घर पर प्राकृतिक मौत के बाद कौन से अंग हो सकते हैं दान और किन पर लग जाती है पाबंदी? जानिए कॉर्निया
मृत्यु के बाद किसी अन्य इंसान को नई जिंदगी या नई रोशनी देने से बड़ा कोई मानवीय कार्य नहीं हो सकता। भारत में अंगदान (Organ & Tissue Donation) को लेकर पिछले कुछ वर्षों में जागरूकता तेजी से बढ़ी है। कई लोग अपनी वसीयत या संकल्प पत्र में मृत्यु के बाद अंगदान करने की इच्छा जाहिर करते हैं और परिवार के सदस्य भी अपने दिवंगत प्रियजन की स्मृति को अमर बनाने के लिए उनके अंग दान करना चाहते हैं। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु अस्पताल के आईसीयू (ICU) के बजाय अपने घर पर सामान्य रूप से (Natural / Cardiac Death) होती है, तो परिवारों के सामने सबसे बड़ा असमंजस यह खड़ा होता है कि अब कौन-कौन से अंग दान किए जा सकते हैं। कई बार लोग सोचते हैं कि वे घर पर ही किडनी, लिवर या दिल भी दान कर सकते हैं, जबकि मेडिकल साइंस के नियम इसके बिल्कुल विपरीत हैं। घर पर होने वाली मौत और अस्पताल में होने वाली 'ब्रेन डेथ' के बीच एक बहुत बड़ा जैविक और चिकित्सीय अंतर होता है, जिसे समझना हर नागरिक के लिए बेहद जरूरी है।
ब्रेन डेथ बनाम कार्डियक डेथ: दोनों में मेडिकल अंतर क्या है और क्यों रुक जाता है सॉलिड ऑर्गन्स का दान?
अंगदान के नियमों को समझने के लिए सबसे पहले मृत्यु के दो प्रकारों को समझना आवश्यक है:
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1. कार्डियक डेथ (प्राकृतिक/हार्ट अटैक से मौत - जो आमतौर पर घर पर होती है): जब किसी व्यक्ति का दिल धड़कना हमेशा के लिए बंद कर देता है, तो शरीर में खून का संचार (Blood Circulation) और ऑक्सीजन की सप्लाई उसी पल रुक जाती है। खून न मिलने के कारण कुछ ही मिनटों (3 से 5 मिनट) के भीतर शरीर के सभी प्रमुख ठोस अंग (Solid Organs) 'वार्म इस्केमिया' (Warm Ischemia) की चपेट में आकर हमेशा के लिए खराब हो जाते हैं। इसलिए घर पर कार्डियक डेथ होने पर केवल टिश्यूज (ऊतक) ही दान किए जा सकते हैं, जीवित अंग नहीं।
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2. ब्रेन डेथ (ब्रेन स्टेम डेथ - जो केवल अस्पताल के आईसीयू में होती है): यह स्थिति गंभीर सिर की चोट, ब्रेन हैमरेज या स्ट्रोक के मामलों में होती है जहां मरीज का दिमाग पूरी तरह और स्थायी रूप से काम करना बंद कर देता है, लेकिन वेंटिलेटर और लाइफ सपोर्ट सिस्टम की मदद से उसका दिल धड़कता रहता है और अंगों तक खून और ऑक्सीजन पहुंचती रहती है। ऐसे में आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर ही सॉलिड ऑर्गन्स (जैसे दिल, लिवर, किडनी) को सुरक्षित निकालकर ट्रांसप्लांट किया जाता है।
घर पर मौत के बाद कौन से अंग/ऊतक (Tissues) दान किए जा सकते हैं?
यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु घर पर हुई है, तो अगले 4 से 6 घंटे के भीतर निम्नलिखित ऊतक और संरचनाएं सफलतापूर्वक दान की जा सकती हैं:
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1. कॉर्निया / आंखें (Cornea / Eye Donation): यह घर पर होने वाला सबसे आम और सरल दान है। पूरे नेत्र गोलक (Eye Ball) को निकालने के बजाय केवल आंख की पुतली की ऊपरी पारदर्शी परत यानी 'कॉर्निया' को निकाला जाता है। एक व्यक्ति के कॉर्निया दान से दो कॉर्नियल-ब्लाइंड (दृष्टिहीन) लोगों के जीवन में रोशनी लौटाई जा सकती है। इसे मृत्यु के 4 से 6 घंटे (सर्दियों में अधिकतम 8 घंटे) के भीतर लिया जाना चाहिए।
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2. त्वचा (Skin Donation): गंभीर रूप से आग में झुलसे (Burn Victims) और एसिड अटैक पीड़ितों के लिए स्किन ट्रांसप्लांट जीवन रक्षक साबित होता है। मृत्यु के 6 घंटे के भीतर त्वचा का दान किया जा सकता है। स्किन बैंक की टीम घर आकर जांघों और पीठ के पिछले हिस्से से त्वचा की एक बहुत पतली परत (माइक्रोन स्तर) निकालती है। इसमें कोई खून नहीं निकलता और शरीर पर कोई विकृति नहीं आती; बाद में उस हिस्से पर पट्टी बांध दी जाती है।
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3. हड्डियां और टेंडन्स (Bone & Cartilage Donation): बोन कैंसर के मरीजों, दुर्घटना में गंभीर हड्डी टूटने या रिप्लेसमेंट सर्जरी के लिए हड्डियों, जोड़ों और उपास्थि (Cartilage) का दान किया जा सकता है। इसे मृत्यु के 6 से 8 घंटे के भीतर बोन बैंक के विशेषज्ञों द्वारा निकाला जाता है।
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4. हृदय के वाल्व (Heart Valves): भले ही पूरा दिल काम न करे, लेकिन दिल के वाल्व (Aortic / Pulmonary Valves) कार्डियक डेथ के बाद भी घंटों तक जीवित रहते हैं। इन्हें निकालकर बच्चों और हृदय रोगियों में खराब वाल्व बदलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
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5. रक्त वाहिकाएं और नसें (Blood Vessels / Veins): बाईपास सर्जरी और वैस्कुलर रिकंस्ट्रक्शन के लिए नसों का इस्तेमाल किया जाता है।
घर पर मौत के बाद कौन से अंग बिल्कुल भी दान नहीं किए जा सकते?
