काउंसलिंग या रिजल्ट के बाद नहीं बदल सकते कैटेगरी, EWS आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
देशभर के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए आयोजित होने वाली नीट यूजी (NEET UG) परीक्षा को लेकर छात्रों के बीच हमेशा से ही जबरदस्त उत्साह और तनाव दोनों का माहौल रहता है। इस बीच देश के एक प्रमुख उच्च न्यायालय ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण के लाभ को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है। कई बार छात्र परीक्षा के फॉर्म भरते समय जल्दबाजी में या सही जानकारी न होने के कारण जनरल या अन्य श्रेणियों में आवेदन कर देते हैं और बाद में काउंसलिंग के समय या रिजल्ट आने के बाद ईडब्ल्यूएस कोटे का लाभ लेने की कोशिश करते हैं। अदालत के इस नए फैसले के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि तय की गई समय-सीमा के बाद मनमाने तरीके से श्रेणी में बदलाव की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह फैसला उन तमाम उम्मीदवारों के लिए एक बड़ी चेतावनी और सीख है जो आवेदन प्रक्रिया पूरी होने के बाद आरक्षण का लाभ पाने की उम्मीद लगाए बैठे थे।
यह पूरा कानूनी मामला तब शुरू हुआ जब कुछ उम्मीदवारों ने नीट यूजी की परीक्षा पास करने और अखिल भारतीय स्तर पर मेरिट लिस्ट जारी होने के बाद अपनी कैटेगरी जनरल या ओबीसी से बदलकर ईडब्ल्यूएस करने की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया। इन छात्रों का तर्क था कि काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान उन्हें अपने दस्तावेजों को अपडेट करने या नया प्रमाण पत्र दिखाने का मौका मिलना चाहिए। हालांकि, जब मामला अदालत के सामने आया तो न्यायूर्ति ने तमाम दलीलों को गहराई से परखा और पाया कि इस तरह के बदलाव से पूरी चयन प्रक्रिया और अन्य योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों पर सीधा असर पड़ता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि नियमों के दायरे से बाहर जाकर किसी भी उम्मीदवार को परीक्षा संपन्न होने के बाद अपनी मूल श्रेणी बदलने की छूट नहीं दी जा सकती है।
इस मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में टिप्पणी की कि खेल शुरू होने के बाद उसके नियमों में बदलाव करना कानूनन सही नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा आवेदन फॉर्म भरने की निर्धारित प्रक्रिया चल रही थी, तब सभी उम्मीदवारों को अपनी सही श्रेणी का चयन करना अनिवार्य था। परीक्षा आयोजित होने, परिणाम घोषित होने और मेरिट लिस्ट तैयार हो जाने के बाद यदि इस तरह के बदलाव की अनुमति दी जाने लगी, तो इससे पूरी चयन सूची प्रभावित होगी और उन छात्रों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने शुरू से ही अपने सही दस्तावेजों और कैटेगरी के आधार पर आवेदन किया था। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए यह भी दोहराया कि कट-ऑफ या आवेदन की अंतिम तिथि के बाद जारी किए गए प्रमाण पत्रों को शुरुआती चयन का आधार नहीं बनाया जा सकता।
इस अहम न्यायिक फैसले से देश भर के मेडिकल aspirants को यह सिख मिलती है कि उन्हें किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के फॉर्म भरते समय अत्यधिक सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। यदि कोई छात्र ईडब्ल्यूएस या किसी अन्य आरक्षित श्रेणी के तहत लाभ प्राप्त करना चाहता है, तो उसके पास आवेदन की निर्धारित अंतिम तिथि से पहले का वैध प्रमाण पत्र होना अनिवार्य है। काउंसलिंग के दौरान केवल अंतिम समय में प्रमाण पत्र बनवाकर श्रेणी बदलने का दावा करना कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा। विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि छात्रों को हमेशा आधिकारिक सूचना पत्र (Information Bulletin) को ध्यान से पढ़ना चाहिए और सभी जरूरी कागजात समय से पहले तैयार रखने चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की मानसिक परेशानी या कानूनी पचड़े से बचा जा सके।