क्या फिर 1971 जैसे हालात की तरफ बढ़ रहा है पाकिस्तान? बलूचिस्तान, पख्तूनख्वा से लेकर PoK तक बगावत की आग

क्या फिर 1971 जैसे हालात की तरफ बढ़ रहा है पाकिस्तान? बलूचिस्तान, पख्तूनख्वा से लेकर PoK तक बगावत की आग

साल 1971 में जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान टूटकर स्वतंत्र राष्ट्र 'बांग्लादेश' बना था, तब दुनिया ने एक ऐसे देश का विभाजन देखा था जिसका निर्माण केवल धर्म के आधार पर हुआ था, लेकिन वह अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को संभाल नहीं सका। आज पांच दशक से अधिक समय बीतने के बाद इतिहास एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। वर्तमान में पाकिस्तान अपने इतिहास के सबसे गंभीर बहु-आयामी संकट से जूझ रहा है। एक तरफ जहां देश दिवालिया होने की कगार पर है और आईएमएफ (IMF) व मित्र देशों के कर्ज के सहारे अपनी सांसें गिन रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के चारों कोनों में प्रांतीय स्वायत्तता, जातीय भेदभाव और सैन्य अत्याचारों के खिलाफ खुला सशस्त्र व जन-आंदोलन छिड़ चुका है। अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों, कूटनीतिक विश्लेषकों और थिंक-टैंक्स के बीच यह चर्चा तेजी से जोर पकड़ रही है कि क्या आंतरिक अंतर्विरोधों के बोझ तले दबा पाकिस्तान आने वाले समय में 6 अलग-अलग टुकड़ों में बिखर सकता है।

वो 6 प्रमुख क्षेत्र जहां सुलग रही है आजादी और विभाजन की आग

सामरिक विश्लेषक पाकिस्तान के वर्तमान भूगोल को 6 मुख्य भू-भागों और जातीय सीमाओं में विभाजित होने की संभावना के रूप में देखते हैं:

  1. बलूचिस्तान (Balochistan - आजाद बलूचिस्तान का सपना): क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा (लगभग 44%) लेकिन सबसे कम आबादी और सबसे उपेक्षित प्रांत। प्राकृतिक गैस, सोने (रेको डिक) और तेल के अकूत भंडार होने के बावजूद यहां की जनता अत्यधिक गरीबी में जी रही है। 'बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी' (BLA) और 'बलूच राजी अजोई संगर' (BRAS) जैसे विद्रोही संगठन पाकिस्तानी सेना और चीनी सीपीईसी (CPEC) प्रोजेक्ट्स के खिलाफ पूर्ण आजादी का युद्ध लड़ रहे हैं। महरंग बलूच के नेतृत्व में 'बलूच यकजेहती कमेटी' (BYC) के शांतिपूर्ण लेकिन विशाल नागरिक प्रदर्शनों ने बलूचिस्तान को इस्लामाबाद के नियंत्रण से व्यावहारिक रूप से अलग-थलग कर दिया है।

  2. खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkhwa - पख्तूनिस्तान या ग्रेटर अफगानिस्तान): पश्तून बहुल इस प्रांत में 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (TTP) ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के खिलाफ समानांतर युद्ध छेड़ रखा है। कबायली इलाकों में सेना के नियंत्रण को सीधी चुनौती मिल रही है। वहीं दूसरी ओर 'पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट' (PTM) सैन्य अभियानों, फर्जी एनकाउंटरों और पश्तूनों के उत्पीड़न के खिलाफ खुलकर 'लार ओ बर यू अफगान' (डूरंड लाइन के आर-पार एक पश्तून राष्ट्र) का नारा बुलंद कर रहा है।

  3. सिंध (Sindh - 'सिंधुदेश' की मांग): पाकिस्तान के आर्थिक इंजन कहे जाने वाले कराची और सिंध प्रांत में 'सिंधुदेश रिवोल्यूशनरी आर्मी' (SRA) और जीएम सैयद की विचारधारा से प्रेरित राष्ट्रवादी दल सक्रिय हैं। सिंध की जनता का आरोप है कि पंजाब उनकी सिंधु नदी का पानी, कृषि संपदा और टैक्स का 70% हिस्सा लूट लेता है, जबकि सिंध के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं।

  4. पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला कश्मीर (PoJK): पिछले दो वर्षों में पीओके की जनता ने पाकिस्तानी हुकूमत और सेना के खिलाफ अभूतपूर्व नागरिक विद्रोह किया है। भारी बिजली बिलों, गेहूं पर सब्सिडी खत्म करने और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ 'अवामी एक्शन कमेटी' के बैनर तले लाखों लोग सड़कों पर उतरे हैं। प्रदर्शनों में खुलेआम पाकिस्तान विरोधी और भारत के साथ व्यापारिक रास्ते खोलने के नारे लग रहे हैं।

