धृतराष्ट्र से लेकर दुर्योधन तक महाभारत की वे 3 शादियां जहाँ रिश्तों में खटास की वजह बना धोखा
News India Live, Digital Desk : महाभारत की महागाथा सिर्फ युद्ध के मैदान पर नहीं, बल्कि महलों के उन बंद कमरों में भी रची गई जहाँ भविष्य की कड़वाहट के बीज बोए जा रहे थे। जब हम इस महाकाव्य को गौर से पढ़ते हैं, तो पता चलता है कि यहाँ कई शादियाँ सामान्य नहीं थीं। कई शादियाँ छल, बल और राजनीतिक दबाव का नतीजा थीं, जिन्होंने बाद में कुरुक्षेत्र के मैदान में खौफनाक मोड़ लिया।
जब गांधारी के लिए काल बन गया वो एक सच
सबसे चर्चित कहानी है धृतराष्ट्र और गांधारी की। अक्सर कहा जाता है कि गांधारी ने पति के अंधे होने के कारण आँखों पर पट्टी बांधी, लेकिन क्या यह पूरी तरह से उनका समर्पण था? बहुत से जानकार मानते हैं कि गांधारी के परिवार को भीष्म की सैन्य शक्ति के आगे झुकना पड़ा था। उन्हें पता भी नहीं था कि राजकुमार जन्मांध हैं। जब गांधारी को यह सच पता चला, तो वह कड़वाहट और दुख से भर गईं। पट्टी बांधना सिर्फ पति के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि एक विरोध भी था उस धोखे के खिलाफ जो उनके साथ हुआ था।
भीष्म: जब मर्यादा के रक्षक ही बन गए 'अपहरणकर्ता'
शायद ही आपको पता हो कि शांतनु के पुत्र भीष्म, जो धर्म के प्रतीक माने जाते हैं, उन्होंने अपने भाई विचित्रवीर्य की शादी के लिए काशिराज की तीन बेटियों—अंबा, अंबिका और अंबालिका का भरे स्वयंवर से अपहरण किया था। यह 'छल' ही था जिसने अंबा के जीवन को तबाह कर दिया। भीष्म का यह कदम उनकी महानता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है, और इसी बदले की आग ने शिखंडी को जन्म दिया जिसने बाद में भीष्म के अंत का कारण बना।
दुर्योधन का वो खौफनाक कदम: भानुमती का स्वयंवर
कुरुवंश का विनाश चाहने वाले दुर्योधन ने भी अपने रिश्तों को मर्यादा के धागे में नहीं पिरोया था। भानुमती के स्वयंवर के दौरान जब राजकुमारी ने उसे पसंद नहीं किया और आगे बढ़ गई, तो दुर्योधन ने क्रोध में आकर जबरन उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने रथ पर बैठा लिया। कर्ण की मदद से उसने उन तमाम राजाओं को धूल चटा दी जो विरोध कर रहे थे। एक रानी को उसकी मर्जी के बिना अपनी राजधानी लाना 'क्षत्रिय धर्म' के उस दौर में भले ही वीरता माना जाता रहा हो, लेकिन एक औरत की गरिमा के साथ यह सरासर छल था।
इन रिश्तों का परिणाम क्या हुआ?
कहते हैं कि जो नींव धोखे पर खड़ी होती है, वह टिकती नहीं है। महाभारत की ये शादियाँ यह सिखाती हैं कि जबरदस्ती थोपे गए रिश्तों में प्रेम नहीं बल्कि बदले की भावना जन्म लेती है। अंबा की नफरत हो या गांधारी का अधूरा सुख, इन सभी भावनाओं ने धीरे-धीरे उस गुस्से को पाल-पोसकर बड़ा किया जिसने अंत में हस्तिनापुर के वैभव को मिट्टी में मिला दिया।
आज के 2025 के आधुनिक युग में जब हम रिश्तों की अहमियत समझते हैं, तो महाभारत के ये प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि सहमति और सच ही किसी भी बंधन की सबसे बड़ी मजबूती हैं।