लिव-इन में लंबी सहमति के बाद शादी न होना 'रेप' नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Bilaspur High Court) ने लिव-इन रिलेशनशिप और आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. माननीय अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि दो बालिग (वयस्क) आपसी रजामंदी के साथ लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हों, तो बाद में किन्हीं कारणों से शादी नहीं होने मात्र से उस रिश्ते को 'रेप' (बलात्कार) की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता. बिलासपुर हाईकोर्ट ने मामले की शुरुआती सुनवाई (Admission Stage) में ही पीड़िता की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया और निचली अदालत (Trial Court) द्वारा आरोपी युवक को बालिग और रजामंदी के आधार पर बरी किए जाने के फैसले को शत-प्रतिशत सही ठहराया.
रायपुर का है मामला, IIM में पढ़ाई के दौरान शुरू हुआ था रिश्ता
यह पूरा विवाद छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का है. मामले के मुताबिक, साल 2019 में एक 40 वर्षीय तलाकशुदा महिला ने देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईएम रायपुर (IIM Raipur) में एमबीए (MBA) कोर्स में दाखिला लिया था. यहीं पर पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात एक साथी युवक से हुई और धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई.
महिला ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि जुलाई 2019 में युवक ने उसे ग्रुप स्टडी के बहाने अपने फ्लैट पर बुलाया और वहां शादी का पक्का भरोसा देकर पहली बार शारीरिक संबंध बनाए. महिला का दावा था कि इसके बाद दोनों लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे. महिला के अनुसार, जब भी वह आगे बढ़कर शादी करने का दबाव बनाती, तो युवक कोई न कोई बहाना बनाकर बात को टाल देता था.
'क्रिश्चियन कम्युनिटी और तलाक' का हवाला देकर पीछे हटा युवक
रिश्ते में असली मोड़ अगस्त 2021 में आया, जब युवक ने शादी करने से साफ इंकार कर दिया. युवक का तर्क था कि महिला के पहले से तलाकशुदा होने और दूसरे धर्म (ईसाई समुदाय) से ताल्लुक रखने के कारण उसके माता-पिता और परिवार वाले इस अंतरधार्मिक विवाह के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं हैं. युवक के हाथ पीछे खींचने के बाद महिला ने रायपुर पुलिस और राज्य महिला आयोग में युवक के खिलाफ धोखाधड़ी और बलात्कार की गंभीर धाराओं के तहत शिकायत दर्ज करा दी थी.
हाईकोर्ट की दो टूक: आज की महिलाएं आत्मनिर्भर, अपने फैसले खुद लेने में सक्षम
इस मामले पर पहले सुनवाई करते हुए निचली अदालत ने दोनों पक्षों को मैच्योर, पढ़ा-लिखा और आपसी सहमति से रिश्ते में मानते हुए आरोपी युवक को बालिग होने के नाते बरी कर दिया था. निचली अदालत के इसी फैसले को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
बिलासपुर हाईकोर्ट के जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की डिवीजन बेंच ने इस अपील पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आज के आधुनिक समय में महिलाएं आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं और अपने निजी जीवन के फैसले समझदारी से लेने में सक्षम हैं. केस डायरी और रिकॉर्ड से यह पूरी तरह साफ है कि दोनों पक्षों के बीच एक लंबी अवधि तक आपसी रजामंदी से संबंध बने रहे. ऐसे में सिर्फ शादी के वादे से मुकर जाने के आधार पर इसे जबरन बनाया गया संबंध या रेप का अपराध कतई नहीं माना जा सकता.
व्यवहार और रिश्ते की अवधि तय करेगी 'सहमति'
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कानून को और स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में यह तय करने के लिए कि संबंध आपसी सहमति से था या दबाव में, कोर्ट को उस रिश्ते की कुल अवधि और दोनों पक्षों के आपसी व्यवहार को गहराई से देखना जरूरी है. हाईकोर्ट को ट्रायल कोर्ट के पुराने फैसले में कोई भी कानूनी या प्रक्रियात्मक गड़बड़ी नहीं मिली, जिसके चलते बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस अपील को पहली ही नजर में खारिज कर आरोपी को बड़ी राहत दी है.