निःसंतान हिंदू विधवा की संपत्ति पर कानूनी अधिकार किसका है? सासरिया बनाम पीरिया मामले में सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प सुनवाई

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हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह और संपत्ति पर महिलाओं के अधिकार को लेकर अहम टिप्पणी की है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि यह याद रखना चाहिए कि हिंदू समाज पर किस तरह नियंत्रण किया जाता है। हम नहीं चाहते कि हमारे फैसले से हज़ारों सालों से चली आ रही कोई परंपरा टूटे। उन्होंने "कन्यादान" शब्द का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह सिर्फ़ एक रस्म नहीं, बल्कि विवाह वंश का दान भी है।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने आगे कहा कि एक महिला के विवाह के बाद उसका गटरू और उपनाम बदल जाता है। यह टिप्पणी इस बात पर ज़ोर देती है कि हिंदू विवाह की परंपरा और सामाजिक रीति-रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं। यह टिप्पणी हिंदू समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करती है। ऐसे समय में जब कानून और समाज में महिलाओं के अधिकारों पर बहस चल रही है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि अगर कोई महिला विवाहित है, तो उसका पति और उसका परिवार उसकी ज़िम्मेदारी के लिए ज़िम्मेदार हैं। विवाहित महिला अपने भाई के खिलाफ भरण-पोषण की याचिका दायर नहीं कर सकती। खासकर दक्षिण भारत में, विवाह समारोहों के दौरान यह घोषणा करने का रिवाज़ है कि वह एक गोत्र से दूसरे गोत्र में जा रही है। अगर महिला चाहे, तो वसीयत बना सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के एक प्रावधान की वैधता को चुनौती देने पर आपत्ति जताई है। उसने पीरिया और ससुराल वालों के बीच संपत्ति विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज दिया है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाओं में बिना वसीयत किए निःसंतान हिंदू विधवा की मृत्यु होने पर संपत्ति पति के परिवार को देने के प्रावधान को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के उस प्रावधान को चुनौती दी गई है जिसमें कहा गया है कि पति की मृत्यु के बाद निःसंतान विधवा की संपत्ति पति के परिवार को मिलेगी। अगर पति के परिवार में कोई जीवित नहीं है, तो ऐसी स्थिति में संपत्ति पति के परिवार को मिलेगी।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की अध्यक्षता में सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (धारा 15 (1) (बी)) के विरुद्ध एक जनहित याचिका पर सुनवाई की। यदि यह पारिवारिक संपत्ति के निपटान से संबंधित है, तो न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह संभव है कि पत्नी का पति, पुत्र या पुत्री जीवित न हों। फिर उसकी पुत्री के बच्चे हो सकते हैं। ये सभी प्राथमिक आधार पर कानूनी उत्तराधिकारी होंगे।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सब कुछ पति के परिवार को जाता है। यदि यह न्यायालय अधिनियम की धारा 15(1)बी को मनमाना मानता है, जिसमें तर्क दिया गया है कि यह महिला की गरिमा को प्रभावित करती है, तो प्रश्न उठता है कि यदि वह अपने पति की संपत्ति पर निर्भर रहती है, तो उसकी गरिमा का क्या होगा? अधिनियम की इस धारा के अनुसार, यदि कोई निःसंतान महिला बिना वसीयत के मर जाती है और पहली श्रेणी में उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं है, तो दूसरी श्रेणी के लोग संपत्ति के उत्तराधिकारी होंगे।

वकील ने कहा कि यह एक तरह की जनहित याचिका है, क्योंकि ऐसे कई मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे ही एक मामले में, पति की बहन अपने निःसंतान भाई और भाभी की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति पर दावा कर रही है।

अदालत ने इस बात पर गौर किया है कि हो सकता है कि मृतक महिला ने दोबारा शादी की हो और कहीं और चली गई हो। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में विवाद यह है कि एक युवा कामकाजी जोड़े की कोविड के दौरान बिना वसीयत के मौत हो गई। अब महिला की माँ और सास के बीच विवाद है। मृतक युवक की माँ का दावा है कि मृतक जोड़े की सारी संपत्ति पर उसका अधिकार है। जबकि मृतक युवती की माँ चाहती है कि उसे अपनी बेटी की संपत्ति मिले। वकील समीर सोढ़ी द्वारा दायर इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट अब नवंबर में सुनवाई करेगा।

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