498 किमी/घंटे की तूफानी रफ्तार: हैदराबाद के स्टार्टअप ने बनाया भारत का सबसे घातक किलर ड्रोन, आसमान में दुश्मन का काल बनेगा 'आहुति Mk-II'; जानें खूबियां
भारत के रक्षा विनिर्माण और ड्रोन उद्योग के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को सबसे बड़ी सफलता दिलाते हुए हैदराबाद स्थित एक उभरते हुए डिफेंस-टेक स्टार्टअप ने देश का सबसे तेज गति से हमला करने वाला घातक किलर ड्रोन 'आहुति Mk-II' (Aahuti Mk-II) विकसित कर लिया है। आधुनिक युद्धक्षेत्र में जब रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के तनावों ने ड्रोन वॉरफेयर की महत्ता पूरी दुनिया को समझाई है, उस दौर में भारतीय इंजीनियरों द्वारा तैयार यह स्वदेशी 'कामिकेजे' (Kamikaze/Loitering Munition) ड्रोन देश की सीमाओं पर तैनात सेना के लिए गेमचेंजर साबित होने जा रहा है।
498 किमी/घंटा की सुपरसोनिक जैसी रफ्तार: एयर डिफेंस सिस्टम को देगा चकमा
'आहुति Mk-II' की सबसे बड़ी और विस्मयकारी ताकत इसकी बेजोड़ गति है। परीक्षणों के दौरान इस ड्रोन ने लगभग 498 किलोमीटर प्रति घंटा की अधिकतम गति दर्ज की है, जो पारंपरिक लोइटरिंग म्यूनिशंस और प्रोपेलर चालित सुसाइड ड्रोन्स की तुलना में तीन गुना से भी अधिक है। सामान्य तौर पर दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले ईरान निर्मित 'शाहेद-136' या रूस के 'लैंसेट' ड्रोन्स की रफ्तार 180 से 250 किमी/घंटा के बीच सीमित रहती है, जिससे आधुनिक रडार और एंटी-एयरक्राफ्ट गन उन्हें हवा में ट्रैक करके मार गिराने का समय पा लेते हैं। लेकिन लगभग 500 किमी/घंटा की रफ्तार से गोता लगाने वाला 'आहुति Mk-II' दुश्मन के किसी भी पारंपरिक एयर डिफेंस रडार को प्रतिक्रिया (Reaction Time) देने का मौका दिए बिना सीधे लक्ष्य पर काल बनकर टूट पड़ता है।
टर्बोजेट इंजन और स्टील्थ डिजाइन: रडार पर पकड़ पाना नामुमकिन
इस किलर ड्रोन की असाधारण गति के पीछे इसमें लगाया गया स्वदेशी माइक्रो-टर्बोजेट प्रोपल्शन सिस्टम (Micro-Turbojet Engine) है। इसके एयरफ्रेम को उच्च-क्षमता वाले कार्बन-कंपोजिट और रडार-एब्जॉर्बिंग मैटेरियल (RAM) से तैयार किया गया है, जिसके चलते इसका रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) एक छोटी चिड़िया के बराबर रह जाता है। इसका अर्थ यह है कि दुश्मन के अत्याधुनिक अर्ली-वार्निंग रडार भी इसे अंतिम क्षणों तक स्क्रीन पर पकड़ नहीं पाएंगे। इसके अलावा, इसकी थर्मो-शील्डेड नोजल तकनीक इसके इन्फ्रारेड सिग्नेचर (Heat Signature) को बेहद कम कर देती है, जिससे दुश्मन की कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मैनपैड्स (MANPADS) मिसाइलें भी इस पर आसानी से लॉक नहीं हो सकतीं।
50 किलोग्राम का विनाशकारी वॉरहेड: बंकर और टैंक पलक झपकते होंगे राख
'आहुति Mk-II' केवल तेज ही नहीं, बल्कि विनाशक क्षमता के मामले में भी किसी क्रूज मिसाइल से कम नहीं है। यह ड्रोन अपने साथ लगभग 50 किलोग्राम तक का हाई-एक्सप्लोसिव प्री-फ्रैग्मेंटेड (HE-FRAG) अथवा आर्मर-पियर्सिंग वॉरहेड ले जाने में सक्षम है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यह पहाड़ी क्षेत्रों में बने दुश्मन के गहरे कंक्रीट बंकरों, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स, रडार स्टेशनों, मिसाइल बैटरियों और भारी बख्तरबंद मुख्य युद्धक टैंकों (Main Battle Tanks) के कवच को पलक झपकते ही चकनाचूर करने की क्षमता रखता है।
एआई पावर्ड ऑटोनॉमस हंटिंग: जीपीएस जाम होने पर भी नहीं चूकेगा निशाना
