सुप्रीम कोर्ट से राहुल गांधी को मिली बड़ी राहत, ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी को सर्वोच्च अदालत से एक बड़ी कानूनी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित विवादास्पद टिप्पणी को लेकर महाराष्ट्र में दर्ज एक आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) मामले में निचली अदालत (Trial Court) की कार्यवाही और चल रहे ट्रायल पर फिलहाल अंतरिम रोक लगा दी है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की दो-सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र सरकार और मूल शिकायतकर्ता को औपचारिक नोटिस जारी किया है और चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक निचली अदालत में आगे की कोई भी कानूनी प्रक्रिया या गवाही नहीं होगी।
क्या है पूरा मामला और क्या थे आरोप?
यह मानहानि विवाद वर्ष 2018-19 का है, जब देश में राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी चरम पर थी।
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भाषण और आरोप: शिकायतकर्ता एम.एच. श्रीश्रीमल ने महाराष्ट्र के गिरगांव स्थित मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी ने सितंबर 2018 में राजस्थान के डूंगरपुर में आयोजित एक सार्वजनिक रैली में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से "कमांडर-इन-थीफ" और अन्य अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था।
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शिकायतकर्ता का तर्क: शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि राहुल गांधी के इस बयान से न केवल प्रधानमंत्री बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों की मानहानि हुई है, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है।
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समन जारी होना: इस शिकायत पर संज्ञान लेते हुए स्थानीय मजिस्ट्रेट कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि की धाराओं के तहत समन जारी किया था।
बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ पहुंचे थे सुप्रीम कोर्ट
निचली अदालत द्वारा जारी समन को रद्द कराने के लिए राहुल गांधी ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट की एकल पीठ ने राहुल गांधी की याचिका को खारिज करते हुए उनके खिलाफ जारी समन को रद्द करने से इनकार कर दिया था। हाई कोर्ट ने माना था कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की सच्चाई और संदर्भ का निर्धारण ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।
बॉम्बे हाई कोर्ट के इसी आदेश को चुनौती देते हुए राहुल गांधी की लीगल टीम ने वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस नेता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी के जरिए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की।
सुप्रीम कोर्ट में क्या रहीं राहुल गांधी के वकीलों की दलीलें
सर्वोच्च अदालत में सुनवाई के दौरान राहुल गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कई अहम कानूनी पहलुओं को रेखांकित किया:
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'व्यथित व्यक्ति' (Aggrieved Person) का कानूनी सिद्धांत: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 199 के तहत मानहानि की शिकायत केवल उसी व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई जा सकती है, जिसके खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से कथित टिप्पणी की गई हो (यानी व्यथित व्यक्ति)।
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तीसरे पक्ष द्वारा शिकायत का अधिकार नहीं: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि यदि कोई राजनीतिक बयान किसी नेता या सरकार की नीतियों की आलोचना के रूप में दिया गया है, तो किसी तीसरे पक्ष या पार्टी के कार्यकर्ता को मानहानि का मुकदमा करने का विधिक अधिकार (Locus Standi) नहीं मिलता।
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अदालत के पूर्व फैसलों का हवाला: सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के कई नजीरों का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि सामान्य राजनीतिक बयानों के आधार पर पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा दर्ज कराई गई मानहानि की याचिकाओं को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रारंभिक दलीलों को सुनने के बाद ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने का आदेश पारित किया।
इस आदेश का क्या होगा असर और आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के कई बड़े कानूनी और राजनीतिक निहितार्थ हैं:
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समन और व्यक्तिगत पेशी से राहत: इस स्टे ऑर्डर के बाद राहुल गांधी को महाराष्ट्र की ट्रायल कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने या मुकदमे की रोजाना सुनवाई का सामना करने से पूरी राहत मिल गई है।
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चार सप्ताह बाद दोबारा सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों को 4 हफ्ते में जवाब देने को कहा है। नोटिस का जवाब आने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस बात पर अंतिम निर्णय लेगा कि क्या बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट में चल रहे पूरे मानहानि केस को ही पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया जाए।
शीर्ष अदालत का यह रुख विपक्षी नेताओं के खिलाफ दर्ज होने वाले मानहानि के मुकदमों में 'व्यथित पक्ष' के दायरे को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर स्थापित कर सकता है।