'पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे': 400 साल पुराना वह अमर कृष्ण भजन, जिसकी धुन पर आज भी झूम उठते हैं भक्त
भारतीय संगीत और संस्कृति के इतिहास में जब-जब भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति और प्रेम का जिक्र होता है, तब-तब संत मीराबाई का नाम सबसे पहले और सबसे आदर के साथ लिया जाता है। सोलहवीं सदी में मेवाड़ की इस महान कृष्ण भक्त ने अपने आराध्य 'गिरधर गोपाल' के प्रेम में ऐसे अलौकिक पदों और भजनों की रचना की, जो समय की सीमाओं से परे जाकर आज भी करोड़ों देशवासियों के दिलों पर राज कर रहे हैं। जन्माष्टमी के पावन और उत्सवी माहौल में जब चारों तरफ कान्हा के जयकारे गूंजते हैं, तब मीराबाई का रचा हुआ एक विशेष 400 साल पुराना भजन स्वतः ही हर भक्त की जुबान पर आ जाता है। इस ऐतिहासिक और अमर रचना की गहराई, इसके पीछे के आध्यात्मिक संदेश और आधुनिक सिनेमा पर पड़े इसके जादुई प्रभाव की पूरी कहानी बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक है।
400 साल पुराना वह ऐतिहासिक भजन और उसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ
मीराबाई ने अपने जीवन का अधिकांश समय भगवान कृष्ण की भक्ति, साधना और उनके पदों को रचने में समर्पित कर दिया था। उनके द्वारा रचे गए भजनों में केवल कोमल भावनाएं ही नहीं, बल्कि सांसारिक मोह-माया से परे जाकर ईश्वर में पूरी तरह लीन हो जाने का अद्भुत साहस झलकता है। आज हम जिस विशिष्ट भजन की बात कर रहे हैं, उसकी शुरुआत इन अमर पंक्तियों से होती है—“पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे, मैं तो मेरे नारायण की आप ही हो गई दासी रे।”
सोलहवीं शताब्दी में रचे गए इस भजन का शाब्दिक और भावार्थ बहुत ही गहरा है। इसका अर्थ यह है कि मीरा ने अपने पैरों में घुंघरू बांध लिए हैं और वह लोक-लाज की परवाह किए बिना अपने प्रभु कृष्ण के प्रेम में मग्न होकर नाच रही है। इस भजन में उन ऐतिहासिक प्रसंगों का भी सूक्ष्म उल्लेख मिलता है जब समाज के लोगों ने मीरा को कृष्ण भक्ति के कारण 'बावरी' या पागल करार दिया था, और राणा द्वारा भेजे गए विष के प्याले को भी मीरा ने हंसते-हंसते अमृत मानकर पी लिया था। इस भजन की एक-एक पंक्ति में उस अटूट विश्वास की महक है, जो भक्त और भगवान के बीच के द्वैत भाव को पूरी तरह समाप्त कर देती है।
जनमाष्टमी के पर्व पर इस भजन के बिना अधूरी है हर रौनक
हर साल जब भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर श्री कृष्ण जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है, तो देश के कोने-कोने के मंदिरों, घरों और आयोजनों में संगीत की गूंज सुनाई देती है। आधुनिक युग के तमाम नए गीतों और भजनों के आने के बावजूद, मीराबाई का यह 400 साल पुराना पद आज भी अपनी मिठास और ऊर्जा खो नहीं पाया है। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर जब सुबह से ही मंदिरों में कीर्तन शुरू होते हैं, तो भक्त इस भजन की धुन पर थिरकते हुए नजर आते हैं। इस भजन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी एक-एक पंक्ति न केवल कानों को सुरीली लगती है, बल्कि श्रोता के मन में भक्ति का एक अनोखा और आनंदित ज्वार पैदा कर देती है। यही वजह है कि आज भी यह भजन जन्माष्टमी के उत्सव का सबसे अनिवार्य और प्राणवान हिस्सा माना जाता है।
बॉलीवुड सिनेमा में कैसे अमर हुआ मीराबाई का यह ऐतिहासिक पद?
मीराबाई के इस अमर भजन की लोकप्रियता और इसके शब्दों की शक्ति केवल पारंपरिक मंदिरों या संतों की बैठकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने भारतीय फिल्म उद्योग यानी बॉलीवुड के रचनाकारों को भी गहराई से प्रभावित किया। इस 400 साल पुरानी प्रेरणा से सुसज्जित होकर हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार और संगीतकारों ने इसे आधुनिकता का जामा पहनाया। वर्ष 1982 में रिलीज हुई कल्ट क्लासिक फिल्म 'नमक हलाल' (Namak Halal) का वह प्रसिद्ध गीत भला कौन भूल सकता है, जिसके बोल थे— "पग घुंघरु बांध मीरा नाची थी"।
इस गाने के गीतकार अनजान थे, जिन्होंने मीराबाई के उसी मूल भजन के भाव और शुरुआती पंक्तियों से प्रेरणा लेकर इस सिनेमैटिक मास्टरपीस के बोल रचे थे। संगीतकार बप्पी लहरी (Bappi Lahiri) के निर्देशन में बने इस गाने को महान पार्श्व गायक किशोर कुमार (Kishore Kumar) ने अपनी जादुई और ऊर्जावान आवाज से सजाया था। सिल्वर स्क्रीन पर इस गाने को महानायक अमिताभ Bachchan पर फिल्माया गया था, जिसमें अभिनेत्री स्मिता पाटिल (Smita Patil) भी उनके साथ नजर आई थीं। सिनेमाघरों में जब यह गाना बजा था, तो दर्शकों ने तालियों और सिक्कों की बरसात करके इसका स्वागत किया था। हालांकि यह एक फिल्मी गीत बन चुका था, लेकिन इसकी मूल आत्मा वही 400 साल पुरानी मीरा की कृष्ण भक्ति थी।
परंपरा और आधुनिकता का यह संगम हमेशा रहेगा जीवंत
संत मीराबाई के भजन इस बात का प्रमाण हैं कि सच्ची भावना और ईश्वर के प्रति समर्पण कभी काल के गाल में समाहित नहीं होता। समय चाहे कोई भी हो, तकनीक चाहे कितनी भी बदल जाए, लेकिन मानवीय संवेदनाओं को छूने वाली कला हमेशा अमर रहती है। मीरा का यह भजन इस बात का प्रतीक है कि जब कोई भक्त अपनी संपूर्ण चेतना को अपने आराध्य के चरणों में समर्पित कर देता है, तो उसकी आवाज सदियों तक गूंजती रहती है। आज जब हम आधुनिक दौर में जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं, तब यह भजन हमें हमारी समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से जोड़े रखता है। आने वाली पीढ़ियां भी जब इस भजन की पंक्तियों को सुनेंगी, तो वे उसी भक्ति और आनंद के सागर में गोते लगाएंगी, जिसका अनुभव 400 साल पहले मीराबाई ने किया था।