रिन्यूएबल एनर्जी में ₹6 लाख करोड़ का निवेश, फिर भी संतुष्ट नहीं मंत्री प्रह्लाद जोशी; 500 GW के लिए पेश किया मेगा ग्रीन प्लान
भारत के हरित ऊर्जा क्षेत्र ने पिछले दो वर्षों में अभूतपूर्व छलांग लगाई है। नई दिल्ली में आयोजित 'भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट एंड एक्सपो' (BRESE) के मंच से केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने यह आधिकारिक आंकड़ा साझा किया कि देश के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र ने बीते दो सालों में करीब 67 अरब डॉलर यानी लगभग 6 लाख करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष निवेश आकर्षित किया है। किसी एक विशिष्ट उद्योग में इतने कम समय में इतनी बड़ी पूंजी का आना भारतीय अर्थव्यवस्था और ग्लोबल इनवेस्टर्स के भरोसे को साफ दर्शाता है। देश की गैर-जीवाश्म बिजली उत्पादन क्षमता आज 310 गीगावाट (GW) के आंकड़े को पार कर चुकी है। इसके बावजूद केंद्रीय मंत्री इस ऐतिहासिक आंकड़े पर आत्ममुग्ध होने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखे। उन्होंने दो टूक शब्दों में वैश्विक और घरेलू उद्योगपतियों को आगाह किया कि यह उपलब्धि केवल शुरुआती मील का पत्थर है और भारत का अंतिम लक्ष्य इससे कहीं ज्यादा बड़ा और चुनौतीपूर्ण है। केंद्रीय मंत्री ने उद्योग जगत के दिग्गजों को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता स्थापित करने और 2070 तक 'नेट ज़ीरो' कार्बन उत्सर्जन का संकल्प ले चुका है। अगर देश को इस ऐतिहासिक लक्ष्य को समयबद्ध तरीके से हासिल करना है, तो वर्तमान ₹6 लाख करोड़ का निवेश पर्याप्त नहीं है। उन्होंने मंच से उद्योग को जगाते हुए कहा कि अगले पांच से छह वर्षों में भारत को स्वच्छ ऊर्जा के बुनियादी ढांचे, ट्रांसमिशन लाइनों और स्टोरेज सिस्टम में कम से कम 30 लाख करोड़ रुपये (लगभग 360 अरब डॉलर) से अधिक की अतिरिक्त पूंजी झोंकनी होगी। ऐसे में ₹6 लाख करोड़ के आंकड़े पर जश्न मनाने के बजाय काम की रफ्तार को चौगुना करने की सख्त जरूरत है।
रिकॉर्ड उत्पादन के बाद भी मंत्री प्रह्लाद जोशी क्यों नहीं हैं संतुष्ट?
ऊर्जा मंत्रालय की कमान संभाल रहे प्रह्लाद जोशी की इस असंतुष्टि के पीछे ठोस व्यावहारिक और तकनीकी वजहें हैं। भारत की आर्थिक विकास दर इस समय दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से आगे बढ़ रही है और देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) लगभग 7 प्रतिशत की रफ्तार से दौड़ रहा है। इस तेज रफ्तार औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और ग्रामीण विद्युतीकरण के चलते देश की बिजली की मांग में सालाना आधार पर अप्रत्याशित उछाल दर्ज किया जा रहा है। अगर भारत ने अपने बिजली उत्पादन नेटवर्क को पारंपरिक कोयले से हटाकर स्वच्छ ऊर्जा पर तुरंत शिफ्ट नहीं किया, तो ग्रिड पर दबाव असहनीय स्तर तक पहुंच सकता है। दूसरा सबसे बड़ा पहलू समय सीमा का है। वर्ष 2030 आने में अब केवल चार साल का वक्त बाकी है और देश को 310 GW से बढ़कर 500 GW तक पहुंचना है। यानी हर साल औसतन 40 से 50 गीगावाट नई क्षमता ग्रिड से जोड़नी होगी। इसके साथ ही मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि केवल सोलर पैनल या विंड टरबाइन लगा देना ही ऊर्जा सुरक्षा नहीं है। जब सूरज ढल जाता है और हवा धीमी पड़ती है, तब देश को चौबीसों घंटे (Round-The-Clock) बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (PSP) की सख्त दरकार है। वर्तमान में स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की गति उस रफ्तार से मेल नहीं खा रही है जिस रफ्तार से उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा रही है, और यही विसंगति नीति निर्माताओं के लिए गंभीर चिंता का सबब बनी हुई है।
भारत का 'मेगा ग्रीन रोडमैप': सोलर, विंड और हाइड्रोजन पर चौतरफा वार
