जब मुलायम सिंह यादव ने एक झटके में तोड़ दिया था सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सपना
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सूबे की राजनीतिक बिसात पर शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। मौजूदा दौर में जहां समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस मिलकर 'इंडिया गठबंधन' (INDIA Alliance) के तहत आगामी चुनावों के लिए सीटों के तालमेल और बैठकों के दौर में व्यस्त हैं, वहीं सियासत के गलियारों में अतीत के कुछ ऐसे पन्ने भी पलटे जा रहे हैं जो दोनों दलों के जटिल रिश्तों की कहानी बयां करते हैं। आज जब गठबंधन की बैठकों में आपसी खींचतान और प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर अंदरूनी चर्चाएं चलती हैं, तो सियासी पंडितों को करीब 27 साल पुराना एक ऐसा ऐतिहासिक वाकया याद आ जाता है, जब सपा के संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी का देश की कमान संभालने का सपना एक झटके में चकनाचूर कर दिया था।
साल 1999 का वो सियासी घटनाक्रम जब हिल गई थी देश की राजनीति इस बेहद दिलचस्प सियासी कहानी की शुरुआत साल 1999 में हुई थी, जब केंद्र की तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गई थी। सरकार गिरने के बाद देश की राजनीति में अचानक एक बड़ा शून्य पैदा हो गया था और वैकल्पिक सरकार बनाने की कवायद तेजी से शुरू हो गई थी। उस वक्त कांग्रेस पार्टी सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में सामने आई और पूरी उम्मीद थी कि कांग्रेस अन्य विपक्षी दलों के सहयोग से केंद्र में सरकार बना लेगी। इसी सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति भवन जाकर तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन से मुलाकात की और एक ऐसा दावा किया जो भारतीय राजनीतिक इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
'मेरे पास 272 सांसदों का समर्थन है' और सोनिया गांधी का वो बड़ा दावा राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बाद जब सोनिया गांधी राष्ट्रपति भवन से बाहर आईं, तो उन्होंने मीडिया के सामने मुस्कुराते हुए बेहद आत्मविश्वास के साथ कहा था, "मेरे पास 272 सांसदों का समर्थन है और हम सरकार बनाने जा रहे हैं।" इस बयान के बाद पूरे देश में यह मान लिया गया था कि सोनिया गांधी भारत की अगली प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं। कांग्रेस खेमे में जश्न का माहौल था और मंत्रियों के नामों पर भी चर्चा शुरू हो चुकी थी। लेकिन राजनीति में जो दिखता है, वो हमेशा सच नहीं होता। सोनिया गांधी के इस बड़े दावे के पीछे जिस 'समर्थन' की उम्मीद थी, उसकी असली चाबी उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता मुलायम सिंह यादव के हाथों में थी।
मुलायम सिंह यादव का वो एक 'इन्कार' और बिखर गए कांग्रेस के सारे सपने सोनिया गांधी के दावे के तुरंत बाद जब सरकार बनाने के लिए लिखित समर्थन पत्रों की बारी आई, तो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने एक ऐसा सियासी दांव खेला जिसने कांग्रेस के पैरों तले जमीन खिसका दी। मुलायम सिंह यादव ने साफ शब्दों में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने से बिल्कुल मना कर दिया। उनके इस अप्रत्याशित फैसले के पीछे विदेशी मूल का मुद्दा और समाजवादी पार्टी के अपने राजनीतिक समीकरण थे। मुलायम सिंह यादव के इस सख्त रुख के कारण सोनिया गांधी जरूरी जादुई आंकड़ा (272) जुटाने में पूरी तरह नाकाम रहीं। नतीजा यह हुआ कि वैकल्पिक सरकार नहीं बन सकी और देश को दोबारा समय से पहले लोकसभा चुनावों का सामना करना पड़ा, जिसमें बाद में अटल बिहारी वाजपेयी फिर से पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटे।
अतीत के इस बड़े सबक से इंडिया गठबंधन के लिए क्या है संदेश आज करीब 27 साल बाद जब उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस एक बार फिर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए साथ खड़े हैं, तो इतिहास का यह पन्ना दोनों दलों को एक बड़ा सबक देता है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि अतीत की इस कड़वाहट और ऐतिहासिक खींचतान के बावजूद आज के बदले राजनीतिक परिदृश्य में दोनों पार्टियां अपनी मजबूरी और जरूरत के चलते एक मंच पर हैं। लेकिन अंदरूनी तौर पर नेतृत्व और वर्चस्व की लड़ाई आज भी उतनी ही पुरानी है। अब देखना यह होगा कि 2027 के सियासी दंगल में अतीत के ये किस्से गठबंधन के वर्तमान और भविष्य को कितना प्रभावित करते हैं।