आसाराम बापू को राजस्थान हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत: यौन उत्पीड़न मामले में आजीवन कारावास काट रहे आसाराम को 20 दिन की पैरोल
जोधपुर समाचार: राजस्थान के बहुचर्चित यौन उत्पीड़न मामले में जोधपुर की सेंट्रल जेल में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे आसाराम बापू के समर्थकों और कानूनी टीम के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की गिरती सेहत और लगातार बिगड़ते स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें 20 दिनों की पैरोल मंजूर कर दी है। यह फैसला उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा याचिका पर लंबी सुनवाई के बाद सुनाया गया है। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब आसाराम को इलाज के लिए तय समय सीमा तक जेल से बाहर रहने की अनुमति मिलेगी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यह पैरोल पूरी तरह से चिकित्सीय आधार पर दी गई है और इसका इस्तेमाल केवल इलाज के उद्देश्य से ही किया जा सकेगा।
वर्ष 2013 में नाबालिग से यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार होने और 2018 में पोक्सो (POCSO) अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद से आसाराम लगातार जेल में बंद हैं। पिछले कुछ महीनों में उन्हें हृदय रोग, सांस लेने में तकलीफ और वृद्धावस्था से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों के कारण बार-बार जोधपुर के एम्स (AIIMS) अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और पैरोल की मुख्य वजह
आसाराम की ओर से उनके विधिक सलाहकारों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया था कि 80 वर्ष से अधिक आयु के आसाराम कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। उनकी धमनियों में रुकावट (आर्टरी ब्लॉकेज) के साथ-साथ सीने में दर्द और अन्य पुरानी बीमारियां उनके जीवन के लिए खतरा बनी हुई हैं। याचिका में कहा गया था कि वे अपनी पसंद के आयुर्वेदिक या विशेष चिकित्सा केंद्र में इलाज कराना चाहते हैं, जिसके लिए उन्हें अंतरिम राहत या पैरोल दी जानी चाहिए।
दूसरी ओर, राज्य सरकार और अभियोजन पक्ष ने पैरोल का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि आसाराम एक गंभीर और संवेदनशील मामले में दोषी ठहराए गए हैं। उन्हें जेल से बाहर भेजने पर कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने और उनके समर्थकों की भारी भीड़ जुटने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने, मेडिकल बोर्ड की विस्तृत जांच रिपोर्ट का अवलोकन करने और मानव अधिकारों के तहत स्वास्थ्य देखभाल के अधिकार को प्राथमिकता देते हुए हाईकोर्ट ने 20 दिनों की अस्थाई पैरोल मंजूर कर ली।
कोर्ट द्वारा तय की गई कड़ी शर्तें और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
राजस्थान हाईकोर्ट ने पैरोल की मंजूरी देते हुए स्पष्ट आदेश दिए हैं कि यह राहत बिना किसी ढील के केवल और केवल स्वास्थ्य उपचार के लिए है। अदालत ने पुलिस और जेल प्रशासन को कई सख्त हिदायतें दी हैं, ताकि इस अवधि के दौरान शांति व्यवस्था कायम रहे और किसी भी प्रकार की अव्यवस्था न फैले।
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कड़ी पुलिस सुरक्षा: आसाराम को पैरोल के दौरान हर समय राजस्थान पुलिस और स्थानीय सुरक्षा बलों की सख्त निगरानी में रखा जाएगा। उनके साथ पुलिस का सशस्त्र दस्ता मौजूद रहेगा।
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सार्वजनिक सभाओं पर पूर्ण प्रतिबंध: पैरोल अवधि के दौरान आसाराम किसी भी तरह की जनसभा, धार्मिक प्रवचन, या सार्वजनिक कार्यक्रम का आयोजन नहीं कर सकेंगे।
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भक्तों और समर्थकों से मिलने पर रोक: कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इलाज के दौरान उनके आश्रम या अस्पताल में समर्थकों की भीड़ जुटाने की अनुमति नहीं होगी। केवल उनके अधिकृत परिजन और डॉक्टरों की टीम ही उनसे मिल सकेगी।
