होर्मुज जलडमरूमध्य बंद, दुनिया पर 1970 से भी भयंकर ऊर्जा संकट का साया, क्या बर्बादी की ओर बढ़ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था?
News India Live, Digital Desk: वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति इस वक्त अपने सबसे नाजुक और खतरनाक दौर से गुजर रही है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध के कारण दुनिया का सबसे अहम व्यापारिक जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) पिछले एक महीने से लगभग ठप पड़ा है। इस नाकेबंदी ने पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं। ऊर्जा और शिपिंग से जुड़े तमाम बड़े विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि दुनिया एक ऐसे विनाशकारी ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ी है, जो 1970 के दशक की ऐतिहासिक तेल त्रासदी को भी पीछे छोड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल से लेकर मार्सक के पूर्व निदेशक लार्स जेन्सेन तक का मानना है कि इस महायुद्ध का असर रूस-यूक्रेन युद्ध और 70 के दशक के झटकों से कहीं ज्यादा भयावह होने वाला है।
क्या था 1970 के दशक का वो खौफनाक तेल संकट? इतिहास के पन्नों को पलटें तो 1970 के दशक में दुनिया ने दो बड़े ऊर्जा झटके सहे थे। पहला झटका अक्टूबर 1973 में लगा था, जब 'योम किप्पुर युद्ध' (अरब-इजरायल युद्ध) के दौरान ओपेक (OPEC) के अरब देशों ने इजरायल का साथ देने वाले अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों पर तेल प्रतिबंध लगा दिया था। रातों-रात कच्चे तेल की कीमतें चार गुना बढ़ गईं, पेट्रोल पंपों पर हाहाकार मच गया और पश्चिमी देश मंदी की चपेट में आ गए। दूसरा झटका 1979 की ईरानी क्रांति के रूप में आया। ईरान में तेल उत्पादन ठप होने से बाजार में पैनिक बाइंग (घबराहट में खरीदारी) शुरू हो गई और कीमतें फिर दोगुनी हो गईं। क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के शोधकर्ता डॉ. टियरनैन हीनी के मुताबिक, उस दौर में बेलगाम महंगाई ने कई देशों की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। बेरोजगारी चरम पर थी और 1974 में ब्रिटेन की सरकार तक गिर गई थी। हालांकि, क्रिस्टोल एनर्जी की मुख्य कार्यकारी डॉ. कैरोल नखले मानती हैं कि वह संकट जानबूझकर लिए गए राजनीतिक फैसलों का नतीजा था।
मार्च 2026: होर्मुज की नाकेबंदी और मौजूदा महासंकट आज यानी मार्च 2026 के हालात इतिहास से भी ज्यादा विस्फोटक नजर आ रहे हैं। अमेरिका और इजरायल के ईरान के खिलाफ मोर्चेबंदी के बाद संकीर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य कमर्शियल जहाजों के लिए पूरी तरह से बंद है। आपको बता दें कि दुनिया का करीब 20 फीसदी कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। इसके बंद होने से खाड़ी देशों से तेल, गैस और अन्य जरूरी चीजों की सप्लाई चेन पूरी तरह टूट चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सप्लाई बहाल करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। उन्होंने सहयोगी देशों से व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए युद्धपोत भेजने की गुहार लगाई है और ईरान को सैन्य कार्रवाई की सख्त चेतावनी भी दी है। वेस्पूची मैरीटाइम के प्रमुख लार्स जेन्सेन आगाह करते हैं कि जो तेल एक महीने पहले निकला था, वह अब खत्म होने की कगार पर है। उनका कहना है कि अगर कल होर्मुज का रास्ता खुल भी जाए, तो भी आने वाले 6 से 12 महीनों तक दुनिया को भारी ऊर्जा लागत चुकानी ही पड़ेगी।
क्या यह संकट 1970 के दशक से भी बदतर साबित होगा? इस सवाल पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। डॉ. नखले और डॉ. हीनी का मानना है कि आज की दुनिया तेल पर कम निर्भर है और हमारे पास आपातकालीन सुरक्षित भंडार मौजूद हैं, जो इस झटके को सहने में मदद कर सकते हैं। लेकिन, नैटिक्सिस सीआईबी की मुख्य अर्थशास्त्री एलिसिया गार्सिया हेरेरो के आंकड़े डराने वाले हैं। उनके अनुसार, 1970 के संकट में वैश्विक सप्लाई में सिर्फ 5-7 फीसदी की गिरावट आई थी, जबकि आज दुनिया की 20 फीसदी सप्लाई ठप है। यह सिर्फ कच्चे तेल का नहीं, बल्कि प्राकृतिक गैस और रिफाइंड उत्पादों का भी महासंकट है। हेरेरो ने साफ चेतावनी दी है कि अगर इस संघर्ष को तुरंत नहीं रोका गया, तो दुनिया भर में, खासकर भारत जैसे आयात पर निर्भर एशियाई देशों में, बेतहाशा महंगाई और गहरी आर्थिक मंदी का आना तय है।