RD Burman birth anniversary: सुरों के वो 'जादूगर' जिन्होंने कंचे खेलने की उम्र में बनाई थी पहली धुन, एक्टिंग में भी मनवाया लोहा

RD Burman birth anniversary: सुरों के वो 'जादूगर' जिन्होंने कंचे खेलने की उम्र में बनाई थी पहली धुन, एक्टिंग में भी मनवाया लोहा

मुंबई/मनोरंजन डेस्क: बॉलीवुड के इतिहास में कई ऐसे फनकार हुए हैं जिन्हें किसी एक विधा या दायरे में समेट कर नहीं रखा जा सकता। चाहे वो किशोर कुमार की हरफनमौला गायकी हो या गुलजार की मखमली कलम। लेकिन इसी सुनहरे दौर में एक ऐसा संगीतकार भी आया, जिसने न सिर्फ अपने पिता की महान विरासत को आगे बढ़ाया, बल्कि भारतीय संगीत की परिभाषा को ही हमेशा के लिए बदल दिया। हम बात कर रहे हैं संगीत की दुनिया के बेताज बादशाह आर डी बर्मन की, जिन्हें दुनिया बेहद प्यार से 'पंचम दा' कहती है। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के खास मौके पर आइए जानते हैं कि महज 9 साल की उम्र से शुरू हुआ उनका यह संगीतमय सफर कैसे चार दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करता रहा।

सिर्फ 9 साल की उम्र में कंपोज कर दिया था पहला गाना

आर डी बर्मन का जन्म दिग्गज संगीतकार एस डी बर्मन के घर हुआ था, इसलिए संगीत उनके खून में दौड़ रहा था। लेकिन पंचम दा की प्रतिभा बचपन से ही हैरान करने वाली थी। जिस उम्र में बच्चे कंचे और खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में महज 9 साल के आर डी बर्मन ने एक धुन तैयार कर डाली थी। उनकी इस कमाल की धुन को बाद में फिल्म में गाने के तौर पर इस्तेमाल भी किया गया। यानी सिंगल डिजिट की उम्र में ही उन्होंने साबित कर दिया था कि वो लंबी रेस के घोड़े हैं।

300 से ज्यादा फिल्मों में बिखेरा जादू, राजेश-किशोर के साथ बनाई 'अमर तिकड़ी'

अगर 1970 के दशक को हिंदी सिनेमा और संगीत का स्वर्ण युग कहा जाता है, तो इसके पीछे पंचम दा का ही दिमाग था। उस दौर में सुपरस्टार राजेश खन्ना, गायक किशोर कुमार और संगीतकार आर डी बर्मन की तिकड़ी ने कामयाबी के ऐसे नए रिकॉर्ड बनाए जिनकी गूंज आज भी सुनाई देती है। पंचम दा ने अपने करियर में 331 फिल्मों में यादगार संगीत दिया। इनमें 'शोले', 'तीसरी मंजिल', 'पडोशन', 'अमर प्रेम', 'कटी पतंग', 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'यादों की बारात', 'आंधी', 'गोलमाल', 'सत्ते पे सत्ता', 'मासूम' और उनकी आखिरी फिल्म '1942 अ लव स्टोरी' जैसे कई कल्ट नाम शामिल हैं।

सिर्फ धुनें ही नहीं बनाईं, अपनी कशिश भरी आवाज से भी जीता दिल

आर डी बर्मन सिर्फ बेहतरीन धुनें बनाने वाले उस्ताद नहीं थे, बल्कि उनकी अनूठी और दमदार आवाज का भी एक अलग ही दीवानापन था। उन्होंने गाने में जिस तरह की तकनीकों और 'रफ वॉइस' का इस्तेमाल किया, उसने सबको चौंका दिया। फिल्म 'अपना देश' का मशहूर गाना ‘दुनिया में लोगों को धोखा कभी हो जाता है’ हो या फिर फिल्म 'शोले' का कल्ट गाना ‘महबूबा महबूबा’, पंचम दा ने अपनी गायकी से इन गानों को हमेशा-हमेशा के लिए अमर बना दिया। इसके अलावा 'धन्नो की आंखों में' और 'तुम क्या जानों मोहब्बत क्या है' जैसे गीतों में भी उनका अनोखा अंदाज देखने को मिला।

जब संगीत छोड़ महमूद के साथ 'भूत बंगला' में करने लगे एक्टिंग

पंचम दा की कला सिर्फ संगीत और गायकी तक ही सीमित नहीं थी। उनके अंदर का कलाकार उन्हें कैमरे के पीछे से खींचकर कैमरे के सामने भी ले आया। करीब सात दशक पहले मशहूर कॉमेडियन महमूद ने भारत की पहली हॉरर-कॉमेडी फिल्म 'भूत बंगला' बनाई थी। इस फिल्म का निर्देशन भी खुद महमूद ने ही किया था। इस फिल्म में पंचम दा ने एक मजेदार कैमियो किया था। फिल्म में महमूद और पंचम दा की कॉमिक टाइमिंग और केमिस्ट्री इतनी शानदार थी कि दर्शकों ने थिएटर में हंसते-हंसते पेट पकड़ लिया था। बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही इस फिल्म से उन्होंने साबित कर दिया कि वो एक पैदाइशी एंटरटेनर थे।

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