राजस्थान में मानसून की बेरुखी से गहराया संकट: सामान्य से काफी कम बारिश ने बढ़ाई किसानों की धड़कनें

राजस्थान में मानसून की बेरुखी से गहराया संकट: सामान्य से काफी कम बारिश ने बढ़ाई किसानों की धड़कनें

देश के तमाम राज्यों में जहां एक तरफ झमाझम बारिश से नदियां उफान पर हैं और मौसम सुहाना बना हुआ है, वहीं अपनी रंगीन संस्कृति के लिए मशहूर मरुधरा राजस्थान में मानसून इस बार बुरी तरह बेरुखी अपनाए हुए है। मौसम विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्य में बारिश का कुल घाटा बढ़कर अब सीधे तौर पर 28 फीसदी तक पहुंच गया है। पिछले कई हफ्तों से आसमान में बादलों के मंडराने के बावजूद पानी न बरसने से खेती-किसानी का पूरा चक्र गड़बड़ा गया है। राज्य के कई जिलों में सूखे जैसे हालात बनते नजर आ रहे हैं, जिससे खरीफ की मुख्य फसलों की बुवाई कर चुके किसानों के माथे पर चिंता की गहरी सलवटें साफ तौर पर देखी जा सकती हैं।

अन्नदाताओं के माथे पर चिंता की सलवटें: सूखे खेतों और कुम्हलाती फसलों को देखकर डरे ग्रामीण इलाकों के लोग

राजस्थान के ग्रामीण और कृषि प्रधान अंचलों—विशेष तौर पर शेखावाटी, पश्चिमी राजस्थान और कई अन्य जिलों—में हालात बेहद डरावने होते जा रहे हैं। किसानों ने कर्ज लेकर और अपनी जमा-पूंजी लगाकर बाजरा, ग्वार, मूंग और तिलहन जैसी फसलों की बुवाई तो कर दी थी, लेकिन समय पर बारिश न होने के कारण अब उनके खेत चटकने लगे हैं और फसलें समय से पहले ही कुम्हलाने लगी हैं। ट्यूबवेल और कैनाल के पानी के सहारे थोड़ी-बहुत उम्मीद बची थी, लेकिन भूजल स्तर नीचे खिसकने के कारण वह सहारा भी अब नाकाफी साबित हो रहा है। अन्नदाताओं की आंखों के सामने उनकी मेहनत के बर्बाद होने का यह मंजर पूरे इलाके में मायूसी का माहौल पैदा कर रहा है।

आधुनिक Generative AI वेदर एनालिसिस और कृषि विजन: आने वाले दिनों में राहत की कितनी उम्मीद

आधुनिक Generative AI वेदर प्रेडिक्शन सिस्टम्स और कृषि मौसम विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान के इस मानसून घाटे की मुख्य वजह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठने वाली मानसूनी हवाओं का कमजोर पड़ना और टर्फ लाइन का अपनी सामान्य स्थिति से उत्तर की ओर खिसक जाना है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का यह भी अनुमान है कि आने वाले कुछ दिनों में एक नया लो-प्रेशर सिस्टम एक्टिव हो सकता है, जिससे राज्य के कुछ हिस्सों में हल्की से मध्यम बारिश की उम्मीद बंध सकती है। फिर भी, कुल मिलाकर जिस मात्रा में पानी की आवश्यकता इस सीजन में होनी चाहिए थी, उसकी भरपाई करना अब काफी मुश्किल नजर आ रहा है, जिससे कृषि वैज्ञानिकों ने जल संरक्षण और वैकल्पिक फसलों के प्रबंधन पर जोर देना शुरू कर दिया है।

लखनऊ और उत्तर प्रदेश के कृषि विशेषज्ञों की नजर: पड़ोसी राज्यों के सूखे और मानसूनी उतार-चढ़ाव पर टिकी हैं निगाहें

राजस्थान के इस गंभीर मानसूनी संकट और बारिश के भारी घाटे की गूंज उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक सुनाई दे रही है। लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद और आंचलिक मौसम केंद्र के विशेषज्ञ इस बात का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं कि किस प्रकार उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में मानसून का वितरण असमान होता जा रहा है। इस बीच, राजस्थान के स्थानीय बाजारों और ग्रामीण चौपालों पर हर जुबान पर बस यही चर्चा है कि यदि जल्द ही आसमान से राहत की बूंदें नहीं बरसीं, तो आने वाला समय आर्थिक और कृषि दोनों दृष्टियों से बहुत बड़ा संकट लेकर आ सकता है।

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