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April 26 2026 03:25 am

पंजाब की सियासत में धमाका 66 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल होंगे भगवंत मान प्रताप सिंह बाजवा का सनसनीखेज दावा

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News India Live, Digital Desk: पंजाब की राजनीति में एक बार फिर दावों और जवाबी हमलों का दौर शुरू हो गया है। विपक्ष के नेता और कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रताप सिंह बाजवा ने एक ऐसा दावा किया है जिसने 'आम आदमी पार्टी' (AAP) के खेमे में हलचल मचा दी है। बाजवा का कहना है कि मुख्यमंत्री भगवंत मान अपने 66 विधायकों के साथ भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं।

"32 विधायक तो मेरे संपर्क में थे"  बाजवा

प्रताप सिंह बाजवा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आम आदमी पार्टी की आंतरिक स्थिति पर तीखा हमला बोला। उनके बयानों के मुख्य अंश इस प्रकार हैं:

बीजेपी के साथ 'डील' का दावा: बाजवा ने आरोप लगाया कि भगवंत मान बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत कर रहे हैं और जल्द ही एक बड़ा दलबदल देखने को मिल सकता है।

कांग्रेस से भी संपर्क: उन्होंने एक और बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि 'आप' के 32 विधायक कांग्रेस के संपर्क में भी थे। बाजवा ने दावा किया, "वे हमारे पास आना चाहते थे, लेकिन उनकी शर्तें इतनी ज्यादा थीं कि हमने उन्हें स्वीकार नहीं किया।"

असंतोष का हवाला: बाजवा के अनुसार, मुख्यमंत्री की कार्यशैली और दिल्ली नेतृत्व के हस्तक्षेप के कारण पंजाब के कई 'आप' विधायक घुटन महसूस कर रहे हैं।

'आप' का पलटवार: "बाजवा मुंगेरीलाल के हसीन सपने देख रहे हैं"

प्रताप सिंह बाजवा के इन दावों पर आम आदमी पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सरकार की ओर से मंत्रियों और प्रवक्ताओं ने इसे पूरी तरह निराधार और "हताशा में दिया गया बयान" करार दिया है।

सरकार को कोई खतरा नहीं: पार्टी का कहना है कि भगवंत मान सरकार के पास पूर्ण बहुमत है और सभी विधायक एकजुट हैं। बाजवा केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए काल्पनिक दावे कर रहे हैं।

बीजेपी का रुख: फिलहाल इस मुद्दे पर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, हालांकि पार्टी के कुछ नेता अक्सर 'आप' विधायकों के असंतोष की बातें करते रहे हैं।

राजनीतिक मायने

पंजाब में 2026 की राजनीतिक परिस्थितियों और आगामी चुनावों को देखते हुए बाजवा का यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि इन दावों में थोड़ी भी सच्चाई है, तो यह पंजाब की सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह विपक्ष की एक रणनीति हो सकती है ताकि सत्ताधारी दल के भीतर संदेह का माहौल पैदा किया जा सके।