चीनी के रेट बढ़ने में सरकार का रोल नहीं', हरियाणा के मंत्री रणबीर गंगवा के बयान पर मचा सियासी बवाल, बोले- यह बाजार का मामला
हरियाणा में चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ कर रख दिया है। बढ़ती महंगाई के बीच जब इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया मांगी गई, तो हरियाणा सरकार के मंत्री रणबीर गंगवा ने एक ऐसा बयान दे दिया है जो अब चर्चा का विषय बन गया है। मंत्री ने साफ तौर पर कहा कि चीनी के दाम बढ़ने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है और यह पूरी तरह से बाजार (मार्केट) का मामला है। उनके इस दो टूक जवाब ने जहां एक तरफ विपक्ष को सरकार पर निशाना साधने का मौका दे दिया है, वहीं आम जनता में भी इसे लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है।
बाजार का हवाला देकर पल्ला झाड़ती दिखी सरकार
रणबीर गंगवा ने स्पष्ट शब्दों में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि आवश्यक वस्तुओं के दाम तय करना बाजार की अपनी मांग और आपूर्ति (Demand and Supply) के चक्र पर निर्भर करता है। मंत्री का तर्क था कि सरकार के पास सीधे तौर पर कीमतों को नियंत्रित करने का ऐसा कोई तंत्र नहीं है कि वह हर छोटी चीज के दाम तय कर सके। उन्होंने इसे वैश्विक और स्थानीय बाजार की सामान्य प्रक्रिया करार देते हुए स्पष्ट किया कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है। सरकार की तरफ से इस तरह की प्रतिक्रिया आना यह संकेत देता है कि फिलहाल जनता को महंगाई से राहत मिलने की उम्मीद कम ही है।
विपक्ष का पलटवार: सरकार की विफलता का प्रतीक
मंत्री के इस बयान के आते ही विपक्षी दलों ने इसे सरकार की संवेदनहीनता और विफलता करार देना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार बढ़ती महंगाई पर पर्दा डालने के लिए बाजार का बहाना बना रही है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि अगर सरकार का बाजार पर कोई नियंत्रण नहीं है, तो वह जनता को राहत देने का दावा क्यों करती है? उन्होंने आरोप लगाया कि जमाखोरी और गलत सरकारी नीतियों के कारण ही चीनी जैसे जरूरी उत्पादों के दाम आसमान छू रहे हैं, और मंत्री का यह बयान जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
आम जनता पर पड़ रहा चीनी की महंगाई का दोहरा असर
चीनी सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि हर घर की बुनियादी जरूरत है। दूध, चाय से लेकर मिठाई और हर तरह के खाद्य पदार्थों में इसका उपयोग होता है। चीनी के दामों में हुई बढ़ोतरी का असर सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है। गृहिणियों का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों में जिस रफ्तार से चीनी की कीमतें बढ़ी हैं, उसने घरेलू बजट को अस्त-व्यस्त कर दिया है। बाजार में व्यापारी भी अलग-अलग कीमतों पर चीनी बेच रहे हैं, जिससे खरीदार भ्रमित हैं कि सही दर क्या है। मंत्री के बयान ने इन उपभोक्ताओं को हताश कर दिया है, जिन्हें उम्मीद थी कि सरकार इस मामले में कोई ठोस कदम उठाएगी।
क्या आपूर्ति श्रृंखला में है कोई बड़ी गड़बड़ी
आर्थिक जानकारों की मानें तो चीनी की कीमतों में हो रही वृद्धि के पीछे केवल बाजार का खेल नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला में कई स्तरों पर गड़बड़ी भी जिम्मेदार हो सकती है। गन्ने की कम पैदावार, मिलों में उत्पादन की समस्या और बड़े पैमाने पर स्टॉक जमा करने वाले व्यापारियों की भूमिका भी इसमें हो सकती है। सरकार के लिए आवश्यक है कि वह केवल बाजार का हवाला न देकर, बल्कि इन स्तरों पर जांच करे कि कहीं जमाखोरी तो नहीं हो रही है। यदि सरकार चाहती है तो आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है, लेकिन वर्तमान में सरकार का रुख इससे उलट दिखाई दे रहा है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप की क्या है संभावना
अक्सर ऐसी स्थितियों में जब किसी वस्तु के दाम बेतहाशा बढ़ते हैं, तो राज्य प्रशासन अपने स्थानीय स्तर पर छापेमारी और स्टॉक की जांच कर सकता है ताकि कालाबाजारी पर लगाम लगाई जा सके। रणबीर गंगवा के बयान से ऐसा लगता है कि फिलहाल प्रशासन ऐसी किसी बड़ी कार्रवाई के मूड में नहीं है। हालांकि, आने वाले समय में अगर कीमतें और बढ़ती हैं, तो यह मुद्दा चुनावी राज्यों के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट भी खड़ा कर सकता है। जनता की उम्मीदें अभी भी प्रशासन से हैं कि वह बाजार में हस्तक्षेप कर कीमतों को एक उचित स्तर पर लाए ताकि आम नागरिक को राहत मिल सके।