सुप्रीम कोर्ट में हाई-वोल्टेज ड्रामा: याचिकाकर्ता ने जजों को कहा 'न्यायिक सेवक' और CJI को दीं गालियां; जानें क्यों कोर्ट ने नहीं की अवमानना की कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट में हाई-वोल्टेज ड्रामा: याचिकाकर्ता ने जजों को कहा 'न्यायिक सेवक' और CJI को दीं गालियां; जानें क्यों कोर्ट ने नहीं की अवमानना की कार्रवाई

देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) से एक बेहद हैरान और विचलित कर देने वाली घटना सामने आई है। कोर्ट रूम में सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता ने मर्यादा और कानून की सारी हदें पार कर दीं। याचिकाकर्ता ने न सिर्फ पीठ के जजों को 'न्यायिक सेवक' कहकर संबोधित किया, बल्कि बाहर निकाले जाते समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ भी जमकर अपशब्दों और गालियों का इस्तेमाल किया।

इस अमर्यादित और आक्रामक व्यवहार के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट के जजों ने न्याय और मानवीय संवेदनाओं की एक ऐसी अनूठी मिसाल पेश की, जिसकी चर्चा अब पूरे देश में हो रही है। आइए जानते हैं क्या था यह पूरा मामला और अदालत ने इस पर क्या ऐतिहासिक टिप्पणी की।

क्यों गुस्से से लाल था याचिकाकर्ता? जानें घटना का कारण

यह पूरा मामला याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप से जुड़ा हुआ है।

  • हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती: प्रबल प्रताप इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के एक पुराने आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पुलिस को उनकी शिकायत पर सीधे एफआईआर (FIR) दर्ज करने का आदेश देने से इनकार कर दिया था।

  • निजी शिकायत का मामला: हाईकोर्ट का कहना था कि याचिकाकर्ता की अर्जी को एक 'निजी शिकायत' (Private Complaint) माना जाए, न कि पुलिस केस।

  • एसीपी के खिलाफ मांग: इसी आदेश से नाराज होकर प्रबल प्रताप ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और उत्तर प्रदेश के लखनऊ में तैनात एक एसीपी (ACP) के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने की मांग कर रहे थे।

कोर्ट रूम में क्या हुआ? मर्यादा तार-तार करने वाला वाकया

 

1.जजों को कहा 'न्यायिक सेवक':पहली आपत्ति.

सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप ने जजों को 'योर ऑनर' या 'माई लॉर्ड' कहने के बजाय 'न्यायिक सेवक' ($Judicial\ Servant$) कहकर संबोधित किया, जिस पर जजों ने कड़ी आपत्ति जताई।

2.आक्रामक हुआ व्यवहार:हवा में उछाले कागज.

जब कोर्ट ने उनके तर्कों पर असहमति जताई, तो याचिकाकर्ता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने अपने हाथ में मौजूद केस के सारे कागजात हवा में उछाल दिए।

3.CJI को दीं भद्दी गालियां:सुरक्षाकर्मियों से झड़प.

हालात बिगड़ते देख कोर्ट रूम के सुरक्षाकर्मियों ने उसे बाहर निकालना शुरू किया। बाहर जाते समय उसने भारी गुस्से में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को सरेआम भद्दी गालियां और अपशब्द कहे।

 

बेंच की प्रतिक्रिया: कार्रवाई के बजाय दिखाई दरियादिली

इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की दो सदस्यीय खंडपीठ (Bench) कर रही थी। सामान्य तौर पर, देश की सर्वोच्च अदालत में इस तरह की फूहड़ता और गाली-गलौज करने पर व्यक्ति को तुरंत हिरासत में ले लिया जाता है और उस पर अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का गंभीर मुकदमा चलाया जाता है, जिसमें जेल की सजा का प्रावधान है।

लेकिन, जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने एक अलग ही रुख अपनाया:

अदालत की मानवीय टिप्पणी: कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अमर्यादित व्यवहार और अपशब्दों को सुनने के बाद भी उसके खिलाफ कोई दंडात्मक या अवमानना की कार्रवाई करने से साफ इंकार कर दिया। जजों ने कहा कि वे याचिकाकर्ता की मानसिक स्थिति और उसकी चरम हताशा (Frustration) को समझ सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस समय उनके मन में उस व्यक्ति के प्रति गुस्से के बजाय केवल और केवल सहानुभूति (Sympathy) है।

क्या हुआ मामले का अंतिम अंजाम?

सुप्रीम कोर्ट ने कानून के दायरे में रहते हुए प्रबल प्रताप की याचिका को पूरी तरह से खारिज (Dismiss) कर दिया, क्योंकि उसमें कोई कानूनी मेरिट नहीं थी। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि वे एक नागरिक की हताशा को समझते हैं, इसलिए कानून को ताक पर रखने के बावजूद उसे सजा नहीं दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह रवैया सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में जजों की संवेदनशीलता के लिए जमकर सराहा जा रहा है।

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