कनाडा से मोहभंग: सख्त वीजा नियम, जॉब का अकाल और सुरक्षा की चिंता

कनाडा से मोहभंग: सख्त वीजा नियम, जॉब का अकाल और सुरक्षा की चिंता

बीते कुछ वर्षों में पंजाब और भारत के अन्य राज्यों के युवाओं के लिए 'कनाडा ड्रीम' सफलता की सबसे बड़ी गारंटी माना जाता था। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय उच्च शिक्षा के परिदृश्य में एक बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ आ चुका है। जो कनाडा कभी भारतीय छात्रों की पहली पसंद हुआ करता था, वही देश अब उनके लिए दिक्कतों का नया केंद्र बनता जा रहा है। सख्त होते वीजा नियम, पढ़ाई के बाद काम के अवसरों (PGWP) में भारी कटौती, मंदी के कारण नौकरी का गंभीर संकट और सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने भारतीय युवाओं को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप, कनाडा जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है और बड़ी संख्या में युवा अब कनाडा को अलविदा कहकर अन्य सुरक्षित व टिकाऊ विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।

#1. स्टडी परमिट और पोस्ट ग्रेजुएट वर्क परमिट में भारी सख्ती: वीजा मिलने के लाले

कनाडा सरकार ने हाल के महीनों में अपने आव्रजन (इमिग्रेशन) और वर्क परमिट नियमों में आमूल-चूल बदलाव किए हैं। नए नियमों के तहत स्टडी परमिट की कुल संख्या में बड़ी कटौती की गई है, जिससे वीजा रिजेक्शन रेट (अस्वीकृति दर) में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इसके अलावा, पहले जहां किसी भी मान्यता प्राप्त कॉलेज से डिग्री या डिप्लोमा करने के बाद 3 साल का पोस्ट-ग्रेजुएशन वर्क परमिट (PGWP) आसानी से मिल जाता था, वहीं अब केवल उन्हीं कोर्सेज को वर्क परमिट दिया जा रहा है जो कनाडा की तात्कालिक श्रम बाजार की जरूरतों (लेबर शॉर्टेज) से सीधे जुड़े हैं। इस नीतिगत बदलाव ने उन हजारों छात्रों का भविष्य अनिश्चितता में डाल दिया है जो लाखों रुपये का कर्ज लेकर बेहतर भविष्य का सपना सजाकर कनाडा पहुंचे थे।

#1. कनाडा में गहराया रोजगार और आवास का संकट: पार्ट-टाइम जॉब मिलना भी हुआ नामुमकिन

कनाडा में पढ़ाई के लिए जाने वाले छात्रों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय स्थिरता की होती है। पहले जहां छात्र पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट-टाइम काम करके अपना रहने का खर्च और कॉलेज की फीस निकाल लेते थे, वहीं अब हालात बिल्कुल विपरीत हो चुके हैं। ओंटारियो, ब्रिटिश कोलंबिया और टोरंटो जैसे प्रमुख प्रांतों में मंदी के कारण स्थानीय नौकरियों का भारी अकाल पड़ा हुआ है। एक-एक एंट्री-लेवल या पार्ट-टाइम जॉब के लिए सैकड़ों भारतीय छात्रों की लंबी लाइनें लग रही हैं। इसके साथ ही, आसमान छूते किराए और महंगे हाउसिंग मार्केट ने छात्रों की कमर तोड़कर रख दी है। भारी-भरकम फीस भरने के बावजूद सम्मानजनक नौकरी न मिल पाना छात्रों के बढ़ते मानसिक तनाव और मोहभंग की मुख्य वजह बन गया है।

#1. सुरक्षा तनाव और गिरती जीवन शैली: अभिभावकों की बढ़ी चिंताएं

केवल आर्थिक और वीजा समस्याएं ही नहीं, बल्कि कनाडा के विभिन्न शहरों में बढ़ती सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी भारतीय परिवारों को डरा रही हैं। कूटनीतिक तनाव और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा को लेकर उपजी अनिश्चितता के चलते अब भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को कनाडा भेजने से कतरा रहे हैं। इसके साथ ही, पीआर (परमानेंट रेजिडेंसी) हासिल करने का रास्ता बेहद कठिन और लंबा हो जाने के कारण छात्रों को यह महसूस हो रहा है कि कनाडा में उनके द्वारा किया गया भारी वित्तीय निवेश अब उस अनुपात में परिणाम नहीं दे रहा है। इस असुरक्षा के माहौल ने युवाओं के मन में 'कनाडा ड्रीम' की चमक को पूरी तरह से फीका कर दिया है।

#1. भारतीय छात्रों का नया ठिकाना: यूरोप, न्यूजीलैंड और एशिया के अन्य देशों की ओर बढ़ा झुकाव

कनाडा में पैदा हुए इस संकट के बाद अब भारतीय छात्रों का रुझान नए शैक्षणिक स्थलों की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। जर्मनी, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य यूरोपीय देश अब भारतीय युवाओं के लिए पसंदीदा विकल्प बनकर उभर रहे हैं। इन देशों में पारदर्शी इमिग्रेशन नीतियां, बेहतर सुरक्षा माहौल और कौशल-आधारित रोजगार की बेहतर संभावनाएं मिल रही हैं। जानकारों का कहना है कि यदि कनाडा ने अपनी नीतियों में संतुलन नहीं बनाया, तो आने वाले समय में कनाडाई विश्वविद्यालयों और अर्थव्यवस्था को मिलने वाले अरबों डॉलर के अंतरराष्ट्रीय राजस्व को गहरा झटका लगना तय है।