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सुरक्षा खर्च का वहन: सुरक्षा बलों की तैनाती और परिवहन में होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा नियमों के अनुसार स्वयं याचिकाकर्ता द्वारा वहन किया जाएगा।
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भौतिक सीमा का पालन: जिस अस्पताल या स्थान पर उनका उपचार चलेगा, वहीं तक उनकी आवाजाही सीमित रहेगी। इलाज पूरा होते ही या 20 दिन की अवधि समाप्त होते ही उन्हें वापस जोधपुर सेंट्रल जेल में सरेंडर करना होगा।
मामले की पृष्ठभूमि: 2013 से लेकर सजा तक का पूरा घटनाक्रम
इस पूरे मामले की शुरुआत अगस्त 2013 में हुई थी, जब उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की रहने वाली एक नाबालिग छात्रा ने आरोप लगाया कि जोधपुर के पास मणाई आश्रम में आसाराम ने उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता उस समय आसाराम के छिंदवाड़ा स्थित आश्रम के हॉस्टल में पढ़ाई कर रही थी और इलाज के नाम पर उसे जोधपुर लाया गया था।
घटना की जानकारी मिलते ही दिल्ली के कमला मार्केट थाने में जीरो एफआईआर दर्ज की गई, जिसे बाद में जांच के लिए जोधपुर स्थानांतरित कर दिया गया। जोधपुर पुलिस की टीम ने 31 अगस्त और 1 सितंबर 2013 की मध्यरात्रि में मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित आश्रम से आसाराम को हिरासत में लिया और गिरफ्तार कर जोधपुर ले आई। इसके बाद से ही वे लगातार जोधपुर की सेंट्रल जेल में बंद रहे।
लंबी कानूनी प्रक्रिया, दर्जनों गवाहों के बयान और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर 25 अप्रैल 2018 को जोधपुर की विशेष पोक्सो अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने आसाराम को पोक्सो कानून और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए अंतिम सांस तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में उनके दो सहयोगियों को भी अलग-अलग अवधि की सजा सुनाई गई थी।
जोधपुर और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर
हाईकोर्ट के फैसले के तुरंत बाद जोधपुर पुलिस कमिश्नरेट और स्थानीय प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया है। पूर्व में जब आसाराम को सजा सुनाई गई थी या जब भी उन्हें अस्पताल ले जाया जाता था, तब देशभर से हजारों की संख्या में उनके समर्थक जोधपुर की सड़कों पर जमा हो जाते थे। इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए पुलिस प्रशासन ने अग्रिम सुरक्षा योजना तैयार कर ली है।
जोधपुर पुलिस कमिश्नर ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जेल परिसर, एम्स अस्पताल और संभावित उपचार केंद्रों के आसपास धारा 144 या प्रासंगिक सुरक्षा नियम लागू रहेंगे। शहर के प्रमुख प्रवेश द्वारों, रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंडों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि बाहर से आने वाले संदिग्ध समूहों या समर्थकों की चेकिंग की जा सके। सोशल मीडिया पर भी साइबर सेल की पैनी नजर बनी हुई है ताकि किसी भी तरह की अफवाह या भ्रामक सूचना न फैलाई जा सके।
आगे की कानूनी राह और चिकित्सा प्रक्रिया का समयबद्ध प्लान
20 दिनों की यह पैरोल शुरू होने के साथ ही आसाराम की कानूनी टीम और मेडिकल एक्सपर्ट्स उनके आगे के इलाज की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार, उन्हें किसी विख्यात आयुर्वेदिक चिकित्सा संस्थान या सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में ले जाया जा सकता है, जहां हृदय और जोड़ों के दर्द से संबंधित पंचकर्म और अन्य प्राकृतिक उपचार की व्यवस्था होगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस 20 दिन की अवधि के दौरान उनकी सेहत में अपेक्षित सुधार नहीं होता है या कोई गंभीर चिकित्सीय आपात स्थिति उत्पन्न होती है, तो उनकी विधिक टीम हाईकोर्ट के समक्ष पैरोल की अवधि बढ़ाने के लिए दोबारा याचिका दाखिल कर सकती है। हालांकि, यह पूरी तरह से डॉक्टरों की रिपोर्ट और कोर्ट के विवेक पर निर्भर करेगा। फिलहाल 20 दिनों की समय सीमा समाप्त होते ही पुलिस कस्टडी में ही उन्हें वापस जोधपुर सेंट्रल जेल के बैरक में दाखिल होना अनिवार्य होगा।