिकार: कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अलग रहने के बावजूद पत्नी अपने और अपने बच्चों के भरण-पोषण (Maintenance) की हकदार बनी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट का रुख भी है सख्त
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में कह चुका है कि दांपत्य अधिकारों की बहाली का आदेश 'जबरन वसूली' की तरह इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। झारखंड हाई कोर्ट का यह ताजा आदेश इसी न्यायिक विचाधारा को आगे बढ़ाता है