Ghatsila by-Election : JMM-BJP की सीधी लड़ाई में JLKM बनेगा गेम चेंजर या वोट कटवा?
News India Live, Digital Desk : झारखंड की घाटशिला विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव इस बार बेहद दिलचस्प होने जा रहा है. यह चुनावी जंग अब सिर्फ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच की सीधी लड़ाई नहीं रह गई है. झारखंडी लोकतांत्रिक क्रांति मंच (JLKM) की एंट्री ने इस मुकाबले को त्रिकोणीय और अप्रत्याशित बना दिया है. तीनों ही खेमों ने अपनी-अपनी जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है, जिससे यह अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है कि जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा.
JMM के सामने किला बचाने की चुनौती
घाटशिला सीट पारंपरिक रूप से झारखंड मुक्ति मोर्चा का गढ़ मानी जाती रही है. यह सीट जेएमएम विधायक रामदास सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है. अब जेएमएम के सामने अपने इस मजबूत किले को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है. पार्टी की कोशिश है कि रामदास सोरेन के निधन से उपजी सहानुभूति की लहर का फायदा उठाया जाए. JMM की तरफ से दिवंगत विधायक के बेटे संजीव सोरेन को टिकट दिए जाने की प्रबल संभावना है, ताकि सहानुभूति के साथ-साथ पारंपरिक वोट बैंक को भी साधा जा सके.
BJP पिछली हार का बदला लेने को बेताब
वहीं, भारतीय जनता पार्टी इस उपचुनाव को जीतकर पिछली हार का बदला लेना चाहती है. बीजेपी इस सीट को जीतकर राज्य सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का संदेश देना चाहती है. बीजेपी की ओर से प्रदीप महतो को उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा है, जो इलाके में एक मजबूत पकड़ रखते हैं. बीजेपी, आजसू के साथ गठबंधन की पूरी ताकत लगाकर इस सीट को जेएमएम से छीनने की रणनीति बना रही है.
क्या खेल बिगाड़ेगा JLKM?
इस सीधी लड़ाई के बीच, झारखंडी लोकतांत्रिक क्रांति मंच (JLKM) ने अपनी ताल ठोक कर मुकाबले को और भी रोमांचक बना दिया है. JLKM ने डॉ. संजय महतो को अपना उम्मीदवार घोषित किया है, जो इलाके में एक जाना-माना चेहरा हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि JLKM मुख्य रूप से बीजेपी के कुर्मी वोट बैंक में सेंध लगा सकता है, जिससे सीधा फायदा जेएमएम को मिल सकता है. वहीं, कुछ का मानना है कि JLKM दोनों ही पार्टियों के कुछ नाराज वोटों को अपनी तरफ खींचकर 'गेम चेंजर' भी साबित हो सकता है.
यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट पर जीत-हार का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भी हवा का रुख तय करेगा. अब देखना यह है कि घाटशिला की जनता सहानुभूति, सत्ता या फिर एक नए विकल्प, किस पर अपना भरोसा जताती है.