राधा का नाम तो सब लेते हैं, पर क्या आप जानते हैं रुक्मिणी ने कृष्ण को पाने के लिए क्या किया था?
News India Live, Digital Desk : जब भी हम श्री कृष्ण के प्रेम की बात करते हैं, तो जुबां पर सबसे पहले 'राधा' का नाम आता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि कृष्ण के जीवन में 'पत्नी' का दर्जा पाने वाली देवी रुक्मिणी की कहानी किसी फिल्मी ड्रामा से कम नहीं थी? यह एक ऐसी प्रेम कहानी है जिसमें साहस है, बगावत है और एक अटूट भरोसा है।
अक्सर लोग सोचते हैं कि पुराने जमाने में शादियां सिर्फ माता-पिता की मर्जी से होती थीं, लेकिन रुक्मिणी और कृष्ण का विवाह इस बात का सबूत है कि सच्चा प्रेम हर बंधन तोड़ सकता है।
रुक्मिणी का दिल और भाई की जिद्द
विदर्भ देश के राजा भीष्मक की बेटी थीं रुक्मिणी। वे बेहद सुंदर और समझदार थीं। उन्होंने कभी कृष्ण को देखा नहीं था, लेकिन साधु-संतों और दरबार में आने वाले लोगों के मुंह से कृष्ण की वीरता और सुंदरता के किस्से सुनकर वे मन ही मन उन्हें अपना पति मान चुकी थीं। कहते हैं न, प्रेम के लिए देखना जरूरी नहीं, महसूस करना काफी है।
लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब रुक्मिणी के भाई 'रुक्मी' ने अड़ंगा लगाया। रुक्मी श्री कृष्ण से नफरत करता था। वह अपनी बहन की शादी चेदि नरेश 'शिशुपाल' से करना चाहता था। शादी की तारीख पक्की हो गई, तैयारियां शुरू हो गईं, लेकिन रुक्मिणी के दिल में तो सिर्फ सांवरिया थे।
वह चिट्ठी जिसने इतिहास बदल दिया
जब रुक्मिणी को लगा कि अब सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, तो उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जो उस समय की मर्यादाओं में बहुत बड़ी बात थी। उन्होंने एक ब्राह्मण के हाथों श्री कृष्ण को एक प्रेम पत्र (Love Letter) भेजा। यह शायद इतिहास के सबसे चर्चित पत्रों में से एक है।
रुक्मिणी ने उस खत में लिखा- "हे भुवन सुंदर, आपके गुणों को सुनकर मेरा मन निर्लज्ज होकर आप में बस गया है। मेरे भाई मेरा विवाह शिशुपाल से करना चाहते हैं। अगर आप नहीं आए, तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी, लेकिन किसी और की नहीं होहूंगी।"
सिर्फ इतना ही नहीं, रुक्मिणी कितनी बुद्धिमानी थीं, इसका पता इस बात से चलता है कि उन्होंने कृष्ण को आने का 'प्लान' भी बताया। उन्होंने लिखा कि "शादी वाले दिन मैं कुलदेवी गौरी की पूजा करने नगर के बाहर मंदिर जाऊंगी। आप वहीं आकर मेरा हरण कर लीजिए।"
मंदिर में रोमांचक 'किडनैपिंग' और विवाह
जैसे ही श्री कृष्ण ने वो चिट्ठी पढ़ी, वे सारथी दारुक के साथ तुरंत रथ लेकर विदर्भ के लिए निकल पड़े। उधर शिशुपाल बारात लेकर तैयार था और इधर रुक्मिणी मंदिर में पूजा कर रही थीं, लेकिन उनकी नजरें सिर्फ द्वारकाधीश को ढूंढ रही थीं।
जैसे ही रुक्मिणी पूजा करके बाहर निकलीं, कृष्ण वहां आ पहुंचे। सभी राजाओं और सैनिकों के देखते-देखते उन्होंने रुक्मिणी को अपने रथ में बिठाया। यह दृश्य देखकर वहां हड़कंप मच गया। रुक्मी और शिशुपाल की सेना ने उनका पीछा भी किया, युद्ध भी हुआ, लेकिन श्री कृष्ण की वीरता के आगे कोई टिक न सका।
अंत में, द्वारका पहुंचकर पूरे विधि-विधान के साथ दोनों का विवाह हुआ और इस तरह एक राजकुमारी ने अपनी भक्ति और साहस से भगवान को जीत लिया।