UPI पर MDR को टैक्स कहना गलत, अनुपम मित्तल ने सुझाया '5 NPCI' का फॉर्मूला; डिजिटल पेमेंट्स पर छिड़ी नई बहस
नई दिल्ली। भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए रोजाना करोड़ों वित्तीय लेनदेन हो रहे हैं, लेकिन इसके वित्तीय मॉडल और जीरो-एमडीआर (Zero MDR) नीति को लेकर देश के शीर्ष उद्यमियों और नीति-निर्माताओं के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। इसी कड़ी में शादी डॉट कॉम (Shaadi.com) और पीपुल ग्रुप के संस्थापक व प्रमुख एंजेल निवेशक अनुपम मित्तल (Anupam Mittal) ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को टैक्स बताना पूरी तरह गलत और भ्रामक है। मित्तल के अनुसार, विश्वस्तरीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को लंबे समय तक सुरक्षित, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाए रखने के लिए बुनियादी लागत निकालना आवश्यक है। इसके साथ ही उन्होंने पेमेंट्स मार्केट में सिंगल-प्वाइंट जोखिम खत्म करने के लिए देश में कम से कम '5 NPCI' जैसी संस्थाएं खड़ी करने का अनूठा फॉर्मूला पेश किया है।
वर्तमान में भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के तहत आम व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) और व्यक्ति-से-व्यापारी (P2M) यूपीआई भुगतानों पर शून्य एमडीआर नीति लागू है। इसका अर्थ यह है कि छोटे दुकानदारों या बड़े मर्चेंट्स से यूपीआई के माध्यम से पैसे स्वीकार करने पर कोई प्रोसेसिंग फीस नहीं ली जाती। फिनटेक कंपनियों और बैंकों का तर्क रहा है कि सर्वर मेंटेनेंस, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड प्रिवेंशन और नवाचार के लिए अरबों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन रेवेन्यू मॉडल न होने के कारण यह इकोसिस्टम लगातार घाटे में चल रहा है। जब भी इस पर मामूली शुल्क लगाने की चर्चा होती है, तो उसे 'डिजिटल टैक्स' कहकर विरोध शुरू हो जाता है। अनुपम मित्तल ने इसी नैरेटिव को सिरे से खारिज किया है।
MDR कोई टैक्स नहीं बल्कि सेवा की लागत है: अनुपम मित्तल का स्पष्ट तर्क
अनुपम मित्तल ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर अपनी राय रखते हुए स्पष्ट किया कि टैक्स सरकार द्वारा सार्वजनिक कल्याण के लिए वसूला जाने वाला अनिवार्य शुल्क होता है, जबकि एमडीआर एक उच्च-स्तरीय तकनीकी सेवा के बदले लिया जाने वाला सर्विस चार्ज है। जब कोई व्यापारी कार्ड स्वाइप मशीन (POS) लगाता है, तो वह क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड पर 1% से 2% तक का शुल्क खुशी-खुशी देता है क्योंकि उसे नकदी संभालने, चोरी होने या बैंक में जमा करने की झंझट से मुक्ति मिलती है।
मित्तल का कहना है कि जब व्यापारी को रियल-टाइम में सेकंडों के भीतर सीधे बैंक खाते में भुगतान मिल रहा है, तो उस तकनीकी पाइपलाइन को चलाने वाले बैंकों, पेमेंट एग्रीगेटर्स और फिनटेक ऐप्स को न्यूनतम शुल्क मिलना उनका जायज व्यावसायिक अधिकार है। इसे सरकारी टैक्स का नाम देकर आम जनता और व्यापारियों को डराना आर्थिक रूप से अनुचित है। बिना किसी स्थायी राजस्व मॉडल के कोई भी प्राइवेट या पब्लिक नेटवर्क लंबे समय तक आधुनिक तकनीकी क्षमताओं और साइबर हमलों का मुकाबला नहीं कर सकता।
सिंगल प्लेयर रिस्क खत्म करने के लिए चाहिए '5 NPCI' का नेटवर्क
मौजूदा समय में भारत के पूरे रिटेल पेमेंट इकोसिस्टम का संचालन नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के कंधों पर है। यूपीआई, आईएमपीएस, रुपे (RuPay), आधार इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम (AePS) और फास्टैग जैसी सभी महत्वपूर्ण प्रणालियों का प्रबंधन अकेले एनपीसीआई करता है। अनुपम मित्तल ने इस व्यवस्था में छुपे प्रणालीगत जोखिम (Systemic Risk) की ओर इशारा करते हुए एक क्रांतिकारी सुझाव दिया है।
