अचानक क्यों बढ़ने लगे हैं मूवी टिकटों के दाम? समझिए मल्टीप्लेक्स मालिकों की यह नई तरकीब
भारतीय सिनेमाघरों में जाकर ब्लॉकबस्टर फिल्में देखने के शौकीन दर्शकों के लिए पिछले कुछ महीनों से टिकट बुक करना एक महंगा सौदा साबित हो रहा है। बहुत से चालाक दर्शक ऑनलाइन टिकट बुकिंग प्लेटफॉर्म्स जैसे 'बुकमायशो' (BookMyShow) पर लगने वाले अतिरिक्त इंटरनेट हैंडलिंग चार्ज से बचने के लिए सीधे PVR या INOX की आधिकारिक वेबसाइट का रुख करते हैं। कुछ लोग तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर सीधे सिनेमाघर के ऑफलाइन टिकट काउंटर पर जाकर लाइन में खड़े होते हैं, ताकि सबसे सस्ते दाम में फिल्म देखने का आनंद मिल सके। लेकिन क्या आपने भी हाल ही में यह गौर किया है कि अब सीधे थिएटर के काउंटर पर जाने के बावजूद आपको टिकटों के लिए बहुत ज्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं? अगर हां, तो आपको बता दें कि यह कोई इत्तेफाक या गलती नहीं है, बल्कि इसके पीछे मल्टीप्लेक्स नेटवर्क्स की एक बेहद सोची-समझी और एडवांस बिजनेस स्ट्रेटजी काम कर रही है।
एयरलाइंस और होटलों वाली तरकीब अब सिनेमाघरों में: क्या है यह पूरा खेल?
दरअसल, फिल्म देखने के शौकीनों के लिए नई हकीकत बनता जा रहा यह कड़वा अनुभव मल्टीप्लेक्स चेन द्वारा अपनाई गई एक नई तकनीक का नतीजा है। इस कमर्शियल मॉडल का इस्तेमाल विमानन कंपनियां (Airlines) और बड़े फाइव-स्टार होटल्स काफी लंबे समय से करते आ रहे हैं, जिसे अब भारतीय सिनेमा इंडस्ट्री ने भी पूरी तरह से अपना लिया है।
इस तकनीक के तहत, जैसे-जैसे किसी खास शो के लिए ऑडिटोरियम (सिनेमा हॉल) की सीटें बुक होती जाती हैं और उसकी डिमांड बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे उस शो की बची हुई लिमिटेड सीटों के दाम रियल-टाइम में ऑटोमैटिकली बढ़ा दिए जाते हैं। इस एल्गोरिदम के जरिए थिएटर मालिक कम शोज चलाकर भी अपनी बची हुई सीटों से अधिकतम मुनाफा कमाने की क्षमता हासिल कर लेते हैं।
पीवीआर के बिजनेस चीफ कमल ज्ञानचंदानी का बड़ा खुलासा: ग्लोबल मॉडल पर हो रहा है काम
सिनेमा के इस बदलते और महंगे होते व्यापारिक ढांचे को आधिकारिक तौर पर 'डायनैमिक प्राइसिंग मॉडल' (Dynamic Pricing Model) कहा जाता है। यह एक ऐसी आधुनिक राजस्व प्रणाली है जो बाजार में चल रही तात्कालिक मांग (Demand and Supply) के आधार पर कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव की अनुमति देती है। इस विषय पर देश की सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स चेन PVR INOX के बिजनेस प्लानिंग और स्ट्रैटजी चीफ कमल ज्ञानचंदानी ने एक बड़े मीडिया हाउस से बातचीत में इस छिपी हुई रणनीति को स्वीकार किया है।
ज्ञानचंदानी ने बताया, “डायनैमिक प्राइसिंग वैश्विक स्तर पर पूरी तरह स्वीकार की जा चुकी एक प्रामाणिक रेवेन्यू मैनेजमेंट प्रोसेस है, जिसे आज के समय में फ्लाइट टिकटों, होटल बुकिंग, बड़े खेल आयोजनों और लाइव कॉन्सर्ट जैसे अलग-अलग मनोरंजन सेक्टरों में सफलतापूर्वक अपनाया जा रहा है। पीवीआर आइनॉक्स में हमने कुछ साल पहले ही अपनी आंतरिक रेवेन्यू मैनेजमेंट स्ट्रैटजी के तहत इस कस्टमाइज्ड मॉडल को लागू किया था, ताकि हम सिनेमाहॉल की ऑक्युपेंसी (सीटें भरने की दर) को बेहतर करते हुए दर्शकों को उनकी पसंद के हिसाब से टिकट की कीमतों के अलग-अलग विकल्प दे सकें।”
थिएटर या दर्शक, किसका हो रहा है असली फायदा?
मल्टीप्लेक्स प्रबंधन का दावा है कि इस तरकीब का मुख्य उद्देश्य हमारे पूरे थिएटर नेटवर्क में दर्शकों की भीड़ और डिमांड को संतुलित करना है, जिससे ग्राहकों को अपनी सुविधानुसार ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी (लचीलापन) मिल सके। इस मॉडल का एक पहलू यह है कि अत्यधिक डिमांड में चल रही सुपरहिट फिल्मों के शोज को पूरी तरह हाउसफुल होने से बचाया जा सकेगा, क्योंकि जो रईस दर्शक अपनी पसंदीदा सीट के लिए ज्यादा प्रीमियम दाम चुकाने को तैयार हैं, उन्हें आखिरी वक्त में भी सीट मिल जाएगी।
इसके विपरीत, इस मॉडल का दूसरा पहलू यह भी है कि जिन सुस्त शोज या ऑफ-बीट फिल्मों की टिकटें बिल्कुल नहीं बिक रही हैं, उनकी कीमतें काफी कम कर दी जाएंगी ताकि वे बेहद सस्ते दामों में आम दर्शकों के लिए उपलब्ध हो सकें। हालांकि, इस पूरे समीकरण में दर्शकों की जेब ज्यादा कट रही है या मल्टीप्लेक्स मालिकों की तिजोरी ज्यादा भर रही है, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं। अगली बार जब आप थिएटर के काउंटर पर जाएं और आपको सुबह के मुकाबले शाम की टिकट दोगुनी महंगी मिले, तो समझ जाइएगा कि आप इसी 'डायनैमिक प्राइसिंग' के जाल में फंस चुके हैं।