सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवालों के बाद हॉस्पिटल शेयरों में मचा हड़कंप

सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवालों के बाद हॉस्पिटल शेयरों में मचा हड़कंप

भारतीय शेयर बाजार में हेल्थकेयर और निजी अस्पताल क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में उस समय तेज बिकवाली देखने को मिली जब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों में दवाओं, मेडिकल उपकरणों और विशेष रूप से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की दवाओं पर वसूले जाने वाले भारी-भरकम मुनाफे (Mark-ups) पर केंद्र सरकार और अस्पतालों को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने इलाज के नाम पर मरीजों और उनके तीमारदारों से लागत मूल्य से दस गुना तक अधिक कीमत वसूलने को अत्यंत गंभीर और चिंताजनक करार दिया। जैसे ही सुप्रीम कोर्ट की यह तीखी मौखिक टिप्पणी और सुनवाई का ब्योरा वित्तीय बाजारों तक पहुंचा, दलाल स्ट्रीट पर हेल्थकेयर और हॉस्पिटल सेक्टर के शेयरों में अफरा-तफरी मच गई। बीएसई हॉस्पिटल्स इंडेक्स और निफ्टी हेल्थकेयर इंडेक्स में भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों के एक ही कारोबारी सत्र में हजारों करोड़ रुपये स्वाहा हो गए।

किस हॉस्पिटल स्टॉक को लगा सबसे तगड़ा झटका: गिरावट की पूरी फेहरिस्त

सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख का सबसे बुरा असर देश की प्रमुख हॉस्पिटल चेन्स के शेयरों पर पड़ा, जहां सबसे बड़ी गिरावट फोर्टिस हेल्थकेयर (Fortis Healthcare) के शेयरों में दर्ज की गई। फोर्टिस हेल्थकेयर का शेयर इंट्रा-डे कारोबार के दौरान 6.3 प्रतिशत से अधिक टूटकर दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया। दूसरे नंबर पर देश की सबसे बड़ी निजी अस्पताल नेटवर्क अपोलो हॉस्पिटल्स एंटरप्राइज (Apollo Hospitals Enterprise Ltd.) का स्टॉक रहा, जिसमें 5.7 प्रतिशत की जोरदार गिरावट आई। तीसरे स्थान पर मैक्स हेल्थकेयर इंस्टीट्यूट (Max Healthcare Institute Ltd.) रहा, जिसके शेयर 5.3 प्रतिशत से अधिक फिसल गए। इसके अलावा मिड-कैप और क्षेत्रीय स्तर पर तेजी से उभर रहे यथार्थ हॉस्पिटल (Yatharth Hospital) के शेयरों में भी 4 से 6 प्रतिशत तक की भारी गिरावट देखी गई। वहीं एस्टर डीएम हेल्थकेयर (Aster DM Healthcare) के शेयर 4.2 प्रतिशत, कृष्णा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी किम्स (KIMS) में 3.8 प्रतिशत तथा मेदांता ब्रांड का संचालन करने वाली ग्लोबल हेल्थ (Global Health Ltd.) और नारायण हृदयालय (Narayana Hrudayalaya) के शेयरों में भी 3 से 5 प्रतिशत तक की तीव्र बिकवाली दर्ज की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्या कहा जिससे हिल गया पूरा हेल्थकेयर सेक्टर

शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका और दवा मूल्य नियंत्रण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने निजी अस्पतालों की बिलिंग प्रणाली और दवाओं की वास्तविक खरीद लागत तथा मरीजों से ली जाने वाली एमआरपी (MRP) के भारी अंतर पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने उल्लेख किया कि कैंसर और आईसीयू में इस्तेमाल होने वाली जीवनरक्षक दवाओं पर अस्पताल 800 से 1000 प्रतिशत तक का भारी मार्जिन वसूल रहे हैं। पीठ ने इस स्थिति पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ही दवा जब बाजार में कम दाम पर उपलब्ध है, तो अस्पताल अपने इन-हाउस फार्मेसी के जरिए मरीजों को कई गुना महंगे दामों पर वही दवा खरीदने के लिए विवश क्यों करते हैं? अदालत ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) से पूछा कि क्या सरकार आवश्यक दवाओं और अस्पतालों द्वारा लिए जाने वाले कंज्यूमेबल्स पर ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन (TMR) या अधिकतम मूल्य सीमा (Price Cap) लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही है।

