सिर्फ 7 फिल्में और खौफनाक अंत! लिव-इन पार्टनर की मौत के बाद जुहू के बंगले में हुआ था इस बॉलीवुड एक्ट्रेस का कत्ल
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसी अभिनेत्रियां आईं जिन्होंने बहुत कम काम करके भी दर्शकों के दिलों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। ऐसी ही एक बेहद खूबसूरत और टैलेंटेड अदाकारा थीं प्रिया राजवंश (Priya Rajvansh)। राज कुमार के साथ आइकॉनिक फिल्म 'हीर रांझा' और राजेश खन्ना के साथ 'कुदरत' जैसी फिल्मों में अपनी अदाकारी का जलवा बिखेरने वाली प्रिया राजवंश की कहानी जितनी फिल्मी थी, उसका अंत उतना ही खौफनाक और दर्दनाक रहा। साल 2000 में मुंबई के पॉश इलाके जुहू में स्थित एक आलीशान बंगले में उनकी हुई निर्मम हत्या ने पूरी मायानगरी को हिलाकर रख दिया था। इस मर्डर मिस्ट्री के पीछे की वजह जब सामने आई, तो हर कोई हैरान रह गया।
मशहूर निर्देशक चेतन आनंद के साथ लिव-इन और वसीयत का वो खूनी पेच
प्रिया राजवंश का फिल्मी करियर बेहद सीमित रहा और उन्होंने अपने पूरे जीवन में केवल 7 फिल्मों में काम किया। खास बात यह थी कि ये सभी फिल्में दिग्गज निर्माता-निर्देशक चेतन आनंद की थीं। प्रिया, चेतन आनंद के साथ गहरे लिव-इन रिलेशनशिप में थीं और उनके काम से लेकर निजी जिंदगी तक की हर छोटी-बड़ी चीज का हिस्सा थीं। साल 1997 में जब चेतन आनंद का निधन हुआ, तो उन्होंने अपनी वसीयत में संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्रिया राजवंश के नाम कर दिया। इस वसीयत के मुताबिक, जुहू वाले आलीशान बंगले में प्रिया को जीवनभर रहने का पूरा अधिकार दिया गया था, लेकिन वह इस बंगले को बेच नहीं सकती थीं। वसीयत की सबसे बड़ी शर्त यह थी कि प्रिया की मृत्यु के बाद यह पूरी जायदाद चेतन आनंद के बेटों को मिलनी थी।
रहस्यमयी मौत को आत्महत्या दिखाने की साजिश, एक चिट्ठी ने खोला राज
यही करोड़ों रुपये की वसीयत आगे चलकर प्रिया राजवंश के लिए काल बन गई। चेतन आनंद के दो बेटे थे— केतन आनंद और विवेक आनंद, जो इस वसीयत से बिल्कुल खुश नहीं थे। 27 मार्च 2000 को जुहू के उसी बंगले में अचानक प्रिया राजवंश का शव बरामद हुआ। शुरुआत में आरोपियों ने इस वारदात को एक सामान्य मौत या आत्महत्या का रूप देने की पूरी कोशिश की ताकि वे कानून की नजरों से बच सकें।
लेकिन जब मुंबई पुलिस ने मामले की गहराई से जांच शुरू की, तो सीन पूरी तरह पलट गया। पुलिस को तलाशी के दौरान प्रिया राजवंश के हाथ के लिखे कुछ बेहद चौंकाने वाले नोट्स और चेतन आनंद के भाई विजय आनंद को लिखी गई एक गुप्त चिट्ठी मिली। इन चिट्ठियों से यह साफ जाहिर हो रहा था कि प्रिया अपनी जान को लेकर पिछले काफी समय से बेहद डरी हुई थीं और उन्हें अपनी हत्या का अंदेशा था।
कोर्ट ने सुनाई उम्रकैद की सजा, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट से मिला बड़ा मोड़
पुख्ता सबूतों, कॉल रिकॉर्ड्स और हस्तलिखित पत्रों के आधार पर अदालत ने इसे एक सोची-समझी साजिश और निर्मम हत्या माना। जुलाई 2002 में मुंबई की सेशन्स कोर्ट ने इस हाई-प्रोफाइल मर्डर केस में मुख्य साजिशकर्ता के रूप में चेतन आनंद के दोनों बेटों (केतन और विवेक आनंद) और उनके दो घरेलू कर्मचारियों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद (Life Imprisonment) की सख्त सजा सुना दी।
हालांकि, इस कहानी में ट्विस्ट यहीं खत्म नहीं हुआ। सजा मिलने के महज चार महीने बाद ही, नवंबर 2002 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी सजा को अस्थायी रूप से निलंबित करते हुए उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया। लंबे समय बाद, साल 2011 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस केस की फाइलों को दोबारा खोला और निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों पर औपचारिक रूप से सुनवाई को मंजूरी दी। आज भी इस हाई-प्रोफाइल वसीयत विवाद और हत्या के मामले में अंतिम कानूनी फैसले का इंतजार किया जा रहा है।