TMC Political Crisis: तृणमूल कांग्रेस में ऐतिहासिक बगावत; 20 बागी सांसदों का कम चर्चित 'NCPI' पार्टी में विलय, जानें इस नई पार्टी का पूरा इतिहास
पश्चिम बंगाल और देश की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी राजनीतिक खबर सामने आ रही है। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहा अंदरूनी संकट रविवार (14 जून 2026) को उस समय अपने चरम पर पहुंच गया, जब पार्टी के 20 बागी सांसदों ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए बेहद कम चर्चित राजनीतिक दल 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में अपने गुट के पूर्ण विलय (Merger) की आधिकारिक घोषणा कर दी।
इस बगावत के साथ ही बागी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) ओम बिरला से मुलाकात की और संसद के निचले सदन में टीएमसी से अलग बैठने की नई व्यवस्था करने का लिखित अनुरोध किया है। दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल टीएमसी ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए बागी गुट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
असली TMC की लड़ाई पहुंचेगी अदालत; स्पीकर ने की 20 हस्ताक्षरों की पुष्टि
लोकसभा के वरिष्ठ सदस्य सुदीप बंदोपाध्याय के नेतृत्व में बागी गुट ने साफ कर दिया है कि वे केवल अलग बैठने तक सीमित नहीं रहेंगे। बंदोपाध्याय ने मीडिया से कहा कि उनका गुट ही 'असली तृणमूल कांग्रेस' है और वे इसके लिए चुनाव आयोग से लेकर अदालतों तक कानूनी लड़ाई लड़ेंगे तथा पार्टी के आधिकारिक चुनाव चिह्न (Two Flowers & Grass) पर अपना दावा पेश करेंगे।
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हस्ताक्षरों का सत्यापन: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात के बाद बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने बताया कि कुल 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत के इस आधिकारिक पत्र पर अपने हस्ताक्षर किए हैं। बागी गुट के दावों के अनुसार, लोकसभा स्पीकर ने खुद उन सभी 20 सांसदों के हस्ताक्षरों की भौतिक पुष्टि (Verification) कर ली है।
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भूपेंद्र यादव से मुलाकात के सियासी मायने: लोकसभा अध्यक्ष से मिलने से ठीक पहले इन बागी सांसदों ने केंद्र सरकार के कद्दावर मंत्री भूपेंद्र यादव के निवास स्थान पर जाकर उनसे गुप्त मुलाकात की थी, जिससे इस बगावत के पीछे एनडीए (NDA) के रणनीतिक समर्थन की अटकलें तेज हो गई हैं।
अभिषेक बनर्जी का पलटवार: 'संविधान में अब विभाजन का कोई बचाव नहीं'
इस ऐतिहासिक टूट के तुरंत बाद टीएमसी संसदीय दल के नेता और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने मोर्चा संभाला। पार्टी की ओर से सांसद कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने रविवार को ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अभिषेक बनर्जी का एक कड़ा विरोध-पत्र सौंपा, जिसमें बागी गुट को किसी भी प्रकार की संसदीय मान्यता न देने की गुहार लगाई गई है।
अभिषेक बनर्जी ने अपने पत्र में सर्वोच्च अदालत के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए निम्नलिखित 3 मुख्य कानूनी दलीलें पेश की हैं:
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10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law): बनर्जी ने महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट (Shiv Sena-NCP Case) में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा दिए गए फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत अब किसी भी दल के भीतर 'विभाजन' (Split) को कोई कानूनी संरक्षण या बचाव उपलब्ध नहीं है। कानून केवल मूल राजनीतिक दल को मान्यता देता है, उसके भीतर के किसी विरोधी गुट को नहीं।
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दो-तिहाई बहुमत और विलय की दोहरी शर्त: पत्र में स्पष्ट किया गया है कि कानून के तहत किसी भी विलय को दलबदल विरोधी कानून से बचाने के लिए दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए—पहला, दो-तिहाई जनप्रतिनिधियों का समर्थन और दूसरा, मूल राजनीतिक पार्टी का किसी अन्य पार्टी में वैधानिक विलय। इनमें से महज एक शर्त का पूरा होना काफी नहीं है।
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एकतरफा फैसला न हो: टीएमसी ने स्पीकर से अनुरोध किया है कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) को सदन में एक ही अविभाजित पार्टी माना जाए और बागियों के किसी भी दावे पर अंतिम फैसला लेने से पहले मूल पार्टी को अपना आधिकारिक पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाए।
आखिर क्या है NCPI पार्टी? जानिए इसका पूरा इतिहास और नेतृत्व
ममता बनर्जी की टीएमसी जैसी कद्दावर राष्ट्रीय पहचान वाली पार्टी को चुनौती देने के लिए बागियों ने जिस NCPI का दामन थामा है, उसका इतिहास बेहद छोटा और क्षेत्रीय रहा है:
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पार्टी का स्वरूप: नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में एक रजिस्टर्ड लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPP) के रूप में दर्ज है। राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर अब तक इसकी कोई खास राजनीतिक या संसदीय मौजूदगी नहीं थी।
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रजिस्ट्रेशन और पता: चुनाव आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, NCPI का आधिकारिक तौर पर पंजीकरण 20 जनवरी 2023 को हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि इस पार्टी का पंजीकृत मुख्यालय (Address) पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में स्थित है, लेकिन इसने अपनी शुरुआती चुनावी सक्रियता पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में दिखाई थी।
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त्रिपुरा चुनाव का फ्लॉप शो: पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि, तब इसका प्रदर्शन इतना खराब था कि इसके उम्मीदवारों को नोटा (NOTA) से भी कम या उसके बराबर वोट मिले थे और सभी की जमानत जब्त हो गई थी।
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2026 में अचानक चमकी किस्मत: जून 2026 में टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों के अचानक इस पार्टी में विलय की घोषणा से इस गैर-मान्यता प्राप्त दल की संसद में सीधी और भारी एंट्री हो गई है। इसके साथ ही पार्टी ने केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने का भी एलान किया है।
संस्थापक और संगठनात्मक नेतृत्व (Leadership)
सार्वजनिक और आधिकारिक तौर पर उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, इस पार्टी के संचालन और गठन में मुख्य रूप से बंगाली भाषी क्षेत्रों के 'कुंडू परिवार' की केंद्रीय भूमिका रही है:
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पार्टी अध्यक्ष: उत्तिया कुंडू (Uttiya Kundu) वर्तमान में इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
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कोषाध्यक्ष (Treasurer): श्यूली कुंडू (Shewly Kundu) के पास पार्टी के वित्तीय प्रबंधन और ट्रेजरर की जिम्मेदारी है।
वैचारिक उद्देश्य: NCPI खुद को धुर 'राष्ट्रवादी' और 'नागरिक-केंद्रित' (Citizen-Centric) राजनीति से जोड़ती है। बहरहाल, देश के दलबदल कानून की कड़े कसौटियों के बीच इस बगावत और विलय को लोकसभा स्पीकर और देश की अदालतें कितनी संवैधानिक मान्यता देती हैं, इस पर पूरे देश के राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें टिकी हुई हैं।