ममता बनर्जी को गिरफ्तार करने की मांग, छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम के इस बयान ने देश की सियासत में हलचल बढ़ा दी
News India Live, Digital Desk : देश की राजनीति में एक बार फिर दो बड़े राज्यों छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के बीच शब्दों की जंग तेज़ हो गई है। राजनीति का मैदान ऐसा है जहाँ कोई खबर कब सरहदों को पार कर जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। हाल ही में पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की रेड के दौरान जो कुछ हुआ, उसकी गूँज अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तक पहुँच गई है।
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कड़ा हमला बोला है और यहाँ तक कह दिया है कि ऐसी परिस्थितियों में गिरफ्तारी ज़रूरी हो जाती है। चलिए जानते हैं कि आखिर ये पूरा मामला क्या है और इसमें 'छत्तीसगढ़ एंगल' क्या है?
बात एजेंसी की सुरक्षा की है (The Matter of Enforcement Safety)
पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब खबर आई कि पश्चिम बंगाल में ED की टीम अपना काम करने गई थी और वहां उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ा। छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम ने इस घटना को "लोकतंत्र पर प्रहार" बताया है। उनका कहना है कि अगर देश में केंद्रीय जांच एजेंसियाँ ही सुरक्षित नहीं रहेंगी या उन्हें अपना काम करने से बलपूर्वक रोका जाएगा, तो फिर कानून का शासन कैसे चलेगा?
छत्तीसगढ़ के नेता ने साफ़ शब्दों में कहा कि कोई कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो, वह कानून से ऊपर नहीं हो सकता।
"ममता बनर्जी को गिरफ्तार किया जाए"—एक बड़ा सियासी दांव
डिप्टी सीएम का यह बयान महज़ एक शिकायत नहीं है, बल्कि एक सीधा आरोप है। उन्होंने ममता सरकार पर केंद्रीय जांच में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए यहाँ तक कह दिया कि उनकी गिरफ्तारी तक की नौबत आनी चाहिए। उनका मानना है कि मुख्यमंत्री होने के नाते यह ममता बनर्जी की ज़िम्मेदारी थी कि वे एजेंसी को सुरक्षा और सहयोग दें, लेकिन इसके बजाय वहाँ अवरोध पैदा हुए।
अक्सर राज्यों के बीच ऐसे तनाव देखे जाते हैं जहाँ एक दल के नेता दूसरे राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं। छत्तीसगढ़ का यह कड़ा रुख दिखाता है कि आने वाले समय में विपक्षी गठबंधन बनाम केंद्र की ये जंग और भी तल्ख हो सकती है।
क्या ये बयानबाज़ी सिर्फ एक शुरुआत है?
छत्तीसगढ़ में इस तरह का बयान आना कई मायनों में अहम है। यह दिखाता है कि बीजेपी के नेता अब भ्रष्टाचार और जांच में अड़चनों के मुद्दे पर काफी आक्रामक हैं। डिप्टी सीएम के मुताबिक, अगर ऐसी हरकतों पर रोक नहीं लगी, तो यह पूरे देश की संघीय व्यवस्था के लिए खतरा बन जाएगा।
सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या वाक़ई बंगाल में इस कड़ाई का असर होगा, या फिर यह 2026 के राजनीतिक समीकरणों को साधने की एक कोशिश है?
एक बात तो तय है जांच एजेंसियों का काम और उस पर होती ये राजनीति अब थमनी नहीं वाली है। एक तरफ राज्य के अपने अधिकार हैं और दूसरी तरफ केंद्र की एजेंसियों की स्वायत्तता। जब ये दोनों टकराते हैं, तो ममता बनर्जी बनाम केंद्रीय नेता जैसी स्थितियाँ सामने आती हैं।
आपको क्या लगता है? क्या मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी सिर्फ अपने राज्य की सीमाओं तक सीमित है या उन्हें केंद्रीय कानून का भी उतना ही सम्मान करना चाहिए? हमें अपनी राय ज़रूर बताएं।