अस्पतालों के बिजनेस मॉडल पर क्यों मंडराया संकट: इन-हाउस फार्मेसी का गणित

बाजार विशेषज्ञों और इक्विटी विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से निजी अस्पतालों के समूचे वित्तीय और ऑपरेटिंग मॉडल (EBITDA Margins) पर सीधा खतरा मंडराने लगा है। दरअसल, भारत के बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों की कुल आय का लगभग 25 से 35 प्रतिशत हिस्सा उनकी इन-हाउस फार्मेसी, डायग्नोस्टिक्स और मेडिकल कंज्यूमेबल्स (जैसे सिरिंज, कैथेटर, ग्लव्स और इम्प्लांट्स) की बिक्री से आता है। इस सेगमेंट में अस्पतालों का ऑपरेटिंग मार्जिन 40 से 50 प्रतिशत तक ऊंचा रहता है। अगर सरकार या अदालत के आदेश के बाद दवाओं और जांचों पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत या किसी तय सीमा में बांध दिया जाता है, तो अस्पतालों के मुनाफे में 15 से 25 प्रतिशत तक की सीधी सेंध लग सकती है। यही डर था जिसके चलते संस्थागत विदेशी निवेशकों (FIIs) और घरेलू म्यूचुअल फंड्स ने तुरंत हॉस्पिटल शेयरों में अपनी होल्डिंग्स को कम करना शुरू कर दिया।

पहले भी इलाज की दरों के मानकीकरण (Standardization) को लेकर सुप्रीम कोर्ट दे चुका है चेतावनी

यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों की मनमानी पर चाबुक चलाया हो। इससे पहले भी शीर्ष अदालत ने क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट (Clinical Establishments Act) के तहत पूरे देश में विभिन्न मेडिकल प्रक्रियाओं, सर्जरी और आईसीयू बिस्तरों के लिए एक समान और पारदर्शी दरें तय करने का निर्देश दिया था। उस समय अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि केंद्र और राज्य सरकारें निजी अस्पतालों के साथ मिलकर विभिन्न बीमारियों के इलाज की न्यूनतम और अधिकतम दरें तय नहीं करती हैं, तो अदालत केंद्र सरकार की सीजीएचएस (CGHS) दरों को निजी अस्पतालों पर अनिवार्य रूप से लागू करने का आदेश दे सकती है। सीजीएचएस की दरें निजी अस्पतालों की वर्तमान दरों से 50 से 70 प्रतिशत तक कम हैं। ऐसे में यदि इलाज की दरों और दवाओं के मार्जिन दोनों पर एक साथ कानूनी अंकुश लगता है, तो कॉरपोरेट अस्पतालों का प्रति बेड औसत राजस्व (ARPOB) बुरी तरह गिर सकता है।

ब्रोकरेज हाउसेज का नजरिया: क्या यह गिरावट खरीदारी का मौका है या बढ़ेगा रिस्क?

इस भारी गिरावट के बाद प्रमुख घरेलू और वैश्विक ब्रोकरेज हाउसों की राय विभाजित हो गई है। जेफरीज (Jefferies) और मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) जैसे विदेशी ब्रोकरेज फर्मों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से अल्पावधि में हॉस्पिटल शेयरों पर विनियामक दबाव (Regulatory Overhang) बना रहेगा, जब तक कि अगली सुनवाई में सरकार अपना स्पष्ट हलफनामा दाखिल नहीं कर देती। हालांकि कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज और आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज का मानना है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बुनियादी मांग बेहद मजबूत है। देश में बढ़ती बुजुर्ग आबादी, मेडिकल इंश्योरेंस का तेज विस्तार और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों के चलते बेड ऑक्यूपेंसी लगातार 65 से 75 प्रतिशत के उच्च स्तर पर बनी हुई है। यदि सरकार दवाओं के मार्जिन पर कोई कैप लगाती भी है, तो अस्पताल उसकी भरपाई अपने परामर्श शुल्क (Doctor Consultation) या रूम रेंट में मामूली समायोजन करके कर सकते हैं।

हेल्थकेयर निवेशकों को अब आगे क्या रणनीति अपनानी चाहिए?

शेयर बाजार के जानकारों की सलाह है कि खुदरा निवेशकों को इस समय घबराहट में आकर पूरी तरह बिकवाली करने या तुरंत बॉटम फिशिंग (सस्ते भाव में भारी खरीदारी) करने से बचना चाहिए। निवेशकों को आगामी दिनों में सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई और स्वास्थ्य मंत्रालय के आधिकारिक रुख पर नजर रखनी चाहिए। जिन निवेशकों के पास अपोलो हॉस्पिटल्स, मैक्स हेल्थकेयर या फोर्टिस जैसे मजबूत फंडामेंटल वाले शेयर लंबी अवधि के लिए मौजूद हैं, वे इस गिरावट में धीरे-धीरे (एसआईपी मोड में) सीमित पूंजी जोड़ सकते हैं। लेकिन शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स के लिए यह सेक्टर अभी उच्च जोखिम वाला बना हुआ है, क्योंकि विनियामक जांच और संभावित मूल्य नियंत्रण की तलवार जब तक लटक रही है, तब तक शेयरों में किसी भी तकनीकी उछाल पर बिकवाली का दबाव हावी रह सकता है।