CJI सूर्यकांत ने खोली जजों की ज़िंदगी की फाइल, कहा काम के बीच खेलकूद बहुत जरुरी

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News India Live, Digital Desk : हम जब भी किसी जज (Judge) को देखते हैं, तो हमारे दिमाग में एक बहुत ही गंभीर तस्वीर बनती है। काला कोट, चेहरे पर संजीदगी, हाथ में हथौड़ा और कानून की मोटी-मोटी किताबें। हमें लगता है कि इनके पास तो इमोशंस या मस्ती के लिए वक्त ही नहीं होगा।

लेकिन, हकीकत इससे बहुत अलग है। भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने हाल ही में एक ऐसी बात कही है, जो न सिर्फ कानून के जानकारों के लिए, बल्कि हम आम नौकरी-पेशा लोगों के लिए भी बहुत मायने रखती है। एक क्रिकेट टूर्नामेंट के उद्घाटन के मौके पर बोलते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि "जजों का काम बेहद तनावपूर्ण (Stressful) होता है।"

10 से 5 की नौकरी नहीं है जज गिरी

CJI ने बहुत ही सरल शब्दों में समझाया कि न्यायपालिका का काम सिर्फ सुबह 10 बजे कोर्ट में बैठना और शाम 4 बजे उठ जाना नहीं है। इसके पीछे घंटों की पढ़ाई, रिसर्च और बड़े-बड़े फैसले लेने का मानसिक दबाव (Mental Pressure) होता है। एक गलत फैसला किसी की ज़िंदगी बदल सकता है, इसलिए दिमाग हमेशा "अलर्ट मोड" पर रहता है।

उन्होंने कहा कि इस भागदौड़ और फाइलों के बोझ तले, जज और वकील अक्सर अपनी खुद की सेहत और मानसिक शांति को नजरअंदाज़ कर देते हैं।

तो फिर इसका इलाज क्या है?

CJI सूर्यकांत ने इसका एक बहुत प्यारा इलाज बताया है खेलकूद और मनोरंजक गतिविधियां (Recreational Activities)।
उन्होंने वकीलों और जजों को सलाह दी कि जीवन में सिर्फ़ काम ही सब कुछ नहीं है। कभी-कभी कोट उतारकर मैदान में उतरना, क्रिकेट खेलना या दोस्तों के साथ हंसना-बोलना बहुत जरुरी है।

उन्होंने कहा, "ये खेल हमें तनाव से मुक्ति दिलाते हैं। जब आप मैदान पर होते हैं, तो आप जज या वकील नहीं होते, आप सिर्फ़ एक खिलाड़ी होते हैं। यह शारीरिक और मानसिक दोनों सेहत के लिए एक टॉनिक का काम करता है।"

मैदान में कोई सीनियर-जूनियर नहीं

इस बात में वाकई दम है। कोर्ट रूम में जहाँ प्रोटोकॉल और सीनियरिटी का सख्त पालन होता है, वहीं खेल का मैदान सबको बराबरी पर ले आता है। जब एक जूनियर वकील अपने सीनियर या किसी जज को आउट करता है, या उनके साथ टीम में खेलता है, तो जो रिश्ता बनता है वो फाइलों से परे होता है।

हम सबके लिए सीख

CJI साहब की यह बात सिर्फ जजों के लिए नहीं, हम सबके लिए है। चाहे आप कॉरपोरेट में हों, बिज़नेस में हों या स्टूडेंट हों काम का प्रेशर हर जगह है। लेकिन अगर आप खुद को रीचार्ज नहीं करेंगे, थोड़ा एन्जॉय नहीं करेंगे, तो आप जल कर राख (Burnout) हो जाएंगे।

तो अगर देश के चीफ जस्टिस भी मानते हैं कि "खेलना जरुरी है", तो फिर आप क्यों इंतज़ार कर रहे हैं? इस संडे लैपटॉप बंद कीजिये और थोड़ा मुस्कुरा लीजिये!