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बुढ़ापे का सौदा करने वालों को बड़ा सबक: लातूर की 89 वर्षीय दादी ने पोते-परपोते को दी 7.5 एकड़ जमीन कानूनी लड़ाई से ली वापस

हमारे समाज में अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता या दादा-दादी अपने जीवनभर की गाढ़ी कमाई और संपत्ति को इस उम्मीद में अपने बच्चों या पोते-पोतियों के नाम कर देते हैं कि बुढ़ापे के आखिरी दिनों में वे उनका सहारा बनेंगे। लेकिन कई बार जमीन-जायदाद हाथ में आते ही बच्चों के रंग बदल जाते हैं और जिन बुजुर्गों ने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, वे दाने-दाने और तीमारदारी के लिए मोहताज हो जाते हैं।

ऐसा ही एक झकझोर देने वाला मामला महाराष्ट्र के लातूर जिले से सामने आया है। लेकिन इस कहानी का अंत रोने-धोने के साथ नहीं, बल्कि एक बुजुर्ग महिला के स्वाभिमान और कानूनी जीत के साथ हुआ है। यहां एक 89 साल की परदादी ने देखभाल न करने पर अपने पोते और परपोते को दी गई करोड़ों की जमीन वापस छीनकर समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की है।

क्या है लातूर का यह पूरा मामला?

यह पूरी घटना लातूर जिले के करसा गांव की है। यहां रहने वाली 89 वर्षीय बुजुर्ग महिला हौसाबाई लाहाडे के पास करीब 3 हेक्टेयर (लगभग 7.5 एकड़) कृषि भूमि थी। ढलती उम्र और शरीर की कमजोरी को देखते हुए हौसाबाई ने अपने पोते और परपोते पर भरोसा जताया। उन्होंने एक कानूनी 'गिफ्ट डीड' (उपहार विलेख) के जरिए अपनी यह पूरी उपजाऊ जमीन उन दोनों के नाम ट्रांसफर कर दी।

जमीन सौंपने के पीछे एक सीधा और भावुक पारिवारिक समझौता था। दोनों ने हौसाबाई से वादा किया था कि वे उनकी बुजुर्गावस्था में पूरी देखभाल करेंगे, उनके इलाज और भोजन का खर्च उठाएंगे और उन्हें किसी भी चीज की कमी नहीं होने देंगे।

लातूर जमीन विवाद मामला: एक नजर में

इस पूरे मामले के मुख्य कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं को आप नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:

जमीन नाम होते ही बदल गए पोते-परपोते के सुर

जैसे ही जमीन के कागजात पोते और परपोते के नाम हुए, उनके वादे हवा हो गए। आरोप है कि जमीन अपने नाम ट्रांसफर होते ही दोनों ने बुजुर्ग हौसाबाई की सुध लेना बंद कर दिया। उन्हें न तो समय पर भोजन-दवाई मिली और न ही वह मान-सम्मान, जिसकी उम्मीद में उन्होंने अपनी जमीन उनके नाम की थी।

जब अपनों से उम्मीद पूरी तरह टूट गई और उपेक्षा बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो हौसाबाई ने हार मानने के बजाय कानून का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया। वे सीधे सीनियर सिटिजन्स ट्रिब्यूनल (वरिष्ठ नागरिक न्यायाधिकरण) पहुंचीं और 'मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन्स एक्ट, 2007' के तहत अपनी जमीन वापस दिलाने की गुहार लगाई।

ट्रिब्यूनल का कड़ा रुख: बुजुर्गों की सेवा सिर्फ नैतिक नहीं, कानूनी जिम्मेदारी

न्यायाधिकरण ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी दस्तावेजों, गिफ्ट डीड की शर्तों और दोनों पक्षों की दलीलों की गहनता से जांच की। सुनवाई के दौरान यह साफ हो गया कि पोते और परपोते ने जमीन लेते वक्त जो वादे किए थे, उन्हें पूरी तरह से तोड़ा गया है।

 ट्रिब्यूनल की अध्यक्ष रोहिणी नरहे-विरोले का ऐतिहासिक बयान

"यदि कोई बुजुर्ग व्यक्ति अपनी संपत्ति इस शर्त पर किसी परिजन के नाम करता है कि भविष्य में उसकी देखभाल की जाएगी, तो यह केवल एक पारिवारिक या नैतिक समझौता नहीं है। यह पूरी तरह से एक कानूनी जिम्मेदारी है। यदि संपत्ति का सुख लेने के बाद उस वादे को नहीं निभाया जाता, तो ऐसी स्थिति में किया गया संपत्ति का हस्तांतरण कानूनन वैध नहीं रह जाता।"

इस कड़े रुख के साथ ट्रिब्यूनल ने पोते और परपोते के नाम की गई गिफ्ट डीड को तुरंत प्रभाव से रद्द (Cancel) कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि 7.5 एकड़ जमीन का मालिकाना हक फिर से हौसाबाई लाहाडे के नाम किया जाए। साथ ही राजस्व विभाग (Revenue Department) को भी सख्त निर्देश दिए गए कि सरकारी रिकॉर्ड में किए गए सभी फेरबदल तुरंत निरस्त किए जाएं ताकि भविष्य में इस जमीन पर कोई भी उनके जीवनकाल में हस्तक्षेप न कर सके।

देश के करोड़ों बुजुर्गों के लिए बहुत बड़ी सीख

यह फैसला देश के उन तमाम बुजुर्गों के लिए एक ढाल और बड़ी सीख है, जो अक्सर अपनों के मोह में आकर अपनी संपत्ति उनके नाम कर देते हैं और बाद में लाचारी का जीवन जीते हैं। वर्ष 2007 का यह कानून साफ तौर पर बुजुर्गों को यह अधिकार देता है कि अगर सेवा करने की शर्त पर कोई संपत्ति दी गई है और बाद में धोखा मिलता है, तो वे उस संपत्ति को वापस पा सकते हैं। कानून भले ही समय लेता है, लेकिन वह बुजुर्गों के सम्मान और उनकी सुरक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहता है।

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