Jharkhand Election Analysis : क्यों हारे बाबूलाल सोरेन? जामा में JMM की जीत के पीछे की 5 बड़ी वजहें
News India Live, Digital Desk: Jharkhand Election Analysis : झारखंड की सबसे हॉट सीटों में से एक जामा विधानसभा सीट पर इस बार बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। यहां झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के तूफ़ान में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का किला ढह गया है। JMM के युवा उम्मीदवार सोमेश सोरेन ने बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के भाई, बाबूलाल सोरेन को एक बड़े अंतर से हराकर शानदार जीत दर्ज की है।
यह जीत सिर्फ एक उम्मीदवार की नहीं, बल्कि सोरेन परिवार की प्रतिष्ठा की जीत मानी जा रही है। वहीं, बीजेपी के लिए यह हार एक बड़ा झटका है, जिसने इस सीट को जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। आखिर, ऐसे क्या कारण रहे कि बीजेपी का बड़ा नाम भी JMM के गढ़ को भेद नहीं पाया?
1. हेमंत सोरेन का चेहरा और सहानुभूति की लहर
जामा विधानसभा क्षेत्र संथाल परगना में आता है, जो JMM और सोरेन परिवार का पारंपरिक गढ़ रहा है। इस पूरे चुनाव में JMM ने पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के चेहरे पर चुनाव लड़ा। हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी को JMM ने एक बड़ा मुद्दा बनाया और इसे आदिवासी अस्मिता पर हमला बताया। इसका नतीजा यह हुआ कि पूरे संथाल में हेमंत सोरेन के पक्ष में एक सहानुभूति की लहर चल रही थी, जिसने सोमेश सोरेन की जीत को आसान बना दिया।
2. 'बाहरी' बनाम 'स्थानीय' का मुद्दा
बाबूलाल सोरेन भले ही एक बड़ा नाम हैं, लेकिन वह मूल रूप से गिरिडीह के रहने वाले हैं। JMM ने इस चुनाव में उन्हें 'बाहरी उम्मीदवार' बताकर प्रचार किया। वहीं, सोमेश सोरेन स्थानीय नेता हैं और उनकी पकड़ गांव-गांव तक है। JMM यह संदेश देने में कामयाब रही कि जामा का विकास कोई स्थानीय नेता ही कर सकता है, बाहरी नहीं।
3. सीता सोरेन का 'फैक्टर' भी नहीं आया काम
बीजेपी को उम्मीद थी कि जामा से तीन बार की विधायक और हेमंत सोरेन की भाभी, सीता सोरेन के पार्टी में आने से उसे फायदा मिलेगा। सीता सोरेन ने बाबूलाल सोरेन के लिए जमकर प्रचार भी किया, लेकिन ऐसा लगता है कि जामा की जनता ने सोरेन परिवार की 'बहू' के बजाय 'मूल परिवार' पर ही अपना भरोसा जताया। सीता सोरेन का दलबदल भी JMM के पक्ष में एक सहानुभूति का कारण बना।
4. JMM का मजबूत सांगठनिक ढांचा
जामा में JMM का संगठन बूथ स्तर तक बहुत मजबूत है। पार्टी के कार्यकर्ता और नेता लगातार जनता के बीच सक्रिय रहे। वहीं, बीजेपी का संगठन JMM के मुकाबले कमजोर नजर आया। JMM अपने पारंपरिक वोट बैंक (आदिवासी और अल्पसंख्यक) को एकजुट रखने में पूरी तरह से कामयाब रही।
5. युवा चेहरे पर जनता का भरोसा
सोमेश सोरेन एक युवा और नए चेहरे हैं, जबकि बाबूलाल सोरेन एक अनुभवी नेता हैं। ऐसा लगता है कि जामा के युवा मतदाताओं ने एक युवा नेता पर ज्यादा भरोसा दिखाया। सोमेश सोरेन ने अपने प्रचार में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर जोर दिया, जो युवाओं को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहा।
कुल मिलाकर, जामा की जीत ने यह साबित कर दिया है कि संथाल परगना में आज भी 'सोरेन' परिवार और 'तीर-धनुष' का जादू कायम है, जिसे भेद पाना बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।