हरियाणा में हत्या के आरोपी को जमानत मिलना पड़ा भारी, सुप्रीम कोर्ट ने विजय जुलूस निकालने पर लगाई फटकार

हरियाणा में हत्या के आरोपी को जमानत मिलना पड़ा भारी, सुप्रीम कोर्ट ने विजय जुलूस निकालने पर लगाई फटकार

भारतीय न्याय व्यवस्था में अपराधियों के हौसले और उनकी दबंगई पर सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर से बेहद कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। हरियाणा के एक सनसनीखेज हत्या के मामले में जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद आरोपी द्वारा शहर में जश्न मनाते हुए विजय जुलूस निकाला जाना उसे और उसके समर्थकों को भारी पड़ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए उस हत्या के आरोपी को दी गई जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद सख्त तेवर दिखाए हैं। अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति पर हत्या जैसे गंभीर अपराध का मुकदमा चल रहा हो, वह जमानत पर बाहर आकर इस तरह का जश्न और शक्ति प्रदर्शन कैसे कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को बिना किसी हीला-हवाली के तुरंत आत्मसमर्पण यानी सरेंडर करने का कड़ा फरमान सुनाया है, जिसने पूरे देश के आपराधिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

यह पूरा मामला हरियाणा राज्य के एक स्थानीय जिले से जुड़ा हुआ है, जहां कुछ समय पहले आपसी रंजिश या अन्य विवाद के चलते एक व्यक्ति की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस जघन्य अपराध के मुख्य आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया था, और मामला निचली अदालत से होते हुए उच्च न्यायालय तक पहुंचा था। कानूनी प्रक्रियाओं और तकनीकी पहलुओं का फायदा उठाते हुए आरोपी पक्ष किसी तरह अदालत से जमानत हासिल करने में कामयाब हो गया था, और वह जेल से बाहर आ गया था। आमतौर पर जमानत मिलने पर आरोपियों को शांत रहना चाहिए और कानून की मर्यादा का पालन करना चाहिए, लेकिन इस मामले में आरोपी और उसके समर्थकों ने अपनी जीत का ढिंढोरा पीटते हुए इलाके में भारी लवाजमे के साथ विजय जुलूस निकाला। इस जुलूस के दौरान जमकर आतिशबाजी की गई, डीजे बजाए गए और खुलेआम कानून के मुंह पर तमाचा मारते हुए शक्ति प्रदर्शन किया गया, जिससे इलाके के आम नागरिकों और पीड़ित परिवार में खौफ का माहौल पैदा हो गया था।

हत्या के आरोपी द्वारा इस तरह सरेआम जश्न मनाए जाने और पीड़ित परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की वीडियो क्लिप जब सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया में वायरल हुई, तो पीड़ित परिवार ने न्याय के लिए सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट के सम्मानित जजों ने जब इस विजय जुलूस के दृश्यों और आरोपी के इस दुस्साहस को देखा, तो वे बेहद आहत और क्रोधित हुए। अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि जमानत का मतलब यह कतई नहीं होता कि कोई आरोपी कानून का मजाक उड़ाए और समाज में भय का वातावरण तैयार करे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अदालत द्वारा दी गई राहत का इस तरह का दुरुपयोग समाज में न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास पैदा करता है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों ने आरोपी के वकीलों को आड़े हाथों लेते हुए बिना किसी नरमी के अपना फैसला सुनाया। अदालत ने आदेश दिया कि हत्या के आरोपी की जमानत को रद्द किया जाता है और उसे तुरंत प्रभाव से संबंधित जेल अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करना होगा। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि यदि आरोपी तय समय के भीतर खुद सरेंडर नहीं करता है, तो स्थानीय पुलिस प्रशासन को यह अधिकार दिया जाता है कि वह उसे तुरंत गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे डाले। इस फैसले से उन तमाम दबंग तत्वों और अपराधियों को एक कड़ा संदेश गया है जो यह सोचते हैं कि वे जमानत मिलने के बाद कानून और पीड़ित परिवार को डराने-धमकाने में कामयाब हो जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारत में न्यायपालिका आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने और अपराधियों के हौसलों को पस्त करने के लिए कितनी तत्पर है। हरियाणा की इस घटना ने एक बार फिर से इस बहस को जन्म दे दिया है कि क्या अदालतों को जमानत देते समय इस बात की कड़ी शर्त रखनी चाहिए कि आरोपी रिहाई के बाद इस तरह की किसी भी सार्वजनिक गतिविधि में शामिल नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के मामलों में सर्वोच्च अदालत खुद संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई करती है, तो अपराधियों के मन में कानून का डर हमेशा बना रहेगा। पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राहत की सांस ली है और उन्हें उम्मीद जगी है कि कानून के इस लंबे सफर के अंत में उन्हें असली न्याय जरूर मिलेगा।