Chandigarh Mayor Election 2026: भाजपा की बड़ी जीत; सौरभ जोशी बने नए मेयर, शो ऑफ हैंड्स से हुआ फैसला
News India Live, Digital Desk : चंडीगढ़ नगर निगम में आज हुए मेयर चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने शानदार जीत दर्ज की है। भाजपा के वरिष्ठ पार्षद सौरभ जोशी को चंडीगढ़ का नया मेयर चुना गया है। इस जीत के साथ भाजपा ने मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर तीनों प्रमुख पदों पर कब्जा जमाकर 'क्लीन स्वीप' किया है।
इस बार का चुनाव ऐतिहासिक रहा क्योंकि इसमें गुप्त मतदान (Ballot Paper) के बजाय 'शो ऑफ हैंड्स' (हाथ उठाकर) वोटिंग की गई, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रही।
चुनावी गणित: भाजपा का पलड़ा भारी
नगर निगम के 35 पार्षदों और एक सांसद (कुल 36 वोट) के सदन में मुकाबला त्रिकोणीय था। आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस के अलग-अलग चुनाव लड़ने का सीधा फायदा भाजपा को मिला।
मेयर चुनाव के नतीजे:
उम्मीदवार | पार्टी | मिले वोट
सौरभ जोशी (विजेता) | भाजपा (BJP) 18
योगेश ढींगरा | आम आदमी पार्टी (AAP) 11
गुरप्रीत सिंह गब्बी कांग्रेस (INC) 07 नोट: कांग्रेस के 6 पार्षदों के साथ चंडीगढ़ के सांसद मनीष तिवारी ने भी कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में हाथ उठाकर मतदान किया, जिससे कुल संख्या 7 हुई।
अन्य पदों पर भी भाजपा का कब्जा
मेयर के साथ-साथ अन्य दो महत्वपूर्ण पदों पर भी भाजपा के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की:
सीनियर डिप्टी मेयर: भाजपा के जसमानप्रीत सिंह बब्बर को इस पद के लिए चुना गया। उनके पक्ष में भाजपा के सभी 18 पार्षदों ने हाथ उठाकर समर्थन दिया।
डिप्टी मेयर: भाजपा की सुमन शर्मा को डिप्टी मेयर चुना गया। सुमन शर्मा को भी 18 वोट मिले।
भावुक पल: पिता की तस्वीर लेकर पहुंचे सौरभ जोशी
जीत के बाद सौरभ जोशी काफी भावुक नजर आए। मेयर की कुर्सी संभालने के दौरान उनके हाथों में अपने दिवंगत पिता की तस्वीर थी और आँखों में आंसू। उन्होंने अपनी इस जीत को पार्टी के कार्यकर्ताओं और चंडीगढ़ की जनता को समर्पित किया।
क्यों खास था यह चुनाव?
त्रिकोणीय मुकाबला: 1994 के बाद पहली बार भाजपा, आप और कांग्रेस तीनों ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा। गठबंधन न होने के कारण विपक्ष के वोट बंट गए।
वोटिंग का तरीका: सुप्रीम कोर्ट के पिछले साल के हस्तक्षेप और पारदर्शिता के मद्देनजर इस बार हाथ उठाकर (Show of Hands) मतदान कराया गया।
विपक्ष की विफलता: यदि AAP और कांग्रेस गठबंधन करते, तो उनके पास 18 वोट होते और मामला टॉस (सिक्का उछालने) तक पहुंच सकता था, लेकिन आपसी सहमति न बनने के कारण भाजपा की राह आसान हो गई।