बिलासपुर डबल मर्डर केस: 12 और 10 साल के मासूम बच्चों की गवाही बनी काल
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से एक बेहद दर्दनाक, मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली और सनसनीखेज न्याय की गाथा सामने आई है, जिसने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। परिवार के भीतर संपत्ति और मकान के हिस्से को लेकर उपजे खूनी विवाद ने एक हंसते-खेलते परिवार को पूरी तरह तबाह कर दिया, जहां पहले सिर से पिता का साया उठ चुका था और बाद में अपनों ने ही मां की ममता का गला घोंट दिया। इस वीभत्स हत्याकांड में मृतका के अपने ही घर के दो मासूम बच्चों—12 साल के बेटे और 10 साल की बेटी—की साहसी और अडिग गवाही सबसे बड़ा कानूनी हथियार साबित हुई। बच्चों की इसी स्पष्ट और निर्भीक गवाही के आधार पर अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने आरोपी सगी दादी और चाचा को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस बहुचर्चित फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भले ही जुर्म करने वाले कितने भी षड्यंत्र रच लें, लेकिन सच और मासूमों की गवाही के आगे कानून का शिकंजा आखिरकार कस ही जाता है। आइए आज इस विस्तृत रिपोर्ट में जानते हैं कि बिलासपुर के इस बहुचर्चित डबल मर्डर केस की पूरी पृष्ठभूमि क्या थी और अदालत ने अपने फैसले में क्या-क्या महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।
संपत्ति और मकान के हिस्से को लेकर उपजा था खौफनाक विवाद
पुलिस और अभियोजन पक्ष से मिली जानकारी के अनुसार, यह पूरा खौफनाक मामला बिलासपुर के ग्रामीण क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक स्थानीय गांव का है, जहां मृतका अपने मासूम बच्चों के साथ रह रही थी। कुछ समय पहले मृतका के पति का निधन हो चुका था, जिसके बाद से घर में संपत्ति के बंटवारे, मकान के निर्माण और खाली पड़े पीछे के हिस्से के इस्तेमाल को लेकर परिवार के भीतर ही कलह शुरू हो गई थी। मृतका की सास (बच्चों की दादी) प्रमिला वैष्णव और देवर (चाचा) लाला वैष्णव लगातार उस पर दबाव बना रहे थे। घटना वाले दिन बाजार से घर लौटते वक्त भी आरोपियों ने महिला के साथ जमकर गाली-गलौज और विवाद किया था। हालांकि उस वक्त आसपास के लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को शांत करा दिया था, लेकिन अंदर ही अंदर रची जा रही साजिश का किसी को अंदाजा नहीं था। उसी शाम जब महिला अपने घर पर थी, तो आरोपियों ने लोहे की रॉड और सब्बल से उसके सिर पर ताबड़तोड़ कई जानलेवा हमले कर दिए, जिससे उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
12 और 10 साल के बच्चों की आंखों देखा हाल बना सबसे बड़ा सबूत
इस खौफनाक वारदात के दौरान मृतका के दोनों छोटे बच्चे (उम्र करीब 12 और 10 वर्ष) अपनी मां के बिल्कुल पास मौजूद थे और उन्होंने अपनी आंखों से अपनी ही मां पर दादी और चाचा द्वारा किए गए क्रूर हमले को देखा था। घटना के तुरंत बाद सहमे हुए बच्चे दौड़कर अपनी दुकान पर बैठे परिजनों के पास पहुंचे और रोते हुए पूरी आपबीती बताई कि कैसे उनके अपने ही खून के रिश्तों ने इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया है। मुकदमे की सुनवाई के दौरान जब ये दोनों मासूम अदालत के कटघरे में पहुंचे, तो उन्होंने बिना किसी डर के पूरी सच्चाई बयां की। बचाव पक्ष के वकीलों ने यह दलील देने की कोशिश की कि बच्चे नाबालिग हैं और उनके बयानों को सिखाया-पढ़ाया गया हो सकता है तथा उनके बयानों में कुछ मामूली विरोधाभास हैं। लेकिन पंचम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश छाया सिंह की अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि बच्चों की कम उम्र या मृतका से उनके रिश्ते के आधार पर उनकी प्रत्यक्ष गवाही को झूठा नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि मुख्य बिंदुओं पर उनके बयान पूरी तरह से स्थिर, स्पष्ट और अकाट्य थे।
दादी और चाचा को उम्रकैद, अनाथ बच्चों के भविष्य के लिए अदालत का निर्देश
अदालत ने उपलब्ध कराए गए वैज्ञानिक साक्ष्यों, खून से सने कपड़ों, हत्या में प्रयुक्त हथियार और सबसे बढ़कर दोनों मासूम बच्चों की साहसिक गवाही के आधार पर आरोपी दादी प्रमिला वैष्णव और चाचा लाला वैष्णव को भारतीय न्याय संहिता और आईपीसी की गंभीर धाराओं (धारा 302 और 34) के तहत दोषी करार दिया। न्यायाधीश ने दोनों दोषियों को आजीवन कारावास (Life Imprisonment) और आर्थिक दंड की सजा सुनाई। इसके साथ ही, इस फैसले का सबसे संवेदनशील पहलू यह रहा कि अदालत ने माता-पिता दोनों का साया खो चुके उन दोनों मासूम और अनाथ बच्चों के भविष्य, पुनर्वास और वित्तीय सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को तुरंत आवश्यक कार्रवाई करने का सख्त निर्देश भी जारी किया है। इस फैसले के आने के बाद से कानूनी गलियारों और आम जनता के बीच इस बात की चर्चा है कि किस तरह दो नन्हे बच्चों की बहादुरी ने अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया।