भूपेश बघेल और गौरव गोगोई के काफिले पर पथराव के बाद फेंका गया एसिड, बाल-बाल बचे नेता

भूपेश बघेल और गौरव गोगोई के काफिले पर पथराव के बाद फेंका गया एसिड, बाल-बाल बचे नेता

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में चुनावी सरगर्मी और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बीच जब हिंसा और नफरत अपनी सारी हदें पार कर देती है, तो देश का लोकतंत्र शर्मसार हो जाता है। पूर्वोत्तर राज्य असम से राजनीति को हिला देने वाली एक बेहद सनसनीखेज और जानलेवा खबर सामने आई है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तथा लोकसभा सांसद गौरव गोगोई के काफिले पर असम में उस समय अचानक एक घातक हमला बोल दिया गया जब वे किसी राजनीतिक कार्यक्रम या दौरे पर थे। हमलावरों ने न केवल उनके वाहनों के काफिले पर अंधाधुंध पथराव किया, बल्कि कथित तौर पर उनकी गाड़ियों पर तेजाब जैसी खतरनाक चीजें भी फेंकी। इस वीभत्स और खतरनाक हमले में कांग्रेस के दोनों दिग्गज नेता बाल-बाल बच गए, लेकिन इस घटना के बाद से पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में भारी भूचाल आ गया है। आइए इस मर्माहत कर देने वाले राजनीतिक हमले के हर पहलू की गहराई से पड़ताल करते हैं और जानते हैं कि आखिर असम की धरती पर इस खौफनाक साजिश के पीछे का सच क्या है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल और असम के प्रभावशाली युवा नेता गौरव गोगोई पार्टी के संगठनात्मक कार्यों और आगामी राजनीतिक रणनीतियों के सिलसिले में असम के एक क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। उनका काफिला जब एक निर्धारित मार्ग से गुजर रहा था, तभी अचानक से कुछ अज्ञात और उग्र प्रदर्शनकारियों ने उनके रास्ते को अवरुद्ध कर दिया। इससे पहले कि सुरक्षाकर्मी और नेता कुछ समझ पाते, भीड़ की तरफ से ताबड़तोड़ पत्थरबाजी शुरू कर दी गई। स्थिति तब और अधिक खतरनाक हो गई जब हमलावरों ने गाड़ियों को निशाना बनाते हुए उनपर ज्वलनशील पदार्थ और एसिड तक फेंकने की कोशिश की। गाड़ियों के शीशे चकनाचूर हो चुके थे और अंदर बैठे नेता गंभीर रूप से घायल हो सकते थे, लेकिन ड्राइवर की सूझबूझ और सुरक्षाबलों के त्वरित हस्तक्षेप के कारण दोनों नेता इस जानलेवा हमले की चपेट में आने से बाल-बाल बच गए।

किसी भी लोकतांत्रिक देश में वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब राजनीति में हिंसा, डराने-धमकाने और शारीरिक हमलों का दौर शुरू हो जाता है, तो यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। भूपेश बघेल और गौरव गोगोई जैसे राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के काफिले पर इस प्रकार का सुनियोजित हमला यह साबित करता है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति किस हद तक चरमरा चुकी है। सत्ताधारी दल और स्थानीय प्रशासन पर यह बहुत बड़ा सवालिया निशान है कि जब देश के मुख्य विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेता किसी राज्य के दौरे पर होते हैं, तब उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए जाते। इस प्रकार के हमलों का मुख्य उद्देश्य विपक्षी नेताओं के हौसले को तोड़ना और उन्हें राजनीतिक रूप से भयभीत करना होता है, जिसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जा सकता है।

इस जानलेवा हमले के तुरंत बाद कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय और प्रांतीय नेतृत्व ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन पर जमकर निशाना साधा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह हमला पूरी तरह से प्रायोजित था और इसके पीछे स्थानीय राजनीतिक ताश के पत्तों का हाथ है जो विपक्षी दलों की बढ़ती लोकप्रियता से बौखलाए हुए हैं। पार्टी ने मांग की है कि इस घटना में शामिल एक-एक उपद्रवी और मुख्य साजिशकर्ता को तुरंत बेनकाब किया जाए तथा उनके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में इस तरह की गुंडागर्दी की पुनरावृत्ति न हो सके। इस घटना के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं और सरकार से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग की है।

असम में हुई इस हिंसक घटना ने पूर्वोत्तर भारत की राजनीति को एक बार फिर से गर्मा दिया है। जैसे-जैसे चुनावी सरगर्मी तेज हो रही है, राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग अब मैदानी हिंसा का रूप लेती जा रही है, जो बेहद चिंताजनक है। भूपेश बघेल और गौरव गोगोई पर हुआ यह हमला इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक संघर्ष और अधिक तीखा होने वाला है। जनता और राजनीतिक विश्लेषक अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि निर्वाचन आयोग और राज्य प्रशासन इस हाई-प्रोफाइल मामले में कितनी निष्पक्षता और सख्ती से कार्रवाई करता है। नेताओं की सुरक्षा का यह गंभीर मुद्दा अब संसद से लेकर सड़क तक मुख्य बहस का केंद्र बन चुका है, और यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या इस तरह की हिंसा पर लगाम लगाने के लिए प्रशासन कोई ठोस कदम उठा पाता है या नहीं।