क्या नीतीश कैबिनेट से आउट हो जाएंगे उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश, जानिए पूरा सियासी गणित
बिहार की सियासत में इन दिनों मंत्रिमंडल विस्तार और क्षेत्रीय समीकरणों को लेकर शह और मात का खेल बेहद दिलचस्प हो चुका है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सीटों के तालमेल और सांगठनिक प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही खींचतान के बीच एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के कोटे से मंत्री बने दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। दीपक प्रकाश, जो कि बिहार के कद्दावर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं, उनके मंत्री पद पर बने रहने को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार गर्म है। एक राजनीतिक रिपोर्टर की नजर से देखें तो बिहार विधान परिषद (MLC) के आगामी चुनाव की रेस में उनका नाम शामिल न होने के बाद यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या दीपक प्रकाश अब नीतीश कैबिनेट का हिस्सा नहीं रहेंगे या फिर पर्दे के पीछे उनके लिए कोई नया सीक्रेट प्लान तैयार किया गया है।
छह महीने की संवैधानिक समय सीमा खत्म होने के बेहद नजदीक संवैधानिक नियमों के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति बिहार विधानमंडल (विधानसभा या विधान परिषद) के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो वह अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री पद पर बना रह सकता है। इस तय समय सीमा के भीतर उसे किसी भी एक सदन की सदस्यता हासिल करना अनिवार्य होता है। दीपक प्रकाश ने जब नीतीश सरकार में मंत्री पद की शपथ ली थी, तब वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। अब उनके छह महीने का कार्यकाल पूरा होने के बेहद नजदीक पहुंच चुका है, लेकिन विधान परिषद के ताजा घटनाक्रमों और टिकटों के बंटवारे की रेस में उनकी दावेदारी कहीं नजर नहीं आ रही है। इसी तकनीकी और संवैधानिक पेच के कारण पूरी जेडीयू, बीजेपी और आरएलएम खेमे में सुगबुगाहट तेज हो गई है।
विधान परिषद चुनाव में क्यों फंसा पेंच और क्यों नहीं मिल पाया टिकट हालिया राजनीतिक समीकरणों को देखें तो एनडीए के भीतर सीटों का गणित बेहद उलझा हुआ है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) अपने-अपने मूल कार्यकर्ताओं और जातिगत समीकरणों को साधने में जुटी हुई हैं। विधान परिषद की खाली हो रही सीटों पर दावेदारों की संख्या इतनी अधिक थी कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के लिए अपने बेटे के लिए सीट सुरक्षित करा पाना नामुमकिन जैसा साबित हुआ। सूत्रों का कहना है कि उपेंद्र कुशवाहा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के सामने दीपक प्रकाश के लिए पुरजोर पैरवी की थी, लेकिन एनडीए के बड़े घटकों के अपने आंतरिक दबाव के चलते आरएलएम के खाते में विधान परिषद की सीट नहीं जा सकी, जिसने दीपक प्रकाश की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
तो क्या अब मंत्री पद गंवाना पड़ेगा, या बचा है कोई और कानूनी रास्ता? विधान परिषद की रेस से बाहर होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दीपक प्रकाश को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा? राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस स्थिति में उनके पास विकल्प बेहद सीमित हैं। पहला विकल्प यह है कि छह महीने की समय सीमा खत्म होते ही उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना होगा। हालांकि, राजनीति में एक और रास्ता भी चर्चा में रहता है, जिसके तहत मंत्री पद से इस्तीफा देने के कुछ समय बाद उन्हें दोबारा से मंत्री पद की शपथ दिलाई जा सकती है, जिससे उन्हें छह महीने का नया जीवनदान मिल जाएगा। लेकिन, क्या नीतीश कुमार और बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व इस तरह के विवादास्पद और तकनीकी रास्ते को अपनाने की मंजूरी देगा, इस पर गहरा सस्पेंस बना हुआ है।
उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक वजूद और कुशवाहा वोट बैंक पर क्या होगा असर इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर बिहार के बेहद महत्वपूर्ण कुशवाहा (लव-कुश) वोट बैंक पर पड़ना तय माना जा रहा है। उपेंद्र कुशवाहा पिछले काफी समय से खुद को इस समाज का सबसे बड़ा चेहरा साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में अगर उनके बेटे दीपक प्रकाश को नीतीश कैबिनेट से बाहर का रास्ता देखना पड़ता है, तो यह उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक रसूख के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और महागठबंधन इस मौके को लपकने की ताक में बैठे हैं और वे इसे कुशवाहा समाज के अपमान के रूप में भुनाने की कोशिश कर सकते हैं। अब देखना यह होगा कि अपने बेटे की कुर्सी बचाने के लिए उपेंद्र कुशवाहा आने वाले दिनों में क्या नई राजनीतिक चाल चलते हैं।