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में जीपीएस सिग्नल को जाम (GPS Jamming & Spoofing) करना एक आम बात बन चुकी है। 'आहुति Mk-II' को इस तरह से प्रोग्राम किया गया है कि यह पूर्णतः 'जीपीएस-डिनाइड एनवायरनमेंट' (GPS-denied environment) में भी काम कर सकता है। इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) के साथ एक एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विजुअल नेविगेशन सिस्टम (AI Visual Tracking) जोड़ा गया है।
ड्रोन के कैमरे और ऑनबोर्ड न्यूरल चिपसेट रियल-टाइम में जमीन पर मौजूद लक्ष्यों—जैसे तोपखाने, टैंक और रडार वाहनों की पहचान खुद कर सकते हैं। यदि बीच रास्ते में इसका बेस स्टेशन से रिमोट कंट्रोल संपर्क पूरी तरह काट भी दिया जाए, तो भी इसका एआई एल्गोरिदम पहले से तय टारगेट की पहचान करके सटीक सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे सकता है।
स्वाम टेक्नोलॉजी से लैस: झुंड में हमला कर मचाएगा तबाही
इस ड्रोन की एक और सबसे घातक विशेषता इसका 'स्वाम मोड' (Swarm Capability) है। इसके सॉफ्टवेयर को इस तरह तैयार किया गया है कि 20 से 40 'आहुति Mk-II' ड्रोन्स को एक साथ एक क्लस्टर में लॉन्च किया जा सकता है। हवा में उड़ान भरते समय ये ड्रोन्स आपस में रेडियो-फ्रीक्वेंसी के जरिए संवाद करते हैं।
यदि किसी एक ड्रोन को नष्ट कर दिया जाता है, तो दूसरा ड्रोन तुरंत मिशन लीडर का रोल संभाल लेता है और लक्ष्यों का बंटवारा खुद-ब-खुद कर लेता है। एक ही समय में 498 किमी/घंटा की गति से चारों तरफ से होने वाले ऐसे समन्वित स्वाम हमले को दुनिया का कोई भी सक्रिय एयर डिफेंस सिस्टम (चाहे वह आयरन डोम हो या एस-400) पूरी तरह रोक पाने में असमर्थ साबित होगा।
एलएसी और एलओसी पर गेमचेंजर: ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी मारक क्षमता
भारत के उत्तरी और पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों (लद्दाख, सिक्किम और कश्मीर) की अत्यधिक ऊंचाई और सब-जीरो तापमान वाले दुर्गम इलाकों में ड्रोन उड़ाना एक तकनीकी चुनौती रहा है। हैदराबाद के स्टार्टअप ने 'आहुति Mk-II' के इंजन और विंग्स को उच्च-तुंगता (High-Altitude Operability) के अनुकूल तैयार किया है, जिससे यह 15,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई से भी पूरी रफ्तार से लॉन्च होकर हमला कर सकता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और नियंत्रण रेखा (LoC) पर तनाव की स्थिति में यह ड्रोन अग्रिम चौकियों को बिना किसी पायलट के जोखिम में डाले दूर से ही दुश्मन के तोपखाने और लॉन्च पैड्स को नेस्तनाबूद करने का अचूक विकल्प प्रदान करता है।
रक्षा क्षेत्र में भारतीय स्टार्टअप्स का दबदबा: सेना में जल्द शामिल होने की उम्मीद
यह उपलब्धि इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारतीय रक्षा तकनीक अब सिर्फ पारंपरिक सार्वजनिक उपक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश का प्राइवेट डिफेंस इकोसिस्टम और युवा स्टार्टअप्स अत्याधुनिक 'डीप-टेक' में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के 'iDEX' (Innovations for Defence Excellence) फ्रेमवर्क के तहत स्टार्टअप्स को मिल रहे प्रोत्साहन से ऐसे घातक हथियार बहुत कम लागत में और रिकॉर्ड समय में तैयार हो रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सेना द्वारा विभिन्न मौसमों में किए जा रहे कठोर फील्ड ट्रायल्स पूरे होते ही 'आहुति Mk-II' को सशस्त्र बलों की तीनों शाखाओं में बड़े पैमाने पर शामिल किया जा सकता है, जो भारत की हवाई संप्रभुता को अजेय मजबूती देगा।