  5. गिलगित-बाल्टिस्तान (Gilgit-Baltistan): सामरिक रूप से बेहद अहम इस शिया-बहुल क्षेत्र को पाकिस्तान ने दशकों से बिना किसी संवैधानिक दर्जे के गुलाम बनाकर रखा है। भूमि अधिग्रहण, धार्मिक जनसांख्यिकी बदलने की साजिश और नागरिक अधिकारों के हनन के चलते गिलगित-बाल्टिस्तान में लद्दाख और भारत के साथ विलय की मांग करने वाले स्वर लगातार मुखर हो रहे हैं।

  6. पंजाब और सरायकी क्षेत्र (Saraikistan / Residual Pakistan): देश की राजनीति, सेना और संसाधनों पर केवल 'मध्य और उत्तरी पंजाब' के अभिजात वर्ग का कब्जा है। इसके विरोध में दक्षिण पंजाब के सिंधी व सरायकी भाषी लोग लंबे समय से एक अलग 'सरायकी प्रांत' की मांग कर रहे हैं। यदि बाकी प्रांत अलग होते हैं, तो पाकिस्तान केवल एक सीमित 'पंजाबी गणराज्य' (Republic of Punjab) बनकर रह जाएगा।

बलूचिस्तान से पख्तूनख्वा तक जलती बगावत की चिंगारी: 1971 की गलतियों से क्यों नहीं ले रहा सबक?

1971 में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) के अलग होने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि पश्चिमी पाकिस्तान की पंजाबी-वर्चस्व वाली सेना ने बंगाली नागरिकों के लोकतांत्रिक जनादेश को कुचलने के लिए 'ऑपरेशन सर्चलाइट' जैसा बर्बर नरसंहार चलाया था। ठीक वही गलती आज रावलपिंडी का सैन्य मुख्यालय (GHQ) बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में दोहरा रहा है।

बलूचिस्तान में हजारों युवाओं के जबरन गायब होने (Enforced Disappearances), एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स और महिलाओं पर लाठीचार्ज ने बलूच समाज के हर वर्ग को हथियार उठाने या पूर्ण अलगाव के लिए प्रेरित किया है। ठीक इसी तरह, अफगान सीमा पर बसे पश्तूनों को शक की निगाह से देखने और वहां लगातार ड्रोन व हवाई हमले करने से पाकिस्तानी सेना के प्रति स्थानीय अवाम में गहरी नफरत भर चुकी है। जब राज्य अपनी ही जनता पर टैंक, तोप और फाइटर जेट्स से हमला करने लगे, तो उस राष्ट्र की भौगोलिक अखंडता लंबे समय तक नहीं टिक सकती।

आर्थिक दिवालियापन और सेना की अनियंत्रित लूट: ताबूत में आखिरी कील

किसी भी देश को एकजुट रखने के लिए आर्थिक स्थिरता सबसे बड़ी रीढ़ होती है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था आज पूरी तरह वेंटिलेटर पर है:

  • कर्ज का अंतहीन चक्र: पाकिस्तान का कुल सार्वजनिक कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 80% से अधिक हो चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम है कि देश केवल नए कर्ज लेकर पुराने कर्जों का ब्याज चुका पा रहा है।

  • 'फौजी फाउंडेशन' और जनरलों का व्यापारिक साम्राज्य: पाकिस्तानी सेना देश की रक्षा करने के बजाय रियल एस्टेट (DHA), खाद, सीमेंट, तेल, बैंकिंग और शॉपिंग मॉल चलाने में व्यस्त है। देश का रक्षा बजट लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है।

  • CPEC की नाकामी: चीन का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा' (CPEC) स्थानीय लोगों के लिए रोजगार लाने के बजाय एक रणनीतिक औपनिवेशिक जाल साबित हुआ है, जिससे ग्वादर के स्थानीय मछुआरों और व्यापारियों में भारी आक्रोश है।

भू-राजनीतिक हकीकत: क्या पाकिस्तान का विघटन संभव है?

सामरिक और रक्षा जानकारों के अनुसार, भले ही पाकिस्तान का 6 औपचारिक संप्रभु राष्ट्रों में तत्काल विभाजन अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के कारण जटिल दिखता हो, लेकिन आंतरिक रूप से पाकिस्तान पहले ही 'डी-फैक्टो' (व्यावहारिक रूप से) विखंडित हो चुका है। देश के 60% भूभाग (बलूचिस्तान और कबायली पख्तून क्षेत्र) पर पाकिस्तानी पुलिस या नागरिक प्रशासन का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं बचा है; वहां केवल सेना की चौकियां हैं जिन पर रोजाना हमले हो रहे हैं।

विश्व की महाशक्तियां (विशेष रूप से अमेरिका और चीन) पाकिस्तान के एक परमाणु संपन्न देश होने के कारण उसके अचानक और अनियंत्रित बिखराव को लेकर सतर्क हैं, क्योंकि परमाणु हथियारों के आतंकी गुटों के हाथ में जाने का खतरा रहता है। यदि पाकिस्तानी सेना ने अपने राजनीतिक हस्तक्षेप, मानवाधिकार हनन और अन्य प्रांतों के आर्थिक शोषण को तुरंत नहीं रोका, तो सामाजिक विद्रोह और आंतरिक गृहयुद्ध (Civil War) की यह आग देश को अपरिहार्य विभाजन की ओर धकेलने से कोई नहीं रोक पाएगा।

Latest Posts