PPF खाते में 5 साल तक पैसा जमा नहीं किया तो क्या होगा? जानिए खाता बंद होने और ब्याज के नए नियम
नौकरीपेशा और सुरक्षित भविष्य के लिए बचत करने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के बीच पब्लिक प्रॉविडेंट फंड यानी पीपीएफ हमेशा से सबसे पसंदीदा और भरोसेमंद निवेश विकल्प रहा है। सरकार की गारंटी, आयकर छूट और चक्रवृद्धि ब्याज का दोहरा लाभ मिलने के कारण लोग अपने बच्चों की उच्च शिक्षा, शादी या रिटायरमेंट की प्लानिंग के लिए डाकघरों और राष्ट्रीयकृत बैंकों में यह खाता खुलवाते हैं। मगर कई बार जिंदगी में ऐसे अप्रत्याशित वित्तीय उतार-चढ़ाव आते हैं—जैसे नौकरी छूटना, कारोबार में घाटा होना या अचानक परिवार में कोई बड़ा मेडिकल खर्च आ जाना—जिसके चलते निवेशक अपने पीपीएफ खाते में नियमित रूप से पैसे जमा नहीं कर पाते। ऐसे में बहुत से खाताधारकों के मन में यह भारी भ्रम और डर बैठ जाता है कि अगर उन्होंने लगातार चार या पांच वर्षों तक खाते में एक रुपया भी नहीं डाला, तो क्या सरकार उनके खाते को पूरी तरह जब्त या बंद कर देगी? क्या खाते में पहले से जमा गाढ़ी कमाई डूब जाएगी या फिर उस पर मिलने वाला ब्याज हमेशा के लिए रुक जाएगा? यदि आप भी इसी तरह की दुविधा में फंसे हैं और सालों से अपने निष्क्रिय पड़े पीपीएफ खाते को लेकर परेशान हैं, तो केंद्र सरकार और डाक विभाग के नवीनतम नियम आपको बड़ी राहत देने वाले हैं।
लगातार 5 साल पैसा जमा न करने पर क्या पीपीएफ खाता बंद हो जाता है
सबसे पहले इस बुनियादी आशंका को दूर करना बेहद जरूरी है कि पैसा जमा न करने पर खाता हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। डाकघर लघु बचत योजना नियमावली के नियमों के अनुसार, यदि कोई खाताधारक किसी वित्तीय वर्ष में अनिवार्य न्यूनतम राशि जमा नहीं करता है, तो खाता पूरी तरह निरस्त या सील नहीं होता, बल्कि उसे बैंकिंग भाषा में 'डिफ़ॉल्ट' या 'डिस्कंटीन्यूड' घोषित कर दिया जाता है। पीपीएफ योजना के तहत प्रत्येक वित्तीय वर्ष यानी 1 अप्रैल से 31 मार्च के बीच कम से कम 500 रुपये जमा करना अनिवार्य होता है और अधिकतम सीमा डेढ़ लाख रुपये तय की गई है। जब कोई निवेशक लगातार पांच वर्षों तक यह न्यूनतम 500 रुपये की किस्त भी जमा नहीं करता, तो बैंक या पोस्ट ऑफिस का कोर बैंकिंग सिस्टम उस खाते को इनएक्टिव श्रेणी में डाल देता है। इसका सीधा मतलब यह है कि खाता फ्रीज तो हो जाता है लेकिन उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता। आपकी पूर्व में जमा की गई मूल पूंजी पूरी तरह सुरक्षित रहती है और सरकार अथवा बैंक द्वारा आपकी जमा पूंजी में से एक पैसा भी काटा नहीं जाता है।
क्या निष्क्रिय खाते में पड़ी रकम पर ब्याज मिलता रहेगा या रुक जाएगा
इस विषय पर सबसे बड़ा भ्रम ब्याज को लेकर रहता है क्योंकि पुरानी व्यवस्थाओं में कुछ पाबंदियां थीं, लेकिन संशोधित नियमों ने तस्वीर पूरी तरह साफ कर दी है। वित्त मंत्रालय द्वारा अधिसूचित पब्लिक प्रॉविडेंट फंड स्कीम के तहत यदि आपका खाता डिफ़ॉल्ट या डिस्कंटीन्यूड भी हो चुका है, तब भी खाते में मौजूद कुल जमा राशि पर लागू दर से हर साल ब्याज जुड़ता रहेगा। वर्तमान में पीपीएफ पर 7.1 प्रतिशत की दर से वार्षिक चक्रवृद्धि ब्याज दिया जा रहा है और यह ब्याज आपके खाते में हर वित्तीय वर्ष के अंत यानी 31 मार्च को स्वतः क्रेडिट होता रहेगा। यह ब्याज खाताधारक को तब तक बिना किसी बाधा के मिलता रहेगा जब तक कि खाते की मूल 15 साल की मैच्योरिटी अवधि पूरी नहीं हो जाती। इसलिए इस गलतफहमी में बिल्कुल न रहें कि पैसा जमा न करने से आपका ब्याज रुक जाएगा; आपकी जमा पूंजी पर सरकार द्वारा तय की गई दर से पाई-पाई का ब्याज नियमानुसार जुड़ता रहता है।
डिफ़ॉल्ट खाते पर कौन-कौन सी सरकारी सुविधाएं तुरंत रुक जाती हैं
