सुहागरात पर दुल्हन बोली- 'तुम मुझे पसंद नहीं हो!', 2 साल तक कोर्ट के चक्कर काटने के बाद ₹10 लाख देकर मिली 'आजादी'
बड़े अरमानों और परिवार की रजामंदी से हुई एक शादी का अंत महज चंद घंटों के भीतर कड़वाहट और विवाद में बदल गया। धूमधाम से विवाह संपन्न होने और ससुराल पहुंचने के बाद जब सुहागरात पर दूल्हा कमरे में पहुंचा, तो दुल्हन के एक अप्रत्याशित बयान ने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी। दुल्हन ने सीधे शब्दों में शारीरिक दूरी बनाते हुए कह दिया, "तुम मुझे बिल्कुल पसंद नहीं हो और मैं तुम्हारे साथ कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती।" युवक के समझाने और परिवार के दखल के बावजूद दुल्हन अपने फैसले पर अड़ी रही और उसने दांपत्य जीवन की शुरुआत करने से साफ इनकार कर दिया।
ससुराल में रहने से इनकार, फिर शुरू हुआ कानूनी विवाद
शादी के कुछ ही दिनों बाद दुल्हन अपने मायके लौट गई और उसने दोबारा ससुराल आने से मना कर दिया। रिश्तेदारों और समाज के स्तर पर कई बार सुलह और समझौते की कोशिशें की गईं, लेकिन लड़की पक्ष ने रिश्ता निभाने से साफ मना कर दिया। इसके बाद विवाद पुलिस और कोर्ट की दहलीज तक पहुंच गया। दूल्हे और उसके परिवार पर दहेज उत्पीड़न (Dowry Harassment) और घरेलू हिंसा से जुड़े गंभीर आरोपों के तहत कानूनी मामले दर्ज कराने की चेतावनी दी जाने लगी, जिसके चलते दूल्हे पक्ष को भारी मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
2 साल तक कोर्ट-कचहरी और तारीखों का लंबा दौर
युवक ने अपनी शादी को कानूनी रूप से खत्म करने के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट-कचहरी की यह कानूनी जंग लगभग 2 वर्षों तक खिंचती चली गई। इस दौरान बार-बार काउंसलिंग और मध्यस्थता (Mediation) के प्रयास किए गए, लेकिन दोनों पक्षों के बीच सुलह का कोई रास्ता नहीं निकला। युवक का कहना था कि बिना किसी शारीरिक संबंध या वास्तविक वैवाहिक जीवन के वह सिर्फ कागजों पर शादी का बोझ ढो रहा था और अदालती चक्करों के कारण उसका करियर व मानसिक शांति पूरी तरह बर्बाद हो रही थी।
₹10 लाख की वन-टाइम सेटलमेंट पर बनी बात
लंबी कानूनी प्रक्रिया और मुकदमों के बोझ से राहत पाने के लिए अंततः दोनों पक्षों ने अदालत की मध्यस्थता में आपसी सहमति (Mutual Consent) से अलग होने का फैसला किया। समझौते के तहत पति को अपनी 'आजादी' और सभी कानूनी मुकदमों को वापस लेने की शर्त पर पत्नी को 10 लाख रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता (One-Time Alimony / Permanent Settlement) देने पर राजी होना पड़ा। अदालत में तय राशि का डिमांड ड्राफ्ट सौंपे जाने के बाद हिंदू मैरिज एक्ट के तहत दोनों को विधिवत तलाक की डिक्री जारी कर दी गई।
मैट्रिमोनियल विवादों में समझौते का बढ़ता चलन
फैमिली कोर्ट के वकीलों और कानूनी जानकारों के मुताबिक, आज के दौर में बेमेल शादियों या जबरन तय किए गए रिश्तों में इस तरह के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। लंबी और थकाऊ कानूनी लड़ाई में दोनों पक्षों के कई साल और संसाधन बर्बाद होने से बचाने के लिए अब म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स और वन-टाइम सेटलमेंट का रास्ता सबसे ज्यादा अपनाया जा रहा है।