Indian women Cricketers : जब फर्श पर सोना और प्लास्टिक के बर्तनों में खाना आम था ,आज वो लड़कियां वर्ल्ड चैंपियन हैं

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News India Live, Digital Desk: Indian women Cricketers : आज जब हम भारतीय महिला क्रिकेट टीम को वर्ल्ड कप की चमचमाती ट्रॉफी उठाए देखते हैं, तो हमारी छाती गर्व से चौड़ी हो जाती है। हर तरफ जश्न का माहौल है, खिलाड़ियों पर करोड़ों की बारिश हो रही है, और हर कोई उन्हें सलाम कर रहा है। लेकिन इस चमक की कहानी के पीछे दशकों का संघर्ष, गुमनामी का अंधेरा और कभी हार न मानने वाला जज्बा छिपा है, जिसके बारे में आज की पीढ़ी शायद ही जानती हो। यह उस दौर से निकली हुई लड़कियों की कहानी है, जब देश में महिला क्रिकेट की कोई पहचान तक नहीं थी।

वो दौर, जब क्रिकेट खेलना जुनून था, पेशा नहीं

एक समय था जब महिला क्रिकेटरों को आज जैसी सुविधाएँ मिलना तो दूर, उनके खेल को गंभीरता से भी नहीं लिया जाता था। शुरुआती दिनों की खिलाड़ियों को अक्सर डॉरमेट्री के फर्श पर सोना पड़ता था। उनके पास अच्छे क्रिकेट गियर नहीं होते थे और कई बार तो उन्हें प्लास्टिक के बर्तनों में खाना खाकर गुज़ारा करना पड़ता था। अंतरराष्ट्रीय दौरों के लिए पैसे नहीं थे और टीम को पहचान के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। महिला क्रिकेट संघ (WCAI) की स्थापना 1973 में हुई थी, लेकिन संसाधनों की कमी हमेशा एक बड़ी चुनौती बनी रही। खिलाड़ियों को एक टेस्ट मैच खेलने के लिए एक पैसा भी नहीं मिलता था।

यह सिर्फ़ सुविधाओं की कमी की बात नहीं थी, बल्कि समाज की सोच भी एक बड़ी बाधा थी। लेकिन डायना एडुल्जी, शांता रंगास्वामी जैसी कुछ जुनूनी खिलाड़ियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने उस नींव को मज़बूती से रखा, जिस पर आज भारतीय महिला क्रिकेट की शानदार इमारत खड़ी है।

BCCI का साथ और एक नई सुबह

भारतीय महिला क्रिकेट के लिए सबसे बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ 2006 में आया, जब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने महिला क्रिकेट संघ का खुद में विलय कर लिया। यह एक क्रांतिकारी क़दम था। इसके बाद से खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएँ, ट्रेनिंग और आर्थिक सुरक्षा मिलनी शुरू हुई। उन्हें अब अंतरराष्ट्रीय दौरे करने का ज़्यादा मौका मिलने लगा और उनके खेल में भी ज़बरदस्त सुधार आया।

2005 और 2017 के वर्ल्ड कप फाइनल में पहुँचकर मिली हार ने टीम को तोड़ा नहीं, बल्कि और मज़बूत बनाया। हर हार ने उन्हें अगली बार और बेहतर करने का हौसला दिया।

WPL: वो गेम-चेंजर जिसने सब कुछ बदल दिया

वीमेन्स प्रीमियर लीग (WPL) की शुरुआत ने महिला क्रिकेट में एक नई जान फूंक दी। इस लीग ने न सिर्फ़ भारतीय खिलाड़ियों को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाया, बल्कि उन्हें दुनिया की बेहतरीन खिलाड़ियों के साथ खेलने और सीखने का एक बड़ा मंच भी दिया। इसका नतीजा हमने मैदान पर देखा। युवा खिलाड़ी अब पहले से ज़्यादा आत्मविश्वास से भरी हुई और निडर होकर खेलती हैं।

और आख़िरकार वो दिन आया...

नवी मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में 2 नवंबर 2025 को जब भारतीय टीम ने वर्ल्ड कप की ट्रॉफी उठाई, तो यह सिर्फ़ 15 खिलाड़ियों की जीत नहीं थी। यह उन सभी खिलाड़ियों के दशकों के संघर्ष की जीत थी, जिन्होंने मुश्किल हालातों में भी क्रिकेट खेलने का सपना ज़िंदा रखा। यह उस फर्श पर सोने से लेकर दुनिया के शिखर पर पहुँचने की एक अविश्वसनीय यात्रा की जीत थी। इस जीत ने देश की हज़ारों लड़कियों को यह विश्वास दिलाया है कि अगर इरादे मज़बूत हों, तो हर सपना सच हो सकता है।