PoK में लोकतंत्र का मखौल! बंदूक की नोक पर हो रहे विधानसभा चुनाव, JAAC ने पाकिस्तान की पोल खोलकर रख दी

PoK में लोकतंत्र का मखौल! बंदूक की नोक पर हो रहे विधानसभा चुनाव, JAAC ने पाकिस्तान की पोल खोलकर रख दी

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में चल रहे विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के दौरान हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। एक तरफ जहां पाकिस्तान सरकार इन चुनावों को पारदर्शी और निष्पक्ष बताने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) ने पाकिस्तान की सेना और प्रशासन पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। कमेटी का सीधा कहना है कि पीओके में चुनाव के नाम पर सिर्फ एक ढोंग और चुनावी ड्रामा रचा जा रहा है, जिसे पूरी तरह से बंदूक की नोक पर संचालित किया जा रहा है।

लोकतंत्र के नाम पर चुनावी ड्रामा और खुलेआम मनमानी

सीएनएन-न्यूज18 के साथ एक खास बातचीत में, एएसी के प्रमुख नेता उमर नज़ीर कश्मीरी ने संगठन का कड़ा रुख जाहिर करते हुए कहा कि उनकी कमेटी इस पूरी प्रक्रिया को सिरे से खारिज करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अवामी एक्शन कमेटी किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ नहीं है, बल्कि वे हमेशा से स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव की पुरजोर मांग करते रहे हैं। हालांकि, वे चुनाव के नाम पर होने वाली किसी भी तरह की धोखाधड़ी और सैन्य दबाव की राजनीति को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। उनके मुताबिक, वर्तमान हालात यह साबित करते हैं कि पीओके की जनता पर जबरन अपनी पसंद थोपने की कोशिश की जा रही है।

95 फीसदी लोकप्रिय नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका गया

उमर नजीर कश्मीरी ने बड़ा खुलासा करते हुए आरोप लगाया कि चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत से ही पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों का भारी हस्तक्षेप रहा है। समान अवसर (Level Playing Field) देने के बजाय सुनियोजित तरीके से लगभग 95 प्रतिशत असली और लोकप्रिय कश्मीरी प्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया। कई उम्मीदवारों को धमकियां दी गईं और उन पर अनुचित दबाव बनाया गया ताकि वे चुनावी मैदान से हट जाएं। इस तरह की दमनकारी रणनीतियों के कारण इन चुनावों की विश्वसनीयता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है और जनता का इस व्यवस्था से पूरी तरह से मोहभंग हो चुका है।

जनता का भारी बहिष्कार और 'हक-ए-हुकमरानी' की जंग

एएसी नेता ने बताया कि पीओके के पहले चरण के चुनाव में ही वहां की बड़ी आबादी ने इन चुनावों का खुला और स्पष्ट बहिष्कार किया था। लोग अपने घरों में रहे और मतदान केंद्रों से दूरी बनाकर अपनी नाराजगी जाहिर की। दूसरे चरण में भी यही निराशाजनक माहौल देखने को मिल रहा है। उमर नजीर ने दो टूक शब्दों में कहा कि उनका संघर्ष केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लड़ाई 'हक-ए-हुकमरानी' यानी स्व-शासन के अधिकार और 'हक-ए-मालिकियत' यानी अपनी ही जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना हक हासिल करने की है। हालांकि, इन तीखे आरोपों के बावजूद पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि चुनाव पूरी सुरक्षा और कानून के दायरे में हो रहे हैं, पर इस पर पाकिस्तान सरकार या सेना की ओर से कोई ठोस सफाई सामने नहीं आई है।

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