Jyeshtha Purnima 2026: इस बार अधिक मास के कारण ज्येष्ठ माह में दूसरी पूर्णिमा का महासंयोग; जानें वट सावित्री पूर्णिमा व्रत की सही तारीख, मुहूर्त और पूजा विधि
हिंदू धर्म और वैदिक पंचांग में पूर्णिमा तिथि का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण अवस्था में होते हैं और सभी 16 कलाओं से युक्त होकर पृथ्वी पर अपनी अमृतमयी किरणों की वर्षा करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा तिथि पर धन की देवी माता लक्ष्मी स्वयं भूलोक (धरती) पर अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने और उनका हाल जानने के लिए आती हैं। इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु के 'सत्यनारायण' रूप की कथा सुनने का भी विशेष विधान है।
आमतौर पर एक साल में 12 पूर्णिमा तिथियां आती हैं, लेकिन साल 2026 में ज्येष्ठ माह में अधिक मास (लौंद का महीना) लगने की वजह से पूर्णिमा व्रतों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। इससे पहले अधिक मास के चलते 31 मई 2026 को ज्येष्ठ अधिक मास की पूर्णिमा का व्रत किया जा चुका है। वर्तमान में अब शुद्ध (मुख्य) ज्येष्ठ माह का शुक्ल पक्ष चल रहा है, जिसका समापन आगामी 'ज्येष्ठ पूर्णिमा' के महाव्रत के साथ होगा।
इस पावन तिथि पर पवित्र नदियों में स्नान, दान और बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। इसी दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य के लिए वट सावित्री पूर्णिमा व्रत भी रखती हैं। आइए जानते हैं इस साल शुद्ध ज्येष्ठ पूर्णिमा की सही तारीख, चंद्रोदय का समय, शुभ मुहूर्त और प्रामाणिक पूजा विधि।
ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026: तिथि, समय और चंद्रोदय
पंचांगीय गणना के अनुसार, शुद्ध ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि की समय-सारणी इस प्रकार रहने वाली है:
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पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ: 29 जून 2026, सोमवार को सुबह 03 बजकर 06 मिनट से।
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पूर्णिमा तिथि का समापन: 30 जून 2026, मंगलवार को सुबह 05 बजकर 26 मिनट पर।
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चंद्रोदय (Moonrise) का समय: 29 जून 2026 को शाम 07 बजकर 16 मिनट पर।
उदयातिथि और व्रत निर्णय: चूंकि 29 जून को पूर्णिमा तिथि सूर्योदय से पहले ही शुरू हो जाएगी और पूरे दिन व रात तक व्याप्त रहेगी, इसलिए उदयातिथि और प्रदोष काल (शाम का समय) दोनों के सिद्धांतों के आधार पर ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत और स्नान-दान 29 जून 2026, दिन सोमवार को ही किया जाएगा। इसी दिन शाम को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाएगा, जिससे कुंडली के 'चंद्र दोष' से मुक्ति मिलती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा के सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त (Auspicious Timings)
29 जून को स्नान, सत्यनारायण भगवान की कथा और लक्ष्मी पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ चौघड़िया और वैदिक मुहूर्त निम्नलिखित हैं:
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ब्रह्म मुहूर्त (स्नान व साधना): सुबह 04:06 बजे से 04:46 बजे तक
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प्रातः संध्या (सूर्योदय कालीन पूजा): सुबह 04:26 बजे से 05:26 बजे तक
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अभिजीत मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ दोपहर पूजा): सुबह 11:57 बजे से दोपहर 12:52 बजे तक
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विजय मुहूर्त (विशेष कार्यों के लिए): दोपहर 02:44 बजे से शाम 03:40 बजे तक
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गोधूलि मुहूर्त (वट वृक्ष व सायंकाल पूजा): शाम 07:22 बजे से शाम 07:42 बजे तक
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सायं संध्या (दीपदान का समय): शाम 07:23 बजे से रात 08:23 बजे तक
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अमृत काल (महालक्ष्मी साधना मुहूर्त): रात 08:53 बजे से रात 10:40 बजे तक
ज्येष्ठ पूर्णिमा की सरल और प्रामाणिक पूजा विधि
पूर्णिमा के दिन सुख, समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति के लिए शास्त्रों में बताई गई इस विधि से पूजा करनी चाहिए:
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पवित्र स्नान: पूर्णिमा के दिन सुबह सूर्योदय से पहले (ब्रह्म मुहूर्त में) उठें। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करें। यदि ऐसा संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के साफ पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर "गंगे च यमुने चैव..." मंत्र का स्मरण करते हुए स्नान करें।
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व्रत का संकल्प: स्नान के बाद स्वच्छ और अधिमानतः सफेद या पीले रंग के वस्त्र धारण करें। सूर्य देव को जल अर्पित करने के बाद हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत और फूल लेकर ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत का पूरी श्रद्धा से संकल्प लें।
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मुख्य विष्णु-लक्ष्मी पूजा: घर के ईशान कोण (पूजा स्थान) को साफ करके एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। श्री हरि को पीले फूल, पीले फल, चंदन और धूप-दीप अर्पित करें। माता लक्ष्मी को लाल गुलाब, श्रृंगार सामग्री और अक्षत चढ़ाएं।
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श्री सत्यनारायण कथा: पूजा के समय भगवान सत्यनारायण की कथा का पाठ करें या उसे ध्यानपूर्वक सुनें। कथा के उपरांत पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) और आटे को भूनकर बनाए गए चूर्ण (पंजीरी) का भोग लगाएं। याद रखें, विष्णु जी के भोग में तुलसी दल (पत्ता) अवश्य शामिल करें।
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वट सावित्री पूजा (सुहागिनों के लिए): सुहागिन महिलाएं इस दिन सोलह श्रृंगार करके बरगद (वट) के पेड़ की पूजा करती हैं। वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करके सूत के धागे से तीन या सात बार परिक्रमा की जाती है और सत्यवान-सावित्री की कथा सुनी जाती है।
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चंद्र अर्घ्य और दान: शाम के समय (7:16 बजे के बाद) जब आकाश में चंद्रदेव का उदय हो जाए, तब एक तांबे या चांदी के पात्र में शुद्ध जल, कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल मिलाकर उन्हें अर्घ्य दें। इसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को तिल, सफेद कपड़े, अन्न, कपूर या धन का दान करें।