मोटी सैलरी = 750+ CIBIL स्कोर? जानिए क्या ज्यादा कमाई से वाकई सुधरता है क्रेडिट स्कोर या खेल कुछ और है

मोटी सैलरी = 750+ CIBIL स्कोर? जानिए क्या ज्यादा कमाई से वाकई सुधरता है क्रेडिट स्कोर या खेल कुछ और है

अक्सर नौकरीपेशा और कारोबारियों के मन में यह धारणा रहती है कि अगर हर महीने बैंक खाते में लाखों रुपये की सैलरी क्रेडिट हो रही है, तो उनका क्रेडिट स्कोर अपने आप आसमान छू रहा होगा। कई लोग सोचते हैं कि बैंकों के लिए अमीर ग्राहक ही सबसे बेहतर कर्जदार होते हैं, इसलिए भारी पैकेज वाले का CIBIL स्कोर 800 से नीचे जा ही नहीं सकता। हकीकत की जमीन पर यह वित्तीय समीकरण पूरी तरह उलट साबित होता है। हकीकत यह है कि भारत में ट्रांसयूनियन सिबिल, इक्विफैक्स, एक्सपेरियन या सीआरआईएफ हाई मार्क जैसी कोई भी क्रेडिट ब्यूरो एजेंसी आपके बैंक बैलेंस या सैलरी स्लिप को देखकर आपका स्कोर तय नहीं करती। आपकी महीने की कमाई चाहे 30 हजार रुपये हो या 5 लाख रुपये, सिबिल स्कोर की नजर में दोनों एक ही तराजू पर तौले जाते हैं।

क्या सैलरी और सिबिल स्कोर का सीधा कनेक्शन है?

क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनियां केवल यह ट्रैक करती हैं कि आप लिए गए कर्ज को किस अनुशासन से लौटाते हैं। जब आप होम लोन, पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन करते हैं, तब बैंक आपकी आय और पे-स्लिप मांगता है, लेकिन जब वही बैंक सिबिल से आपकी क्रेडिट रिपोर्ट मांगता है, तो सिबिल को आपकी सैलरी का कोई डेटा नहीं भेजा जाता। सिबिल के एल्गोरिदम में आपकी आय का कोई कॉलम या वेटेज ही नहीं होता। इसका सीधा मतलब यह है कि 15 लाख रुपये का सालाना पैकेज पाने वाला व्यक्ति भी 600 के खराब सिबिल स्कोर पर अटक सकता है, जबकि 25 हजार रुपये प्रति माह कमाने वाला एक अनुशासित युवा 780 से ज्यादा का बेहतरीन क्रेडिट स्कोर बना सकता है।

सिबिल स्कोर की गणना का असली गणित: 5 बड़े पिलर

सिबिल स्कोर 300 से 900 अंकों के बीच होता है और 750 से ऊपर का स्कोर कर्ज पाने के लिए आदर्श माना जाता है। इस स्कोर को तय करने के लिए ब्यूरो मुख्य रूप से पांच पैमानों पर आपके वित्तीय व्यवहार को मापता है।

पहला और सबसे अहम पैमाना है आपका रीपेमेंट हिस्ट्री। सिबिल स्कोर में लगभग 35 प्रतिशत हिस्सेदारी इसी बात की होती है कि आपने अपने पुराने लोन की ईएमआई और क्रेडिट कार्ड के बिल तय तारीख पर भरे हैं या नहीं। भले ही आपका वेतन भारी-भरकम हो, लेकिन अगर आप बिजी शेड्यूल के चलते क्रेडिट कार्ड बिल का भुगतान भूल जाते हैं या ईएमआई बाउंस हो जाती है, तो आपका स्कोर तेजी से नीचे गिरेगा।

दूसरा बड़ा फैक्टर है क्रेडिट यूटिलाइजेशन रेशियो यानी सीयूआर। इसका कुल स्कोर में 30 प्रतिशत का योगदान होता है। अगर आपके क्रेडिट कार्ड की लिमिट 2 लाख रुपये है और आप हर महीने 1.8 लाख रुपये खर्च कर देते हैं, तो ब्यूरो आपको क्रेडिट हंग्री मान लेता है। भले ही आपकी जेब में बिल भरने के पर्याप्त पैसे हों, 30 प्रतिशत से अधिक लिमिट का लगातार इस्तेमाल स्कोर को नुकसान पहुंचाता है।

तीसरा पिलर है क्रेडिट हिस्ट्री की अवधि, जिसका वेटेज करीब 15 प्रतिशत है। आपके पास लोन या क्रेडिट कार्ड कितने लंबे समय से हैं, यह बताता है कि आपका वित्तीय अनुभव कितना पुराना और भरोसेमंद है। अपने पुराने क्रेडिट कार्ड को बंद करने से आपकी क्रेडिट हिस्ट्री छोटी हो जाती है, जिससे स्कोर पर नकारात्मक असर पड़ता है।