भले ही आपके निष्क्रिय खाते में ब्याज जुड़ता रहता हो, लेकिन एक एक्टिव खाते के मुकाबले डिफ़ॉल्ट खाते पर कई कानूनी और वित्तीय पाबंदियां लग जाती हैं। सबसे पहली पाबंदी यह होती है कि आप उस खाते में जब तक पिछला हिसाब चुकता नहीं करते, तब तक कोई नया स्वैच्छिक डिपॉजिट या अतिरिक्त निवेश नहीं कर सकते। दूसरा बड़ा झटका यह लगता है कि पीपीएफ पर मिलने वाली बेहद सस्ती लोन सुविधा बंद हो जाती है; सामान्य तौर पर तीसरे से छठे वित्तीय वर्ष के दौरान जमा राशि पर लोन लेने की छूट होती है, मगर बंद पड़े खाते पर यह सुविधा पूरी तरह ब्लॉक कर दी जाती है। तीसरा नुकसान यह है कि सातवें वित्तीय वर्ष के बाद मिलने वाली आंशिक निकासी यानी पार्शियल विड्रॉल की सुविधा भी छिन जाती है, जिसका इस्तेमाल लोग घर बनाने या बच्चों की पढ़ाई के लिए करते हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय कानून के तहत एक व्यक्ति पूरे देश में अपने नाम पर केवल एक ही पीपीएफ खाता चला सकता है; ऐसे में जब तक आपका पुराना डिफ़ॉल्ट खाता एक्टिव या मैच्योर नहीं होता, तब तक आप किसी अन्य बैंक या पोस्ट ऑफिस में दूसरा नया खाता नहीं खोल सकते।
लखनऊ से लेकर देश के हर कोने तक निष्क्रिय खाते को दोबारा चालू कराने का आसान तरीका
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जीपीओ, हजरतगंज, अलीगंज या चौक स्थित मुख्य डाकघरों से लेकर देश के किसी भी शहर या ग्रामीण अंचल की बैंक शाखाओं में निष्क्रिय पीपीएफ खाते को पुनर्जीवित कराने की प्रक्रिया बेहद सरल और पारदर्शी है। खाते को एक्टिव कराने के लिए आपको केवल अपने उस गृह बैंक या पोस्ट ऑफिस की शाखा में जाना होगा जहाँ खाता मूल रूप से खोला गया था। वहां जाकर काउंटर से खाता पुनर्जीवन यानी रिवाइवल फॉर्म लें या एक सादे कागज पर शाखा प्रबंधक के नाम प्रार्थना पत्र लिखें। नियम के मुताबिक, आपको जितने साल आपने पैसा जमा नहीं किया है, उन सभी वर्षों का न्यूनतम 500 रुपये प्रति वर्ष के हिसाब से बकाया और साथ में 50 रुपये प्रति वर्ष की दर से पेनाल्टी यानी जुर्माना भरना होगा। उदाहरण के तौर पर, यदि आपका खाता लगातार 5 साल से बंद है, तो 5 वर्षों का न्यूनतम बकाया 2,500 रुपये हुआ और 50 रुपये सालाना के हिसाब से 250 रुपये का जुर्माना लगा। इसके साथ ही आपको चालू वित्तीय वर्ष का न्यूनतम 500 रुपये का अंशदान जोड़ना होगा, यानी कुल मिलाकर मात्र 3,250 रुपये की एकमुश्त पर्ची भरकर जमा करते ही आपका बंद पड़ा खाता चौबीस से अड़तालीस घंटे के भीतर फिर से पूरी तरह सक्रिय हो जाता है।
15 साल की मैच्योरिटी पूरी होने पर क्या बिना रिवाइव किए मिल जाएगा पूरा पैसा
कई खाताधारक ऐसे भी होते हैं जो पेनाल्टी भरकर खाते को दोबारा चालू नहीं कराना चाहते और बस यह जानना चाहते हैं कि 15 साल बाद उनके पैसे का क्या होगा। डाकघर के स्पष्ट नियमों के तहत यदि आप 15 साल की पूरी अवधि बीतने तक अपने डिफ़ॉल्ट खाते को रिवाइव नहीं भी कराते हैं, तब भी मैच्योरिटी की तारीख आते ही आप अपना पूरा मूलधन और उस पर इतने सालों में जुड़ा हुआ पूरा ब्याज एकमुश्त निकाल सकते हैं। इसके लिए बैंक या पोस्ट ऑफिस आपसे कोई अतिरिक्त हर्जाना नहीं काटता। हालांकि, इसमें एक बड़ा पेंच यह है कि यदि आपका खाता डिफ़ॉल्ट है, तो आप 15 साल पूरे होने के बाद उसे अगले 5-5 साल के ब्लॉक में आगे यानी एक्सटेंड नहीं करा सकते। पीपीएफ की मैच्योरिटी को आगे बढ़ाने का अधिकार सिर्फ उन्हीं खाताधारकों को मिलता है जिनका खाता मैच्योरिटी के समय पूरी तरह एक्टिव और नियमित होता है, इसलिए भविष्य में लंबे समय तक टैक्स-फ्री ब्याज का आनंद लेने के लिए समय रहते खाते को पेनाल्टी भरकर एक्टिव करा लेना ही सबसे समझदारी भरा वित्तीय कदम माना जाता है।