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने इस चुनौती से पार पाने के लिए एक त्रिआयामी 'मेगा ग्रीन प्लान' का खाका तैयार किया है, जिसके तहत वित्तीय, तकनीकी और नीतिगत बाधाओं को एक साथ खत्म करने की रणनीति बनाई गई है। इस रोडमैप का पहला बड़ा आधार घरेलू विनिर्माण को सशक्त बनाना है ताकि भारत चीनी उपकरणों और विदेशी सप्लाई चेन पर अपनी निर्भरता पूरी तरह समाप्त कर सके। मंत्री ने जानकारी दी कि देश की सोलर मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता 2 GW से छलांग लगाकर 225 GW तक पहुंच चुकी है, जबकि सोलर सेल क्षमता 45 GW को छू रही है। अब सरकार का फोकस सिलिकॉन इंगॉट्स, वेफर्स और सेल लेवल पर शत-प्रतिशत आत्मनिर्भरता हासिल करना है, जिसके लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (PLI) के नियमों को और अधिक कड़ा तथा परिणामोन्मुख बनाया जा रहा है। रोडमैप का दूसरा मजबूत स्तंभ 'राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन' है। भारत ने दुनिया के सबसे बड़े ग्रीन हाइड्रोजन ऑफटेक समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत 5.5 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष उत्पादन की प्रतिबद्धता हासिल की जा चुकी है। अकेले इस सेगमेंट में करीब ₹90,000 करोड़ का पूंजीगत निवेश पाइपलाइन में है और इसका 70 प्रतिशत हिस्सा वैश्विक बाजारों में निर्यात के लिए निर्धारित किया गया है। भारत में ग्रीन अमोनिया की खोज दर ₹45.70 से ₹49.75 प्रति किलोग्राम तक नीचे आ चुकी है, जो वैश्विक बेंचमार्क के मुकाबले बेहद प्रतिस्पर्धी है। यह उपलब्धि भारत को केवल ऊर्जा उपभोक्ता ही नहीं बल्कि स्वच्छ ईंधन का वैश्विक निर्यातक बनाने की क्षमता रखती है।
रूफटॉप क्रांति और ग्रिड ट्रांसमिशन का विस्तार: अंतिम छोर तक बदलाव
इस मेगा प्लान का तीसरा और सबसे संवेदनशील घटक आम उपभोक्ता को सीधे स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ना है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' इस बदलाव का चेहरा बनकर उभरी है, जिसके तहत 65 लाख से अधिक घरों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित किए जा चुके हैं और हर छह दिन में एक लाख नए परिवार इस योजना से जुड़ रहे हैं। ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था को डीजल मुक्त बनाने के लिए 'पीएम-कुसुम' (PM-KUSUM) योजना के तहत लाखों सोलर सिंचाई पंप लगाए जा रहे हैं, जिससे किसानों की उत्पादन लागत घट रही है और अतिरिक्त सौर बिजली बेचकर वे आमदनी के नए रास्ते बना रहे हैं। हालांकि इस उत्पादन को संभालना बिना अत्याधुनिक ट्रांसमिशन नेटवर्क के संभव नहीं है। केंद्रीय मंत्री ने स्वीकार किया कि ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (GEC) का समय पर निर्माण न होना और अंतर-राज्यीय पारेषण शुल्क (ISTS) से जुड़े विवाद परियोजनाओं की रफ्तार को धीमा करते हैं। इसलिए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रिड को उच्च क्षमता वाली 800 केवी एचवीडीसी (HVDC) लाइनों से लैस करने और राजस्थान, गुजरात, लद्दाख और आंध्र प्रदेश के दूरदराज सोलर व विंड पार्कों को सीधे औद्योगिक राज्यों से जोड़ने के लिए समयबद्ध वित्तीय स्वीकृतियां जारी की हैं। सरकार की स्पष्ट नीति है कि किसी भी सूरत में जमीन अधिग्रहण या ट्रांसमिशन की कमी के चलते रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स अटकने नहीं दिए जाएंगे।
वैश्विक निवेशकों के लिए खुला निमंत्रण और भविष्य की राह
प्रह्लाद जोशी ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, घरेलू बैंकों और बहुराष्ट्रीय निवेशकों से आह्वान किया कि वे भारत की ऊर्जा क्रांति में अपनी भागीदारी को केवल कागजी समझौतों तक सीमित न रखें बल्कि तत्काल पूंजी निवेश करें। पिछले दशक में सौर ऊर्जा की दरें ₹5.50 प्रति यूनिट से गिरकर ₹2.15 प्रति यूनिट पर आ चुकी हैं, और बैटरी स्टोरेज के साथ भी यह दर ₹2.70 प्रति यूनिट के आकर्षक स्तर पर आ गई है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में लगाया गया पैसा न केवल पर्यावरण की रक्षा करेगा, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ वित्तीय रिटर्न भी सुनिश्चित करेगा। भारत का ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन अब मात्र एक सरकारी लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह देश की संप्रभुता, औद्योगिक सुरक्षा और विदेशी मुद्रा भंडार के संरक्षण से जुड़ा राष्ट्रीय मिशन बन चुका है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री का कड़ा रुख यह स्पष्ट संदेश देता है कि ₹6 लाख करोड़ का मुकाम मील का सिर्फ पहला पत्थर है; भारत की वास्तविक ग्रीन परीक्षा 2030 तक 500 गीगावाट के शिखर को छूने और ₹30 लाख करोड़ के विशाल पूंजी प्रवाह को जमीन पर उतारने के साथ पूरी होगी।