घर पर प्राकृतिक मृत्यु होने के बाद निम्नलिखित महत्वपूर्ण अंगों का दान कतई संभव नहीं है:
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किडनी (गुर्दे): दिल रुकने के 30 मिनट के भीतर किडनी के नेफ्रॉन्स पूरी तरह डैमेज हो जाते हैं।
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लिवर (यकृत): ऑक्सीजन की आपूर्ति रुकते ही लिवर की कोशिकाएं तेजी से नष्ट होने लगती हैं।
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पूरा हृदय (Whole Heart): धड़कन रुकने के बाद दिल को दोबारा किसी अन्य शरीर में धड़काना संभव नहीं होता।
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फेफड़े (Lungs): सांस रुकने के बाद फेफड़ों के एल्वियोली तुरंत संकुचित होकर बेकार हो जाते हैं।
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अग्न्याशय (Pancreas) और आंतें (Small Intestine): ये अंग ऑक्सीजन के बिना अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और चंद मिनटों में ट्रांसप्लांट के अयोग्य हो जाते हैं।
ये सभी सॉलिड अंग केवल तभी दान हो सकते हैं जब मरीज अस्पताल में भर्ती हो और डॉक्टरों की 4-सदस्यीय टीम उसे कानूनी रूप से 'ब्रेन डेड' घोषित करे।
घर पर मृत्यु होने पर नेत्रदान या त्वचादान कराने के 5 जरूरी तात्कालिक कदम
यदि परिवार घर पर मृत्यु के बाद नेत्रदान या अंगदान कराना चाहता है, तो मेडिकल टीम के पहुंचने से पहले तुरंत ये कदम उठाएं:
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कमरे के पंखे तुरंत बंद कर दें: छत का पंखा चलने से मृतक की आंखों की पुतली (कॉर्निया) सूख जाती है और खराब हो सकती है। यदि कमरे में एयर कंडीशनर (AC) है, तो उसे चालू कर दें ताकि तापमान ठंडा रहे।
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आंखों को बंद रखें और गीली रुई रखें: मृतक की दोनों आंखें धीरे से बंद कर दें और उन पर साफ पानी या गुलाब जल में भीगी हुई कॉटन (रुई) रख दें।
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सिर के नीचे तकिया लगाएं: मृतक के सिर के नीचे एक तकिया लगाकर सिर को धड़ से लगभग 6 इंच ऊंचा रखें, ताकि आंखों और चेहरे पर खून का जमाव न हो।
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डेथ सर्टिफिकेट तैयार रखें: किसी पंजीकृत डॉक्टर से मृत्यु प्रमाण पत्र (Medical Certificate of Cause of Death) जरूर बनवा लें, क्योंकि बिना आधिकारिक डॉक्टर सर्टिफिकेशन के कोई भी आई बैंक प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकता।
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तुरंत नेशनल हेल्पलाइन या लोकल आई बैंक को फोन करें: तुरंत भारत सरकार के राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) के टोल-फ्री नंबर 1800-11-4770 / 1919 पर संपर्क करें या अपने शहर के नजदीकी आई बैंक/रेड क्रॉस को कॉल करें। टीम 15 से 30 मिनट में घर पहुंचकर प्रक्रिया पूरी कर लेती है।
किन बीमारियों से पीड़ित रहे व्यक्ति का कोई भी अंग दान नहीं हो सकता?
सुरक्षा और संक्रमण नियंत्रण के कड़े प्रोटोकॉल के तहत यदि मृतक व्यक्ति नीचे दी गई बीमारियों से ग्रसित रहा हो, तो उसके किसी भी अंग या ऊतक का दान स्वीकार नहीं किया जाता:
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एचआईवी / एड्स (HIV / AIDS)
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हेपेटाइटिस बी या हेपेटाइटिस सी का एक्टिव संक्रमण
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रेबीज (Rabies) या टिटनेस
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रक्त कैंसर (Leukemia / Lymphoma) या पूरे शरीर में फैला हुआ एक्टिव कैंसर (मेटास्टेसिस)
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दिमागी संक्रमण (Encephalitis / Meningitis) या सेप्टिसीमिया (खून में गंभीर बैक्टीरिया संक्रमण)
घर पर होने वाली प्राकृतिक मृत्यु के बाद भी कॉर्निया और त्वचा का दान करके किसी नेत्रहीन के अंधेरे जीवन को रोशन किया जा सकता है और किसी झुलसे हुए मरीज को नया जीवनदान दिया जा सकता है। समय का ध्यान रखना और सही प्रक्रिया का पालन करना ही इस महादान को सफल बनाता है।