चौथा फैक्टर है क्रेडिट मिक्स, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत होती है। इसमें देखा जाता है कि आपके पास सुरक्षित और असुरक्षित कर्ज का कैसा संतुलन है। केवल पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड होना असुरक्षित श्रेणी को बढ़ाता है, जबकि होम लोन या ऑटो लोन के साथ इनका सही संतुलन बेहतर माना जाता है।

पांचवां पिलर है न्यू क्रेडिट या हार्ड इंक्वायरी, जो 10 प्रतिशत प्रभाव डालती है। जब भी आप किसी नए लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए बार-बार आवेदन करते हैं, तो वित्तीय संस्थाएं आपकी क्रेडिट रिपोर्ट खंगालती हैं, जिससे स्कोर में कुछ अंकों की गिरावट दर्ज होती है।

मोटी कमाई वाले लोग कहां कर बैठते हैं चूक?

महानगरों जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और लखनऊ जैसे तेजी से बढ़ते टियर-2 शहरों में हाई-इनकम प्रोफेशनल्स के बीच क्रेडिट मिसमैनेजमेंट के मामले तेजी से बढ़े हैं। ज्यादा वेतन होने पर लोग अक्सर कई सारे प्रीमियम क्रेडिट कार्ड ले लेते हैं। कार्ड की संख्या बढ़ने पर बिल पेमेंट की तारीखें याद रखना मुश्किल हो जाता है। ऑटो-डेबिट सेट न होने पर महज कुछ सौ रुपये के न्यूनतम देय की देरी भी सिबिल में डिफॉल्ट के रूप में दर्ज हो जाती है। इसके अलावा, कई लोग केवल मिनिमम ड्यू भरकर सोचते हैं कि उनका काम हो गया, जबकि बाकी बची रकम पर 40 प्रतिशत तक का सालाना ब्याज लगता है और क्रेडिट यूटिलाइजेशन बढ़ता चला जाता है।

लोन अप्रूवल में सैलरी की वास्तविक भूमिका क्या है?

अब सवाल उठता है कि अगर सिबिल के लिए सैलरी मायने नहीं रखती, तो बैंक लोन देते वक्त सैलरी स्लिप क्यों मांगते हैं। यहां समझने वाली बात यह है कि लोन अप्रूवल दो अलग-अलग चरणों में काम करता है। सिबिल स्कोर बैंक को यह बताता है कि आपकी नीयत कैसी है, यानी क्या आप ईमानदारी से पैसा लौटाते हैं। वहीं आपकी सैलरी स्लिप और बैंक स्टेटमेंट बैंक को यह बताते हैं कि आपकी क्षमता कैसी है, यानी क्या आपके पास ईएमआई भरने के लिए पर्याप्त नकदी बचती है। अगर आपका सिबिल स्कोर 800 है लेकिन सैलरी बेहद कम है, तो बैंक आपको बड़ा लोन देने से मना कर सकता है। इसी तरह अगर आपकी सैलरी 3 लाख रुपये महीना है लेकिन सिबिल स्कोर 580 है, तो बैंक आपको डिफॉल्टर मानकर फाइल सीधे रिजेक्ट कर सकता है।

बेहतरीन क्रेडिट स्कोर बनाने और बनाए रखने के सुनहरे नियम

अगर आप अपनी आय चाहे जितनी भी हो, एक मजबूत वित्तीय प्रोफाइल तैयार करना चाहते हैं, तो कुछ बुनियादी अनुशासन अपनाना जरूरी है। सबसे पहले अपने सभी क्रेडिट कार्ड और लोन की ईएमआई के लिए ऑटो-डेबिट एक्टिवेट करें ताकि व्यस्तता में भी पेमेंट मिस न हो। अपने कुल क्रेडिट कार्ड लिमिट का 30 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कभी इस्तेमाल न करें; अगर खर्च ज्यादा है तो बैंक से लिमिट बढ़वाने का अनुरोध करें। बेवजह नए क्रेडिट कार्ड्स के लिए आवेदन न करें और समय-समय पर अपनी सिबिल रिपोर्ट जरूर चेक करें ताकि किसी भी गलत प्रविष्टि या धोखाधड़ी को समय रहते सुधारा जा सके।

कमाई आपकी हैसियत दिखा सकती है, लेकिन सिबिल स्कोर आपकी वित्तीय ईमानदारी और अनुशासन का आईना होता है। बैंक हमेशा उसी ग्राहक पर भरोसा करते हैं जिसकी कमाई के साथ-साथ रीपेमेंट का ट्रैक रिकॉर्ड भी बेदाग हो।