सड़कों पर 'मौत का सफर': भारत में पैदल चलने वालों के लिए सबसे बड़ा खतरा
भारत की सड़कों पर सफर करना अब केवल वाहन चालकों के लिए ही नहीं, बल्कि पैदल चलने वाले आम नागरिकों के लिए भी सबसे खतरनाक और जानलेवा साबित हो रहा है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी की गई नवीनतम और बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, साल 2019 से 2024 के बीच देश में सड़क दुर्घटनाओं के कारण 1.8 लाख से अधिक पैदल यात्रियों की दर्दनाक मौत हो चुकी है।
आंकड़ों का विश्लेषण करें तो औसतन हर साल 30,500 से ज्यादा लोग सिर्फ इसलिए मार दिए जाते हैं क्योंकि वे सड़क पर पैदल चल रहे थे। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में पैदल यात्रियों की मृत्यु दर पूरी दुनिया में सबसे अधिक है, जो देश के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।
मौत के राष्ट्रीय राजमार्ग: 31 फीसदी पैदल यात्री एक्सप्रेसवे और हाईवे पर बने शिकार
सरकारी रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े नीति निर्माताओं और सड़क निर्माण एजेंसियों की नींद उड़ाने वाले हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इस 5 साल की अवधि के दौरान पैदल यात्रियों की कुल मौतों में से लगभग 31% भीषण हादसे अकेले राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) पर हुए हैं।
इसके अलावा, साल 2024 के लेटेस्ट डेटा से यह भी साफ हुआ है कि पैदल चलने वालों की लगभग 54% मौतों के पीछे तेज रफ्तार दोपहिया वाहनों (Bikes) और कारों की सीधी टक्कर थी। सड़क सुरक्षा के जानकारों का कहना है कि भारत में सुरक्षित फुटपाथ (Footpaths) और जेब्रा क्रॉसिंग जैसे उचित बुनियादी ढांचे के घोर अभाव के कारण लोग अपनी जान हथेली पर रखकर सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पैदल चलना अब नागरिकों का 'मौलिक अधिकार'
सड़कों पर बहते खून और बढ़ते शवों के आंकड़ों पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने बेहद कड़ा संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट किया है कि सड़क पर सुरक्षित चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है।
शीर्ष अदालत ने साफ किया कि फुटपाथ का उपयोग करने का पैदल यात्रियों का यह अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) के तहत पूरी तरह से गारंटीकृत है। इसके साथ ही, अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे सभी सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए स्पष्ट रूप से सीमांकित फुटपाथ बनाने के लिए एक सख्त और प्रभावी कानून तैयार करें।
तमिलनाडु और बिहार में सबसे बुरा हाल: देखिए राज्यों की खौफनाक लिस्ट
सड़क परिवहन मंत्रालय की 2024 की इस रिपोर्ट के मुताबिक, पैदल यात्रियों के लिए देश का सबसे असुरक्षित राज्य तमिलनाडु बनकर उभरा है, जहां सबसे ज्यादा 4,712 पैदल यात्रियों की मौत दर्ज की गई। इस सूची में दूसरे पायदान पर बिहार (4,149 मौतें) है, जबकि तीसरे नंबर पर महाराष्ट्र (3,344) और चौथे स्थान पर पश्चिम बंगाल (3,241) मौजूद है।
हैरानी की बात यह है कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले देश के 53 प्रमुख महानगरों और बड़े शहरों में कुल 4,328 पैदल यात्रियों की मौत हुई, जो देश के कुल आंकड़ों का केवल 11.8% है। यानी शहरों से कई गुना ज्यादा पैदल यात्री ग्रामीण इलाकों और कस्बों से गुजरने वाले हाईवे पर काल के गाल में समा रहे हैं।
केवल गाड़ियों के लिए बन रही हैं सड़कें: बुजुर्ग, बच्चे और दिव्यांग सबसे ज्यादा बेबस
युवाओं के नेतृत्व वाले सामाजिक संगठन 'इंडिया रोड सेफ्टी कैंपेन' के प्रमुख अमर श्रीवास्तव ने कहा कि ये आंकड़े साफ तौर पर दर्शाते हैं कि सरकारी सड़क एजेंसियों को बड़े शहरी क्षेत्रों के बाहर होने वाले हादसों के सटीक कारणों का पता लगाने की सख्त जरूरत है।
वहीं, सड़क सुरक्षा का जिम्मा संभाल चुके पूर्व संयुक्त सचिव अभय दामले ने बताया कि हमारे पास 'इंडियन रोड्स कांग्रेस' द्वारा निर्धारित फुटपाथों के बेहद विश्वस्तरीय मानक कागजों पर मौजूद हैं, लेकिन मुख्य समस्या मानकों की कमी नहीं बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने में सिस्टम की पूरी विफलता है। आज देश की ज्यादातर सड़कें केवल गाड़ियों की रफ्तार को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं, जिससे बच्चे, वरिष्ठ नागरिक और दिव्यांग व्यक्ति सबसे ज्यादा जोखिम में आ गए हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के एमिकस क्यूरी ने राजमार्गों पर पैदल चलने वालों के प्रवेश निषेध के स्पष्ट साइन बोर्ड (Warning Boards) लगाने का भी महत्वपूर्ण सुझाव दिया है।