UPI Payment Charges 2026: क्या 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर लगेगा मर्चेंट टैक्स? डिजिटल लेनदेन को लेकर सरकार कर रही बड़े नीतिगत बदलाव पर विचार

UPI Payment Charges 2026: क्या 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर लगेगा मर्चेंट टैक्स? डिजिटल लेनदेन को लेकर सरकार कर रही बड़े नीतिगत बदलाव पर विचार

भारत में डिजिटल क्रांति की रीढ़ बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर इस वक्त की एक बेहद बड़ी और महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। हालिया मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्र सरकार बड़े कॉरपोरेट और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई पेमेंट्स पर मर्चेंट फीस (Merchant Fee) यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के विकल्प पर बेहद गंभीरता से विचार कर रही है। यदि इस दूरगामी प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है, तो यह देश के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक नीतिगत (Policy) बदलाव साबित हो सकता है। आइए आपको विस्तार से बताते हैं कि यूपीआई फीस को लेकर किस तरह की तैयारी चल रही है और इसका आम जनता व व्यापारियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

2,000 रुपये से ज्यादा के ट्रांजैक्शन पर MDR लागू करने का प्रस्ताव

प्रमुख बिजनेस वेबसाइट 'मनीकंट्रोल' की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार बड़े मर्चेंट्स (व्यापारियों और कंपनियों) को किए जाने वाले यूपीआई पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की रूपरेखा तैयार कर रही है। प्रारंभिक प्रस्तावों के मुताबिक, यह फीस 0.5 प्रतिशत से कम रखी जा सकती है और यह केवल 2,000 रुपये से अधिक मूल्य के बड़े ट्रांजैक्शन पर ही प्रभावी होगी।

तकनीकी भाषा में समझें तो MDR वह फीस होती है जो बैंक और पेमेंट गेटवे प्रदाता कंपनियां किसी भी रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन को सुरक्षित रूप से प्रोसेस करने और उसे अंजाम देने के बदले मर्चेंट से वसूलते हैं। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया को बताया कि वर्तमान में शासन स्तर पर इस प्रस्ताव के नफ़े-नुकसान पर विचार किया जा रहा है और आगामी दो हफ्तों के भीतर इस पर कोई बड़ा अंतिम फैसला होने की पूरी उम्मीद है। यह फीस केवल बड़े मर्चेंट्स और बड़े कॉर्पोरेट बिजनेस पर ही लागू की जाएगी, छोटे दुकानदारों पर नहीं।

आम ग्राहकों पर नहीं पड़ेगा कोई बोझ, सिस्टम को टिकाऊ बनाने की कोशिश

इस खबर के सामने आने के बाद आम उपभोक्ताओं के मन में उठने वाली सबसे बड़ी शंका को दूर करते हुए सरकार के एक दूसरे शीर्ष अधिकारी ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की है। उन्होंने साफ किया कि इस नीतिगत प्रस्ताव में आम ग्राहकों से यूपीआई सर्विस इस्तेमाल करने के लिए कोई भी चार्ज या पैसे लेने की बात दूर-दूर तक शामिल नहीं है। अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि MDR लागू करने का मुख्य उद्देश्य यूपीआई ट्रांजैक्शन के लिए आम जनता की जेब पर बोझ डालना बिल्कुल नहीं है।

दरअसल, पूरी बातचीत मर्चेंट-साइड इकोनॉमिक्स और पूरे डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की सस्टेनेबिलिटी (दीर्घकालिक टिकाऊपन) को मजबूत करने के बारे में हो रही है। अधिकारियों का कहना है कि देश में यूपीआई का विस्तार अभूतपूर्व गति से हुआ है, लेकिन इस विशाल नेटवर्क के लिए जरूरी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सुरक्षा को चौबीसों घंटे बनाए रखने में बैंकों और पेमेंट ऑपरेटरों की लागत (कॉस्ट) भी लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में इस मॉडल को समय के साथ व्यावसायिक रूप से आत्मनिर्भर और टिकाऊ (Commercially Sustainable) बनाना बेहद जरूरी हो गया है।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार अभी भी 2,000 रुपये तक के कम मूल्य वाले यूपीआई ट्रांजैक्शन के लिए बैंकों और दूसरे पेमेंट सिस्टम ऑपरेटरों को अपने खजाने से इंसेंटिव (प्रोत्साहन राशि) देती है। डिजिटल पेमेंट्स को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने, वित्तीय लेन-देन को आधुनिक बनाने और वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ावा देने के लिए वित्त वर्ष 2022 में “RuPay डेबिट कार्ड और कम वैल्यू वाले BHIM-UPI ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देने के लिए इंसेंटिव स्कीम” शुरू की गई थी।

संसदीय समिति (Standing Committee) की रिपोर्ट ने दी थी बड़ी चेतावनी

यूपीआई के इस आर्थिक संकट और बुनियादी ढांचे पर फाइनेंस पर बनी स्टैंडिंग कमिटी (संसदीय स्थायी समिति) की 12 मार्च 2026 की एक हालिया रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि शुरुआत में डिजिटल ट्रांजैक्शन को सस्ता, सुलभ और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए 'ज़ीरो MDR' (शून्य मर्चेंट फीस) का नियम लागू किया गया था। हालांकि, समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि लंबे समय तक मर्चेंट फीस न होने के कारण पूरा यूपीआई इकोसिस्टम अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर या सस्टेनेबल नहीं रह गया है।

संसदीय समिति ने भारत की विशाल जनसांख्यिकी (Demographics), तीव्र आर्थिक विकास और व्यापक भौगोलिक पहुंच का हवाला देते हुए अनुमान लगाया है कि आने वाले सालों में यूपीआई का विस्तार मौजूदा स्तर से दस गुना तक बढ़ सकता है। अनुमान है कि यह प्लेटफॉर्म अगले पांच से सात सालों में अपने साथ 600 मिलियन (60 करोड़) नए यूजर्स को जोड़ेगा और हर महीने 100 से 150 बिलियन (10,000 से 15,000 करोड़) ट्रांजैक्शन प्रोसेस करेगा। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि वर्तमान में यूपीआई की धीमी होती विकास गति और स्ट्रक्चरल फंडिंग गैप (बजटीय कमी) के कारण इस विशाल लक्ष्य तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो रहा है, क्योंकि फंड की कमी की वजह से इंफ्रास्ट्रक्चर, एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स और नए मर्चेंट्स को जोड़ने (ऑनबोर्डिंग) में पेमेंट कंपनियों का निवेश काफी सीमित हो गया है। इसी कमी को पूरा करने के लिए सरकार अब बड़े मर्चेंट्स से मामूली फीस लेने का रास्ता तलाश रही है।

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