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एकाधिकार और सुरक्षा जोखिम: मित्तल के अनुसार, जब 140 करोड़ लोगों का पूरा डिजिटल लेनदेन एक ही केंद्रीय तंत्र से होकर गुजरता है, तो सर्वर डाउनटाइम, तकनीकी गड़बड़ी या बड़े साइबर हमले की स्थिति में पूरी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था कुछ घंटों के लिए थम सकती है।
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प्रतिस्पर्धा से नवाचार: उन्होंने सुझाव दिया कि देश में एनपीसीआई जैसी कम से कम 4 से 5 स्वतंत्र लेकिन इंटर-ऑपरेबल संस्थाएं (New Umbrella Entities - NUEs) होनी चाहिए। जब कई संस्थाएं बाजार में प्रतिस्पर्धा करेंगी, तो लेन-देन की लागत घटेगी, तकनीकी नवाचार में तेजी आएगी और बैकअप इंफ्रास्ट्रक्चर स्वतः तैयार हो जाएगा।
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फिनटेक कंपनियों को राहत: बहु-संस्थागत ढांचे से स्टार्टअप्स और फिनटेक कंपनियों को नए फीचर्स विकसित करने की आजादी मिलेगी और वे केवल एक नियामक एजेंसी की नीतियों पर निर्भर नहीं रहेंगे।
न्यू अम्ब्रेला एंटिटी (NUE) लाइसेंसिंग पर फिर से विचार की मांग
अनुपम मित्तल का यह बयान ऐसे समय आया है जब रिजर्व बैंक द्वारा कुछ साल पहले प्रस्तावित न्यू अम्ब्रेला एंटिटी (NUE) का विचार ठंडे बस्ते में चला गया था। उस समय टाटा ग्रुप, रिलायंस, पेटीएम और एसबीआई जैसे बड़े दिग्गजों ने एनपीसीआई के समानांतर डिजिटल पेमेंट नेटवर्क बनाने के लिए कंसोर्टियम बनाकर आवेदन किया था, लेकिन बाद में नियामक स्तर पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।
मित्तल का मानना है कि अब समय आ गया है जब सरकार और आरबीआई को इस नीति की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अब खरबों डॉलर के स्तर को छूने जा रही है। ऐसे में सिंगल पॉइंट ऑफ फेल्योर (SPOF) से बचने के लिए मल्टी-ऑपरेटर मॉडल देश की आर्थिक संप्रभुता और सुरक्षा दोनों के लिए अनिवार्य कदम बन चुका है।
छोटे व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि यूपीआई पर एमडीआर या कोई न्यूनतम शुल्क लागू होता है, तो क्या आम नागरिकों की जेब पर बोझ पड़ेगा? उद्योग जगत के विशेषज्ञों और स्वयं अनुपम मित्तल के तर्कों के अनुसार, इसका ढांचा बेहद संतुलित होना चाहिए:
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P2P ट्रांसफर हमेशा फ्री: एक आम नागरिक द्वारा अपने परिजन या दोस्त को किए जाने वाले सामान्य बैंक ट्रांसफर पर कभी कोई शुल्क नहीं लगना चाहिए।
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छोटे रेहड़ी-पटरी वालों को पूर्ण छूट: 2,000 या 5,000 रुपये तक के छोटे क्यूआर कोड लेनदेन को शून्य-एमडीआर के दायरे में ही रखा जाना चाहिए ताकि डिजिटल इंडिया की जमीनी पहुंच प्रभावित न हो।
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बड़े मर्चेंट्स और कॉर्पोरेट्स पर नाममात्र शुल्क: बड़े सुपरमार्केट्स, ई-कॉमर्स कंपनियों, एयरलाइंस और पेट्रोल पंपों जैसे बड़े वॉल्यूम वाले व्यापारियों से 0.1% से 0.3% का मामूली टियर-बेस्ड शुल्क लिया जा सकता है, जो क्रेडिट कार्ड की तुलना में बेहद सस्ता होगा और नेटवर्क को आर्थिक रूप से मजबूत बनाएगा।
अनुपम मित्तल के इस '5 NPCI' और 'एमडीआर बनाम टैक्स' के बयान ने भारतीय फिनटेक जगत में एक नई और स्वस्थ आर्थिक बहस को जन्म दे दिया है, जो आने वाले दिनों में डिजिटल पेमेंट्स की दीर्घकालिक नीतियों को नई दिशा दे सकती है।