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करदाताओं के पैसे पर डाका! 1,537 करोड़ का कर्ज सिर्फ 73 करोड़ में रफा-दफा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'बैंक, एआरसी और कर्जदारों में है गहरी सांठगांठ'

देश के बैंकिंग सिस्टम और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने एक बेहद सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कई मामलों में बैंकों, परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों (Asset Reconstruction Companies - ARC) और बड़े कर्जदारों (उधारकर्ताओं) के बीच एक गहरी सांठगांठ (Nest of Collusion) दिखाई देती है। कोर्ट ने साफ लफ्जों में चेतावनी दी कि बैंकों के पास जमा पैसा जनता और करदाताओं (Taxpayers) की गाढ़ी कमाई का होता है। इसलिए, कर्ज देने के बाद उसकी वसूली के लिए बैंकों को बेहद गंभीर प्रयास करने होंगे। कर्ज की रकम को वापस न लाना और डिफॉल्टर्स पर ढीली कार्रवाई करना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।

क्या है 1,537 करोड़ रुपये का यह पूरा मामला?

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत को केवल सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की चिंता है, जिसे असल में देश और जनता के कल्याण के लिए खर्च किया जाना चाहिए था।

सर्वोच्च अदालत ने यह तल्ख टिप्पणी उस जनहित याचिका पर की, जिसमें आरोप लगाया गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSU Banks) का 1,537 करोड़ रुपये का बकाया कर्ज दो एआरसी (ARC) के माध्यम से मात्र 73.50 करोड़ रुपये के मामूली घाटे पर सेटल (निपटाया) कर दिया गया। इस गंभीर वित्तीय हेराफेरी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और अन्य संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।

'यह तो हिमशैल का सिर्फ एक सिरा है' — कोर्ट में फूटा वकीलों का गुस्सा

सुनवाई के दौरान पीठ ने तनावग्रस्त संपत्तियों (NPA) के निपटान के मौजूदा तरीकों पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। पीठ ने माना कि हालांकि वे बैंकों के व्यावसायिक फैसलों (Commercial Wisdom) के बीच में दखल देने की सीमाओं को समझते हैं, लेकिन जहां सीधे तौर पर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा हो, वहां आंखें बंद नहीं की जा सकतीं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने कोर्ट को बताया कि देश में भारी मात्रा में लोन राशि को भारी डिस्काउंट (छूट) पर एआरसी कंपनियों को ट्रांसफर किया जा रहा है, जिससे देश के राजस्व को भारी नुकसान हो रहा है। उपाध्याय ने जोर देकर कहा, "यह कोई इकलौता मामला नहीं है। यह तो बैंकिंग सेक्टर में चल रहे बड़े खेल का यानी हिमशैल का सिर्फ एक छोटा सा सिरा (Tip of the Iceberg) है।"

हाई-लेवल न्यायिक आयोग और CBI जांच की मांग

अधिवक्ता अश्वनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में सीधे तौर पर एआरसी कंपनियों, सरकारी बैंकों और नोएडा स्थित एक बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचा) फर्म के बीच हुए कथित बैंकिंग घोटाले की जांच की मांग की गई है। याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि:

  • इस पूरे कॉर्पोरेट और बैंकिंग फ्रॉड की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए।

  • इस समिति में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), सेबी (SEBI), गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO), प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीबीआई (CBI) के शीर्ष अधिकारियों को शामिल किया जाए।

नोएडा की इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी का 'शेल कंपनियों' वाला खेल

याचिका के अनुसार, इस पूरे विवाद के केंद्र में नोएडा की एक बुनियादी ढांचा निर्माण कंपनी है, जिसने साल 2012 और 2015 के बीच भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के नेतृत्व वाले सात प्रमुख बैंकों के एक कंसोर्टियम (संघ) से लगभग 912 करोड़ रुपये का भारी-भरकम कर्ज लिया था।

इसके बाद, साल 2018 में इस कंपनी का एक विस्तृत फोरेंसिक ऑडिट (Forensic Audit) कराया गया। इस ऑडिट रिपोर्ट में ऐसे चौंकाने वाले और पुख्ता सबूत मिले, जिनसे पता चला कि 902 करोड़ रुपये से अधिक की राशि को नियमों को ताक पर रखकर शेल कंपनियों (फर्जी कंपनियों), कागजों पर चल रहे गैर-मौजूद वेंडर्स, अघोषित बैंक खातों और संदिग्ध लेनदेन के जरिए इधर-उधर (डाइवर्ट) कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस पूरे नेक्सस को तोड़ने और एआरसी के कामकाज के तरीकों की बारीकी से जांच करने के सख्त निर्देश दिए हैं।

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