करवाचौथ का पावन पर्व और सुहागिनों का अखंड सौभाग्य का संकल्प

करवाचौथ का पावन पर्व और सुहागिनों का अखंड सौभाग्य का संकल्प

पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते, अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक करवाचौथ का पावन पर्व देशभर में बेहद धूमधाम और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ने वाले इस व्रत का सनातन परंपरा में बहुत बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इस विशेष दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, निरोगी काया, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत का पालन करती हैं। सुबह तड़के सास द्वारा दी गई सरगी का सेवन करने के बाद दिनभर अन्न-जल का त्याग कर माता पार्वती, भगवान शिव, श्री गणेश और कार्तिकेय जी की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। शाम को चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के पश्चात ही महिलाएं अपने पति के हाथों जल ग्रहण करके अपना व्रत पूर्ण करती हैं। इस पावन अवसर को लेकर बाजारों में रौनक देखने को मिलती है, जहां महिलाएं कपड़ों, आभूषणों, पूजा सामग्री और मेहंदी लगवाने के लिए भारी उत्साह दिखाती हैं।

करवाचौथ पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त और पूजा की संपूर्ण विधि

धार्मिक मान्यताओं और पंचांग की गणना के अनुसार करवाचौथ के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम के समय होता है, जब प्रदोष काल में माता पार्वती और शिव परिवार की पूजा का विधान है। इस वर्ष करवाचौथ की पूजा का सबसे फलदायी मुहूर्त शाम 05:45 बजे से लेकर शाम 07:02 बजे तक रहेगा। इस दौरान महिलाओं को पूजा की थाली सजाकर, धूप-दीप प्रज्वलित कर करवाचौथ की कथा का पाठ करना या सुनना चाहिए। पूजा के दौरान मिट्टी या तांबे के करवे में जल भरकर उसमें गेहूं या चीनी रखी जाती है और माता करवा को रोली, अक्षत, सिंदूर, पुष्प व सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के पश्चात कथा सुनने वाली सभी महिलाएं आपस में करवे बदलकर अपने बड़ों का आशीर्वाद लेती हैं और सुख-शांति की प्रार्थना करती हैं। शास्त्रों में माना गया है कि इस शुभ मुहूर्त में पूरी निष्ठा के साथ की गई पूजा से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और जीवन साथी को दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

हरियाणा के प्रमुख शहरों में चांद निकलने का सटीक समय और मौसम का हाल

करवाचौथ के दिन व्रत रख रही सुहागिन महिलाओं को सबसे ज्यादा इंतजार शाम को चांद के दीदार का होता है। हरियाणा के विभिन्न जिलों और शहरों में भौगोलिक स्थिति के अनुसार चंद्रोदय के समय में हल्का अंतर देखने को मिलता है। खगोलीय गणनाओं और मौसम विभाग के अनुसार हरियाणा में इस बार औसतन रात 08:12 बजे से लेकर 08:25 बजे के बीच अलग-अलग जिलों में चंद्रमा के दर्शन होंगे। अंबाला, कुरुक्षेत्र और पंचकूला जैसे उत्तरी जिलों में चांद रात लगभग 08:14 बजे दिखाई देगा, वहीं हिसार, सिरसा और भिवानी जैसे पश्चिमी जिलों में चंद्रोदय का समय रात 08:22 बजे के आसपास रहेगा। गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत और पानीपत जैसे एनसीआर क्षेत्र से सटे जिलों में रात 08:16 बजे से 08:19 बजे के मध्य अर्घ्य देने के लिए चांद के स्पष्ट दर्शन हो सकेंगे। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस दिन आसमान के मुख्य रूप से साफ रहने की संभावना है, जिससे व्रत धारी महिलाओं को चांद देखने में किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने के नियम: पति के हाथों जल पीकर पूरा करें व्रत

चंद्रमा निकलने के बाद व्रत खोलने की परंपरा भी बेहद खास और शास्त्रीय नियमों से बंधी होती है। जैसे ही रात में गगन मंडल पर चांद का आगमन होता है, सुहागिन महिलाएं छलनी में दीपक जलाकर सबसे पहले चंद्रमा का दर्शन करती हैं और फिर उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखती हैं। इसके पश्चात चंद्रमा को जल, दूध, अक्षत और पुष्प से अर्घ्य अर्पित किया जाता है और धूप- दीप दिखाकर उनकी आरती उतारी जाती है। अर्घ्य देने के बाद महिलाएं अपने पति के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं और पतिदेव अपनी जीवनसंगिनी को अपने हाथों से पानी पिलाकर व मिष्ठान खिलाकर उनका निर्जला व्रत संपन्न कराते हैं। आधुनिक समय में यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न रहकर आपसी रिश्ते को गहरा करने, परस्पर सम्मान बढ़ाने और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का सबसे सुंदर अवसर बन चुका है।