Diwali in Kashmir : जब सूफी संगीत के बीच हुई लक्ष्मी आरती ,श्रीनगर के घंटा घर पर दिवाली ने दिया दुनिया को बड़ा संदेश
News India Live, Digital Desk: यह दिवाली कश्मीर के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि उम्मीद की एक ऐसी किरण लेकर आई, जिसका इंतजार घाटी ने दशकों से किया था. श्रीनगर का ऐतिहासिक लाल चौक और उसका घंटा घर, जो कभी विरोध प्रदर्शनों और तनाव का प्रतीक माना जाता था, सोमवार शाम को दीयों की रोशनी से जगमगा उठा. यहां एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसकी कल्पना शायद कुछ साल पहले तक कोई नहीं कर सकता था.
सैकड़ों लोग, जिनमें स्थानीय मुस्लिम और कश्मीरी पंडित शामिल थे, एक साथ मिलकर दिवाली का जश्न मना रहे थे. यह जश्न कश्मीर में बदलते समय, शांति और आपसी भाईचारे की वापसी का एक जीवंत प्रतीक बन गया.
वह खास पल, जब परंपराएं एक हुईं
इस कार्यक्रम का सबसे खूबसूरत और भावनात्मक पल वह था जब पारंपरिक लक्ष्मी पूजा और आरती के साथ-साथ मंच पर सूफी संगीत की धुनें गूंज रही थीं. एक तरफ जहां पंडित मंत्रोच्चार के साथ मां लक्ष्मी की आराधना कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर सूफी गायक कश्मीर की संस्कृति में रची-बसी शांति और इबादत की रूहानी प्रस्तुतियां दे रहे थे. यह एक ऐसा संगम था जो "नए कश्मीर" की सच्ची तस्वीर पेश कर रहा था, जहां अलग-अलग आस्थाएं एक-दूसरे का सम्मान करती हैं.
35 साल बाद लौटा खोया हुआ जश्न
यह आयोजन उन कश्मीरी पंडितों के लिए विशेष रूप से भावुक करने वाला था, जिन्हें आतंकवाद के दौर में घाटी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. कई लोगों के लिए, यह लगभग 35 वर्षों में पहली बार था जब वे अपने घर में, अपनी जमीन पर, सार्वजनिक रूप से इस तरह दिवाली मना रहे थे. उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे और एक उम्मीद थी कि शायद अब घाटी में शांति और सुरक्षा का माहौल स्थायी हो जाएगा, जिससे वे अपने घरों को लौट सकेंगे.
यह सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि स्थानीय कश्मीरी मुसलमानों ने भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. उन्होंने अपने पंडित भाइयों को मिठाइयां बांटीं और दीये जलाने में मदद की. घंटा घर पर हुई यह दिवाली सिर्फ एक त्योहार का जश्न नहीं थी; यह दशकों के अंधेरे के बाद एक उज्ज्वल भविष्य की आशा का दीपक जलाने जैसा था. यह दुनिया को यह बताने का एक तरीका था कि कश्मीर अब बदल रहा है.