चंडीगढ़ में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस बल प्रयोग से भड़के सिमरनजीत सिंह मान, एफआईआर और ड्रोन से आंसू गैस के इस्तेमाल पर उठाए तीखे सवाल
पंजाब की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट देखने को मिल रही है, जब शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के प्रमुख और पूर्व सांसद सिमरनजीत सिंह मान ने चंडीगढ़ प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई पर तीखा प्रहार किया है। राजधानी चंडीगढ़ में हाल ही में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज, वाटर कैनन और आधुनिक तकनीक यानी ड्रोन के जरिए आंसू गैस के गोले छोड़े जाने की घटना ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। सिमरनजीत सिंह मान ने इस पूरी कार्रवाई को अलोकतांत्रिक, क्रूर और मानवाधिकारों का हनन करार देते हुए प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर पर भी कड़ा एराज जताया है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को रखने वाले नागरिकों और नेताओं के खिलाफ इस तरह की तानाशाहीपूर्ण कार्रवाई किसी भी कीमत पर सहन नहीं की जाएगी। इस बयान के सामने आने के बाद से पंजाब और चंडीगढ़ के राजनीतिक हलकों में जुबानी जंग तेज हो गई है और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
क्या था पूरा मामला और चंडीगढ़ में क्यों भड़का था प्रदर्शन
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब विभिन्न मुद्दों और मांगों को लेकर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने चंडीगढ़ की तरफ कूच किया और प्रशासनिक सीमाओं पर अपनी आवाज बुलंद करनी चाही। प्रदर्शनकारी अपनी न्यायसंगत मांगों को लेकर सरकार और प्रशासन का ध्यान आकर्षित करना चाहते थे, लेकिन जब उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया, तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। प्रशासन का यह तर्क था कि कानून-व्यवस्था और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था, क्योंकि भीड़ अनियंत्रित हो रही थी। हालांकि, प्रदर्शनकारियों और उनके समर्थकों का आरोप है कि वे पूरी तरह से शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे और पुलिस ने बिना किसी उकसावे के उन पर बल प्रयोग करना शुरू कर दिया। इसी विरोध प्रदर्शन के दौरान स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारों के साथ-साथ आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा, जिससे कई लोग घायल भी हो गए।
ड्रोन से आंसू गैस छोड़ने और एफआईआर दर्ज करने पर सिमरनजीत मान का कड़ा हमला
इस घटना के बाद सबसे तीखी प्रतिक्रिया सिमरनजीत सिंह मान की ओर से आई है। उन्होंने चंडीगढ़ पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ ड्रोन के माध्यम से आंसू गैस के गोले छोड़े जाने की तकनीक पर गहरी आपत्ति जताई है। मान ने कहा कि क्या चंडीगढ़ पुलिस अब अपने ही देश के नागरिकों के खिलाफ युद्ध जैसे हथियारों का इस्तेमाल करेगी? एक तरफ जहां सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को डराने और कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही, पुलिस द्वारा इस प्रदर्शन के सिलसिले में कई नेताओं और अज्ञात लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज किए जाने को उन्होंने बदले की भावना से की गई कार्रवाई बताया है। उनका यह साफ तौर पर कहना था कि सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए पुलिस बल का दुरुपयोग कर रही है और जनता की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और मानवाधिकारों का सुलगता सवाल
सिमरनजीत सिंह मान के इस आक्रामक रुख के बाद राज्य के अन्य राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का भी यह मानना है कि विरोध प्रदर्शन करना हर भारतीय नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, और यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण हो तो प्रशासन को संवाद के जरिए मामलों को सुलझाना चाहिए न कि दमनकारी नीतियों का सहारा लेना चाहिए। इस घटना ने एक बार फिर से इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या आधुनिक युग में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का हनन किया जाना उचित है। विपक्षी नेता इस मुद्दे को लगातार तूल दे रहे हैं और प्रशासन से यह मांग कर रहे हैं कि प्रदर्शनकारियों पर दर्ज झूठे मुकदमों को तुरंत वापस लिया जाए तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच बैठाकर कार्रवाई की जाए।
आने वाले दिनों में और गहरा सकता है राजनीतिक संकट
चंडीगढ़ की इस घटना और सिमरनजीत सिंह मान के तीखे बयानों से यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा आसानी से ठंडा होने वाला नहीं है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग पर लगातार यह दबाव बढ़ रहा है कि वे अपनी इस कार्रवाई का स्पष्टीकरण दें। दूसरी ओर, अकाली दल (अमृतसर) और अन्य सहयोगी संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही गिरफ्तार किए गए लोगों को रिहा नहीं किया गया और एफआईआर वापस नहीं ली गई, तो वे इस आंदोलन को और अधिक बड़े स्तर पर राज्यव्यापी रूप देंगे। जनता के बीच भी इस बात को लेकर चर्चाएं गर्म हैं कि आखिर जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों को अपनी बात रखने के लिए किस हद तक संघर्ष करना पड़ेगा। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की बारीक रेखा को एक बार फिर से बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।