इंसाफ की चौखट पर म्यांमार ,ICJ में शुरू हुई रोहिंग्या नरसंहार की ऐतिहासिक सुनवाई

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News India Live, Digital Desk: इंसानियत के नाते हम सब जानते हैं कि अपना घर और अपनी जमीन छोड़ना कितना मुश्किल होता है। म्यांमार के राखिन राज्य से भागकर आए लाखों रोहिंग्या मुस्लिम पिछले कई सालों से बांग्लादेश और भारत के शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। लेकिन अब बात सिर्फ रहने-खाने की नहीं है, बात है 'इंसाफ' की।

दुनिया की सबसे बड़ी अदालत यानी 'इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस' (ICJ) में म्यांमार के खिलाफ नरसंहार (Genocide) के मामले की सुनवाई शुरू हो चुकी है। यह मुकदमा उन घावों को कुरेदने जैसा भी है और उन पर मरहम लगाने की कोशिश जैसा भी।

ये मामला अदालत तक कैसे पहुंचा?
अक्सर बड़ी लड़ाइयों की शुरुआत किसी छोटे कदम से होती है। अफ़्रीकी देश गाम्बिया ने म्यांमार के खिलाफ यह हिम्मत दिखाई। उन्होंने दलील दी कि म्यांमार की सेना ने 2017 में एक सुनियोजित तरीके से रोहिंग्या लोगों को खत्म करने की कोशिश की, जिसमें मासूमों का कत्लेआम, महिलाओं के साथ जुल्म और हज़ारों घरों को आग के हवाले करना शामिल था। गाम्बिया का साथ पूरी दुनिया के कई मानवाधिकार संगठनों ने दिया।

मुकदमे की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
अदालती भाषा में कहें तो 'नरसंहार' शब्द को साबित करना सबसे कठिन काम होता है। इसके लिए यह दिखाना होगा कि म्यांमार की सरकार और सेना का 'इरादा' पूरे समुदाय को खत्म करने का था। म्यांमार अब तक इन आरोपों को नकारता आया है और इसे एक उग्रवाद के खिलाफ 'सफाई अभियान' करार देता रहा है। लेकिन उपग्रह की तस्वीरों और हज़ारों चश्मदीदों की गवाहियों ने पूरी दुनिया के सामने एक अलग ही सच्चाई बयां की है।

हमें और आपको इससे क्या फर्क पड़ता है?
हो सकता है हमें लगे कि नीदरलैंड के 'द हेग' शहर में हो रही इस सुनवाई का हमसे क्या लेना-देना? लेकिन भारत और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के लिए यह बहुत बड़ी बात है। लाखों शरणार्थियों का मुद्दा सिर्फ़ मानवीय नहीं, बल्कि सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। अगर म्यांमार पर नरसंहार साबित होता है और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, तो शायद भविष्य में इन लोगों की अपने वतन सुरक्षित वापसी का रास्ता साफ हो सके।

एक उम्मीद की किरण
इंटरनेशनल कोर्ट में यह मामला सालों चल सकता है, लेकिन सुनवाई की शुरुआत होना ही इस बात का सबूत है कि दुनिया चुप नहीं बैठी है। कानून की किताब भले ही मोटी हो, लेकिन वह अंततः पीड़ितों के पक्ष में खड़ी होनी चाहिए। क्या लाखों बेघर लोगों को अपना खोया हुआ हक और सम्मान वापस मिलेगा? पूरी दुनिया की नज़रें अब उन न्यायाधीशों पर टिकी हैं जो इस ऐतिहासिक फैसले को लिखने वाले हैं।