रायपुर के 32 थानों में 24 घंटे के अंदर दर्ज हुए 132 अपहरण के मामले
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक बेहद चौंकाने वाली और सनसनीखेज खबर सामने आई है, जिसने आम नागरिकों के साथ-साथ पुलिस प्रशासन के भी होश उड़ा दिए हैं. हाल ही में रायपुर पुलिस कमिश्नर कार्यालय से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, शहर के कुल 32 थानों में महज 24 घंटे के भीतर अपहरण (Kidnapping and Abduction) के 132 मामले दर्ज किए गए हैं. एक ही दिन में इतनी बड़ी संख्या में अपहरण के केस सामने आने से पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया है, और लोग यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि क्या राजधानी में कानून-व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है या इसके पीछे कोई और बड़ी वजह है. सोशल मीडिया से लेकर आम चौपालों तक इस बात की चर्चा जोरों पर है कि आखिर एक ही दिन में इतने सारे लोग कैसे गायब हो सकते हैं या फिर पुलिस थानों में अचानक इतनी एफआईआर दर्ज होने के पीछे का असली सच क्या है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए खुद पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला ने इस मामले पर आधिकारिक बयान जारी किया है और इस पूरी घटना के पीछे की असल वजह का खुलासा किया है, जिससे लोगों को काफी हद तक राहत और स्पष्टता मिली है.
कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला ने बताई 24 घंटे में 132 मामले दर्ज होने की असली वजह
जब रायपुर शहर के थानों में 24 घंटे के भीतर 132 अपहरण के मामले दर्ज होने की यह खबर आग की तरह फैली, तो पुलिस महकमे में खलबली मच गई और पुलिस अधिकारियों के पास फोन घनघनाने लगे. इस भारी असमंजस और डर के माहौल को शांत करते हुए रायपुर के पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला ने मीडिया के सामने आकर स्थिति का पूरा सच स्पष्ट किया. कमिश्नर ने बताया कि जितने भी मामले दर्ज हुए हैं, वे सभी किसी बड़े क्रिमिनल गैंग, फिरौती या जबरन अपहरण (Forced Abduction) से जुड़े नहीं हैं, बल्कि इनमें से अधिकांश मामले नाबालिग लड़कियों और महिलाओं के अपनी मर्जी से घर छोड़ने या प्रेम प्रसंग के मामलों से संबंधित हैं. उन्होंने समझाया कि भारतीय कानून और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, जब भी कोई नाबालिग लड़की या महिला बिना बताए घर से चली जाती है, तो पुलिस के पास कानूनी रूप से यह अनिवार्य बाध्यता होती है कि वह तुरंत भारतीय न्याय संहिता या पुरानी आईपीसी की सुसंगत धाराओं के तहत अपहरण (अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाने) का मामला दर्ज करे. यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों में लंबित मामलों के निपटारे और विशेष अभियान के तहत एक साथ इतनी बड़ी संख्या में एफआईआर दर्ज की गईं.
पुलिस की विशेष कार्यप्रणाली और कानूनी बाध्यताओं का क्या है पूरा गणित?
आम जनता अक्सर 'अपहरण' शब्द सुनते ही किसी बड़ी आपराधिक वारदात, गैंगवॉर या फिरौती के लिए اغवा किए जाने की कल्पना करने लगती है, लेकिन पुलिस की तकनीकी और कानूनी भाषा इसके बिल्कुल उलट होती है. कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस विभाग द्वारा समय-समय पर लापता व्यक्तियों और विशेषकर महिलाओं तथा बच्चों की तलाश के लिए विशेष अभियान चलाए जाते हैं, जिन्हें ट्रैक किया जाता है. कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि बालिग होने वाली युवतियां या नासमझ किशोरियां परिजनों की डांट-डपट या अन्य पारिवारिक कारणों के चलते बिना बताए घर से चली जाती हैं, और जब उनके परिजन थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने पहुंचते हैं, तो कानून के तहत पुलिस को तुरंत कड़े कदम उठाने होते हैं. यदि मामला नाबालिग से जुड़ा हो, तो पुलिस को तकनीकी रूप से उसे अपहरण की श्रेणी में ही दर्ज करना पड़ता है, भले ही बाद में जांच के दौरान यह बात सामने आए कि मामला आपसी सहमति या पारिवारिक अनबन का था. कमिश्नर ने यह भी स्पष्ट किया कि रायपुर पुलिस इन सभी 132 मामलों में बेहद संवेदनशीलता के साथ काम कर रही है और अधिकांश मामलों में लड़कियों को सुरक्षित दस्तयाब कर लिया गया है या उनके सुराग मिल चुके हैं.
नागरिकों के बीच फैली अफवाहों पर विराम और पुलिस प्रशासन की अपील
एक ही दिन में 132 अपहरण के मामले दर्ज होने की खबर जैसे ही सार्वजनिक हुई, कई जगहों पर कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होने लगे और विपक्षी दलों ने भी इसे लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया. हालांकि, पुलिस कमिश्नर के स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हो गया है कि यह कोई आपराधिक विस्फोट नहीं, बल्कि पुलिस की प्रशासनिक प्रक्रिया और कानूनी नियमों का परिणाम है, जिसके तहत पेंडिंग मामलों को एक साथ पोर्टल पर दर्ज किया गया है. कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला ने राजधानी के नागरिकों से अपील करते हुए कहा कि वे किसी भी तरह की सनसनीखेज या भ्रामक अफवाहों पर बिल्कुल भी ध्यान न दें और सोशल मीडिया पर बिना पुष्टि के किसी भी प्रकार की नकारात्मक जानकारी साझा न करें. उन्होंने भरोसा दिलाया कि रायपुर पुलिस महिलाओं, बच्चों और आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है और शहर में कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं. इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पुलिस की कार्यप्रणाली और कानूनी प्रक्रियाओं को आम जनता तक सही रूप में पहुंचाना कितना जरूरी है, ताकि किसी भी प्रकार का अनावश्यक डर या panic समाज में न फैले.